शिलान्यास की चमक, संगमरमर की राजनीति और उत्तराखंड के असली सवाल

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उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में राजनीतिक पटकथा लिखी जा चुकी है। शहरों में शिलान्यास पट्टिकाओं की बाढ़ आने लगी है, मंत्रियों के काफिले सड़कों पर उतर चुके हैं, मंच सजने लगे हैं, मालाएं तैयार हैं, कैमरे फोकस में हैं और सरकारी तंत्र विकास की ऐसी तस्वीर पेश करने में जुट गया है मानो राज्य की सभी समस्याएं समाप्त हो चुकी हों।
रुद्रपुर में शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा द्वारा करोड़ों की योजनाओं का शिलान्यास हो, जिला योजना समिति की बैठकों में करोड़ों के बजट का अनुमोदन हो या पंतनगर

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

विश्वविद्यालय में बायोटेक भवन के लोकार्पण जैसे कार्यक्रम—इन सभी आयोजनों को यदि एक सूत्र में पिरोया जाए तो तस्वीर बेहद स्पष्ट दिखाई देती है। यह केवल विकास का प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह चुनावी मनोविज्ञान की सुविचारित रणनीति भी है।
आज उत्तराखंड में विकास का नया पैमाना शिलान्यास पत्थर बन चुका है। जिस सड़क का निर्माण होना है, उसका पहले शिलान्यास। जिस नाले का निर्माण होना है, उसका शिलान्यास। जिस भवन का उद्घाटन होना है, उसके लिए अलग समारोह। जिस पार्क का सौंदर्यीकरण होना है, उसके लिए अलग मंच। हर जगह संगमरमर या ग्रेनाइट की पट्टिका लगेगी, उस पर मंत्री, विधायक, सांसद, मेयर और अन्य जनप्रतिनिधियों के नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित होंगे। जनता ताली बजाएगी, मीडिया सुर्खियां बनाएगा और सोशल मीडिया इसे “ऐतिहासिक विकास” बताकर प्रचारित करेगा।
सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड का विकास वास्तव में शिलान्यास की राजनीति तक सीमित हो गया है?
राज्य के जमीनी हालात किसी से छिपे नहीं हैं। बेरोजगारी लगातार युवाओं को निराश कर रही है। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। पेपर लीक मामलों ने युवाओं का विश्वास तोड़ा। राज्य निर्माण आंदोलन के समय जिन पहाड़ों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की उम्मीद थी, वहां आज भी पलायन जारी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल भवन तो बने लेकिन डॉक्टर नहीं पहुंचे। स्कूलों की इमारतें खड़ी हैं लेकिन शिक्षक नहीं हैं। पहाड़ों की सड़कों का हाल मानसून आते ही उजागर हो जाता है। कई गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
दूसरी ओर, राज्य में अवैध खनन के आरोप लगातार उठते रहे हैं। नदियों का सीना चीरकर खनिज निकाला जा रहा है। पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित हो रहा है। स्थानीय लोगों की शिकायत है कि प्राकृतिक संसाधनों का लाभ बाहरी प्रभावशाली नेटवर्क उठा रहा है जबकि स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा।
रुद्रपुर, हल्द्वानी, देहरादून और अन्य शहरों में स्पा सेंटरों की आड़ में अनैतिक गतिविधियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। प्रशासन छापेमारी करता है, कुछ दिन शोर रहता है और फिर सब सामान्य हो जाता है। आखिर यह संरक्षण किसके इशारे पर चलता है—यह प्रश्न जनता के मन में बना रहता है।
शराब की नई दुकानों और ठेकों को लेकर भी लगातार जन असंतोष सामने आता रहा है। कई स्थानों पर महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किए। गांवों और कस्बों में सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होने की शिकायतें सामने आईं, लेकिन राजस्व का तर्क अक्सर जनभावनाओं पर भारी पड़ता दिखाई दिया।
सबसे गंभीर बहस पंतनगर विश्वविद्यालय की भूमि को लेकर उठी। विश्वविद्यालय की भूमि, परिसंपत्तियों और संसाधनों के उपयोग को लेकर समय-समय पर विभिन्न समूहों ने चिंता जताई। कर्मचारियों के हितों, संस्थागत भविष्य और भूमि उपयोग की नीतियों पर पारदर्शिता की मांग लगातार उठती रही है। जब शिक्षा और कृषि अनुसंधान जैसे संस्थानों की जमीन तक चर्चा का विषय बन जाए तो यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि राज्य की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़ा करता है।
नजूल भूमि का प्रश्न भी उत्तराखंड में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। स्थानीय नागरिक लंबे समय से समाधान चाहते हैं, लेकिन इस विषय पर राजनीतिक बयान अधिक और स्थायी समाधान कम दिखाई देता है। जनता को मालिकाना अधिकार चाहिए, केवल आश्वासन नहीं।
और जब इन मुद्दों पर आवाज उठती है तो कई बार आंदोलनों पर सख्ती के आरोप लगते हैं। लोकतंत्र में असहमति को सुना जाना चाहिए, लेकिन यदि जनता को लगता है कि उनकी आवाज को दबाया जा रहा है तो यह स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।
सबसे दिलचस्प पहलू राजनीतिक विरोध का भी है। जो चेहरे चार साल तक सरकार की आलोचना करते दिखाई देते हैं, चुनाव नजदीक आते ही उनमें से कई अचानक सत्ता के मंचों पर नजर आने लगते हैं। सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं और समीकरण आगे आ जाते हैं। जनता सब देखती है, समझती है और याद भी रखती है।
सरकार को यह समझना होगा कि केवल उद्घाटन, लोकार्पण और शिलान्यास से इतिहास नहीं लिखा जाता। इतिहास तब लिखा जाता है जब राज्य के युवा रोजगार पाते हैं, किसान सम्मानपूर्वक जीता है, पहाड़ों से पलायन रुकता है, शिक्षा मजबूत होती है और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा होती है।
उत्तराखंड आंदोलन केवल इसलिए नहीं हुआ था कि हर चुनाव से पहले नए पत्थर लगाए जाएं। यह राज्य इसलिए बना था ताकि यहां की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास मॉडल तैयार हो।
यदि विकास केवल मंच, माला, भाषण और फोटो तक सीमित रहेगा तो जनता भविष्य में कठोर प्रश्न पूछेगी।
उत्तराखंड को शिलान्यास नहीं, परिणाम चाहिए।
उत्तराखंड को प्रचार नहीं, पारदर्शिता चाहिए।
उत्तराखंड को राजनीतिक आयोजन नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।
2027 आएगा और चला जाएगा, लेकिन सवाल वही रहेगा—क्या राज्य वास्तव में मजबूत हुआ या केवल पत्थरों पर नाम लिखे गए?
जनता अब शिलापट्ट नहीं, सच पढ़ना चाहती है।


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