डॉक्टर नहीं, ‘रेफर माफिया’ पर उठे सवालचंडीगढ़ की महिला डॉक्टर के खुलासे ने खोली निजी अस्पतालों की काली दुनिया, उत्तराखंड भी अछूता नहीं

Spread the love


उत्तराखंड चंडीगढ़ डॉक्टर को  भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन जब चिकित्सा सेवा ‘टारगेट’, ‘कमीशन’ और ‘कॉर्पोरेट मुनाफे’ की गिरफ्त में आ जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान मरीज और उसके भरोसे का होता है। चंडीगढ़ की युवा और साहसी डॉक्टर ने निजी अस्पतालों की कथित लूट और ICU आधारित कमाई मॉडल पर जो खुलासा किया है, उसने पूरे देश में स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डॉ. प्रभलीन कौर ने एक नामी निजी अस्पताल में फिजिशियन के रूप में जॉइन किया था, लेकिन वहां की कार्यप्रणाली देखकर पहले ही दिन इस्तीफा दे दिया। उनका आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन डॉक्टरों पर मरीजों को अनावश्यक रूप से ICU में भर्ती करने का दबाव बनाता था, ताकि भारी-भरकम बिल वसूले जा सकें। उन्होंने साफ कहा कि अस्पताल को डॉक्टर नहीं, बल्कि “रबर स्टैंप” चाहिए था।
उनका यह साहस सराहनीय है। ऐसे समय में जब कई डॉक्टर प्रबंधन और पैसों के दबाव में चुप रहना बेहतर समझते हैं, तब डॉ. प्रभलीन ने चिकित्सा नैतिकता को प्राथमिकता दी। समाज और ईमानदार डॉक्टर बिरादरी को उनके समर्थन में खुलकर सामने आना चाहिए।
उत्तराखंड में भी उठते रहे हैं ऐसे सवाल
उत्तराखंड में लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि कई सरकारी अस्पताल “रेफर सेंटर” बनकर रह गए हैं। पहाड़ों और दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों, मशीनों और विशेषज्ञों की कमी का हवाला देकर मरीजों को बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में भेज दिया जाता है। कई मामलों में आरोप लगते रहे हैं कि रेफरल की यह प्रक्रिया केवल चिकित्सा जरूरत नहीं, बल्कि कमीशन आधारित नेटवर्क का हिस्सा बन जाती है।
ग्रामीण और गरीब मरीजों को बताया जाता है कि सरकारी अस्पताल में इलाज संभव नहीं है। इसके बाद उन्हें निजी अस्पतालों की ओर भेजा जाता है, जहां “अच्छे इलाज” का भरोसा देकर लाखों रुपये के पैकेज थमा दिए जाते हैं।
कैसे होता है कथित खेल?
मरीज को गंभीर बताकर ICU में भर्ती
जरूरत से ज्यादा टेस्ट और स्कैन
महंगी दवाओं और इंजेक्शन का दबाव
आयुष्मान कार्ड की पूरी लिमिट खपाने की कोशिश
मजदूरों के ESI कार्ड और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं का अधिकतम बिलिंग के लिए इस्तेमाल
सामान्य बीमारी को “क्रिटिकल” दिखाकर लंबा भर्ती रखना
आयुष्मान भारत योजना गरीबों के इलाज के लिए बनी थी, लेकिन कई जगह आरोप लगते रहे हैं कि इसे “कमाई का माध्यम” बना दिया गया। मरीज को यह एहसास तक नहीं होता कि उसके कार्ड से कितनी राशि निकाली जा चुकी है। कई अस्पताल पहले कार्ड की सीमा समाप्त करते हैं, फिर मरीज के परिजनों से नकद भुगतान की मांग शुरू हो जाती है।
मजदूर वर्ग को मिलने वाले ESI कार्ड, सरकारी कर्मचारियों की स्वास्थ्य योजनाएं और अन्य बीमा आधारित सुविधाएं भी कथित रूप से कुछ अस्पतालों के लिए “पैकेज आधारित कारोबार” बनती जा रही हैं।
सरकारी अस्पतालों पर भी सवाल जरूरी
सिर्फ निजी अस्पतालों पर सवाल उठाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, उपकरण और दवाएं उपलब्ध हों, तो मरीज निजी अस्पतालों की ओर मजबूरी में न जाएं। लेकिन जब जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज और वहां से निजी अस्पताल तक रेफर का सिलसिला चलता है, तब आम आदमी आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से टूट जाता है।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि यहां मरीज अक्सर गांव-जंगल पार करके अस्पताल तक पहुंचता है। ऐसे में यदि उसे बार-बार रेफर किया जाए, तो इलाज से पहले ही परिवार कर्ज में डूब जाता है।
स्वास्थ्य सेवा या कारोबार?
मानवाधिकार आयोग के सदस्य ने सही कहा कि कई अस्पताल अब सेवा केंद्र नहीं, बल्कि “फाइव स्टार होटल” और “कॉर्पोरेट ऑफिस” बनते जा रहे हैं। स्वास्थ्य सेवा का व्यवसायीकरण जिस स्तर तक पहुंच चुका है, वहां अब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज होनी चाहिए।
जरूरत क्या है?
रेफरल सिस्टम की स्वतंत्र जांच
ICU भर्ती का मेडिकल ऑडिट
आयुष्मान और ESI बिलिंग की निगरानी
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति
मरीजों के लिए बिल की पारदर्शिता कानून
व्हिसलब्लोअर डॉक्टरों को कानूनी सुरक्षा
डॉ. प्रभलीन कौर का खुलासा  अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहां मरीज कई बार इलाज से ज्यादा “बिजनेस मॉडल” का हिस्सा बन जाता है। सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां इंसान की बीमारी भी बाजार का अवसर बन चुकी है।


Spread the love