मनुष्य सदियों से प्रकाश को केवल अंधकार दूर करने का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना, ऊर्जा और आध्यात्मिक अनुभूति के प्रतीक के रूप में देखता आया है। सूर्य की पहली किरण, मंदिर में जलता दीपक, पहाड़ों में धूनी के सामने होने वाली देव-जागर और साधना के दौरान अग्नि की ओर एकटक देखना—ये सभी हमारी संस्कृति और जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
अब आधुनिक विज्ञान भी प्रकाश और मस्तिष्क के संबंधों को समझने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। अमेरिकी वैज्ञानिक, बायोइंजीनियर और मनोचिकित्सक डॉ. कार्ल डिसेरोथ ने ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की 5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें इस तकनीक से जुड़े कार्य के लिए शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया है। इस तकनीक के विकास में अन्य वैज्ञानिकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल उठता है—क्या प्रकाश से मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं को प्रभावित करने वाली आधुनिक तकनीक हमें उत्तराखंड की पारंपरिक देव-जागर, धूनी, अग्नि और दीपक की लौ के प्रभावों को समझने में भी कोई नई दृष्टि दे सकती है?
क्या है ऑप्टोजेनेटिक्स की तकनीक?
हमारा मस्तिष्क अरबों तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है। हमारी याददाश्त, भावनाएं, निर्णय, शारीरिक गतिविधियां और व्यवहार इन तंत्रिका तंत्रों की जटिल गतिविधियों से जुड़े हैं।
पहले वैज्ञानिकों के लिए यह समझना कठिन था कि मस्तिष्क के किसी विशेष हिस्से में मौजूद कोशिकाएं किस व्यवहार या अनुभूति के लिए जिम्मेदार हैं। सामान्य विद्युत उत्तेजना या दवाओं से मस्तिष्क पर प्रभाव डालने में यह कठिनाई रहती है कि असर को केवल चुनी हुई कोशिकाओं तक सीमित रखना आसान नहीं होता।
ऑप्टोजेनेटिक्स में प्रकाश के प्रति संवेदनशील विशेष प्रोटीनों की सहायता से चुनी हुई तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित किया जाता है। इसके लिए कोशिकाओं में ऐसे प्रोटीन व्यक्त कराए जाते हैं, जो निश्चित प्रकार के प्रकाश के संपर्क में आने पर सक्रिय या निष्क्रिय हो सकते हैं।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात समझने की है कि इस प्रयोग में केवल किसी बल्ब या दीपक की रोशनी मस्तिष्क पर डाल देना पर्याप्त नहीं है। कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विशेष जैविक प्रक्रियाओं और नियंत्रित प्रकाश उपकरणों की आवश्यकता होती है।
स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक की सहायता से अवसाद जैसे लक्षणों, प्रेरणा, सामाजिक व्यवहार और पार्किंसंस रोग से जुड़े तंत्रिका परिपथों का अध्ययन किया है। हालांकि, प्रयोगशाला में प्राप्त परिणामों को सीधे मनुष्यों के उपचार का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसका बड़ा महत्व मस्तिष्क के काम करने के तरीकों को बेहतर ढंग से समझना है।
मानव जीवन पर क्या पड़ सकता है प्रभाव?
इस अनुसंधान का सबसे बड़ा संभावित लाभ मानसिक और तंत्रिका संबंधी बीमारियों की गहरी समझ विकसित करना है। अवसाद, पार्किंसंस, मिर्गी तथा अन्य तंत्रिका संबंधी विकारों में मस्तिष्क के विशिष्ट परिपथों की भूमिका समझने से भविष्य में अधिक लक्षित उपचार विकसित करने के रास्ते खुल सकते हैं।
आज मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए यह शोध आशा जगाता है। फिर भी ऑप्टोजेनेटिक्स अभी मुख्य रूप से एक अनुसंधान तकनीक है। मनुष्यों के मस्तिष्क में इसका व्यापक नियमित चिकित्सकीय उपयोग स्थापित नहीं हुआ है। अल्जाइमर सहित विभिन्न बीमारियों के लिए इसके संभावित लाभों पर शोध और विकास की आवश्यकता बनी हुई है।
इसलिए इसे चमत्कारी इलाज कहना उचित नहीं होगा। इसकी वास्तविक उपलब्धि यह है कि वैज्ञानिक अब मस्तिष्क की विशिष्ट कोशिकाओं और उनके आपसी संबंधों का अधिक सूक्ष्म अध्ययन कर सकते हैं।
उत्तराखंड की देव-जागर और धूनी: विज्ञान किस तरह देखता है इस परंपरा को?
उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं में देव-जागर का विशेष स्थान है। ढोल-दमाऊं की लय, जागर गायक की वाणी, लोकदेवताओं का आह्वान, धूनी की अग्नि और श्रद्धालुओं की सामूहिक उपस्थिति मिलकर एक विशिष्ट वातावरण बनाते हैं।
ऐसे अवसरों पर कुछ लोग भावावेश, गहरी तल्लीनता या परिवर्तित चेतन-अनुभव की स्थिति का वर्णन करते हैं। श्रद्धालु इन अनुभवों को अपनी धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं के अनुसार देव-अनुभूति के रूप में समझते हैं।
विज्ञान इस स्थिति को समझने के लिए कुछ अन्य प्रश्न पूछ सकता है। लयबद्ध संगीत का मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है? सामूहिक अनुष्ठान से भावनाएं किस प्रकार प्रभावित होती हैं? अपेक्षा, विश्वास, वातावरण, ध्यान और सामाजिक जुड़ाव किसी व्यक्ति के अनुभव को किस तरह बदलते हैं?
संगीत, दोहराव वाली लय, भावनात्मक वातावरण और ध्यान का मनुष्य की अनुभूतियों पर प्रभाव पड़ सकता है। मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान इन पहलुओं का अध्ययन कर सकते हैं।
लेकिन ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज अपने आप यह सिद्ध नहीं करती कि देव-जागर के दौरान किसी व्यक्ति में होने वाली हर अनुभूति का कारण प्रकाश है या कोई विशेष न्यूरॉन। न ही इससे देवताओं के अस्तित्व अथवा आध्यात्मिक अनुभवों की सत्यता या असत्यता पर कोई निर्णायक निष्कर्ष निकलता है।
विज्ञान अनुभव के जैविक पहलुओं का अध्ययन कर सकता है, जबकि आस्था उस अनुभव को धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ देती है। दोनों के प्रश्न हमेशा एक जैसे नहीं होते।
सूर्य का प्रकाश, बल्ब की रोशनी और अग्नि की लौ में क्या अंतर है?
प्रकाश के इन तीनों स्रोतों में भौतिक अंतर है और इनके संपर्क का प्रभाव भी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है।
सूर्य का प्रकाश: प्राकृतिक दिन के प्रकाश का शरीर की जैविक घड़ी, नींद-जागने के चक्र और मनोदशा से संबंध है। सुबह का प्रकाश शरीर को दिन के समय के अनुरूप ढलने में मदद कर सकता है। हालांकि, सूर्य को सीधे एकटक देखना आंखों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
बल्ब की रोशनी: कृत्रिम प्रकाश का प्रभाव उसकी तीव्रता, रंग, समय और अवधि पर निर्भर करता है। रात में तेज रोशनी, विशेषकर आंखों तक पहुंचने वाला अधिक नीला प्रकाश, शरीर की जैविक घड़ी और मेलाटोनिन के स्राव को प्रभावित कर सकता है। सामान्य बल्ब की रोशनी से ऑप्टोजेनेटिक्स जैसा कोशिका-विशिष्ट नियंत्रण नहीं होता।
धूनी और अग्नि की लौ: अग्नि की लपटों में बदलती चमक, गति, गर्मी और आसपास का वातावरण व्यक्ति का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। धूनी के आसपास बैठने का अनुभव सामूहिक वातावरण, धार्मिक विश्वास, संगीत, सुगंध और मानसिक अपेक्षाओं से भी प्रभावित हो सकता है। धुएं से आंखों और श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए पर्याप्त वेंटिलेशन जरूरी है।
इन तीनों को एक ही वैज्ञानिक प्रक्रिया मानना गलत होगा। इनके कुछ प्रभावों में समानता हो सकती है, लेकिन उनके तंत्र अलग-अलग हैं।
दीपक की लौ को एकटक देखने की परंपरा: त्राटक का महत्व
भारतीय योग परंपरा में दीपक की लौ पर स्थिर दृष्टि रखने के अभ्यास को त्राटक कहा जाता है। इसे एकाग्रता और ध्यान से जोड़कर देखा जाता है। विभिन्न योग परंपराओं में इसके अभ्यास की विधियां और उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं।
जब कोई व्यक्ति किसी स्थिर बिंदु पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह आसपास के व्यवधानों से अपना ध्यान हटाने का अभ्यास करता है। इस प्रक्रिया से कुछ लोगों को मानसिक स्थिरता, आत्मनिरीक्षण और ध्यान में सहायता मिल सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी ध्यान, एकाग्रता और सांस पर केंद्रित अभ्यासों के संभावित लाभों का अध्ययन करता है। लेकिन त्राटक के प्रत्येक पारंपरिक दावे को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मान लेना उचित नहीं होगा।
विशेष रूप से, दीपक की लौ देखने और ऑप्टोजेनेटिक्स के बीच सीधा वैज्ञानिक संबंध स्थापित नहीं है। त्राटक में व्यक्ति सामान्य दृश्य प्रकाश के माध्यम से ध्यान केंद्रित करता है, जबकि ऑप्टोजेनेटिक्स में जैविक रूप से प्रकाश-संवेदनशील बनाई गई विशिष्ट कोशिकाओं को नियंत्रित किया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति लौ पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है, तो उसे आरामदायक दूरी और सामान्य दृष्टि के साथ सीमित अवधि से शुरुआत करनी चाहिए। आंखों में दर्द, जलन, सिरदर्द या असुविधा होने पर अभ्यास रोक देना चाहिए। बच्चों, आंखों की बीमारी से पीड़ित लोगों और प्रकाश से परेशानी अनुभव करने वालों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. ललित मोहन उप्रेती का दृष्टिकोण
डॉ. ललित मोहन उप्रेती के नाम से प्रकाशन हेतु प्रस्तावित वक्तव्य—प्रत्यक्ष पुष्टि अपेक्षित:
“विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच संवाद की बहुत आवश्यकता है। विज्ञान हमें शरीर, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की कार्यप्रणाली को प्रमाणों के आधार पर समझने का अवसर देता है। दूसरी ओर, हमारी लोकपरंपराएं और आध्यात्मिक साधनाएं मनुष्य के सांस्कृतिक जीवन, भावनात्मक अनुभव और सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
ऑप्टोजेनेटिक्स जैसी तकनीक यह दिखाती है कि मस्तिष्क की अत्यंत सूक्ष्म गतिविधियों का वैज्ञानिक अध्ययन संभव है। इससे मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका संबंधी बीमारियों को समझने के नए रास्ते खुलते हैं। उत्तराखंड की देव-जागर, धूनी और दीपक की लौ जैसी परंपराओं का अध्ययन भी खुले मन से किया जा सकता है।
हालांकि, किसी धार्मिक अनुभव को केवल मस्तिष्क की गतिविधि तक सीमित कर देना भी जल्दबाजी होगी और किसी वैज्ञानिक खोज को बिना प्रमाण आध्यात्मिक मान्यता का प्रमाण घोषित करना भी उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी संस्कृति का सम्मान करते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, स्वास्थ्य संबंधी दावों की जांच करें और प्रमाणित चिकित्सा को महत्व दें।”
डॉ. कार्ल डिसेरोथ से जुड़ा ऑप्टोजेनेटिक्स अनुसंधान हमें मस्तिष्क की जटिल दुनिया को समझने का एक शक्तिशाली वैज्ञानिक साधन देता है। उत्तराखंड की देव-जागर, धूनी और दीपक की लौ हमारी सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
इन दोनों के बीच सार्थक संवाद तभी संभव है, जब हम वैज्ञानिक तथ्यों को वैज्ञानिक तथ्यों के रूप में, धार्मिक आस्था को आस्था के रूप में और शोध की संभावनाओं को संभावनाओं के रूप में प्रस्तुत करें।
प्रकाश मनुष्य की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकता है, ध्यान किसी व्यक्ति की एकाग्रता को दिशा दे सकता है और सामूहिक अनुष्ठान भावनात्मक अनुभवों को प्रभावित कर सकते हैं। इन संबंधों पर शोध आगे भी हमारी समझ बढ़ा सकता है।
विज्ञान का उद्देश्य प्रश्न पूछना है, आध्यात्मिकता का उद्देश्य अनेक लोगों के लिए जीवन का अर्थ तलाशना है। जब जिज्ञासा, विवेक और सांस्कृतिक सम्मान साथ चलते हैं, तभी ज्ञान का प्रकाश अधिक व्यापक होता है।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
