

संपादकीय: हमारी जमीन, पर हक किसका?
गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर कभी भारत की कृषि क्रांति का प्रतीक था। लगभग 16 हजार एकड़ उपजाऊ भूमि पर स्थापित इस विश्वविद्यालय ने देश को वैज्ञानिक खेती की नई दिशा दी। लेकिन उत्तराखंड गठन के बाद विकास और रोजगार के नाम पर इसकी हजारों एकड़ भूमि उद्योगों, सिडकुल परियोजनाओं, स्थानीय व बाहरी बिल्डरों अन्य ढांचागत कार्यों के लिए हस्तांतरित कर दी गई।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
जनता से वादा किया गया था कि उद्योग आने से स्थानीय युवाओं को 70 प्रतिशत रोजगार मिलेगा। हकीकत यह है कि आज बड़ी संख्या में स्थानीय युवा 9 से 12 हजार रुपये की मामूली तनख्वाह पर 10 से 12 घंटे काम करने को मजबूर हैं। स्थायी नौकरियां कम हैं, ठेका प्रथा हावी है और श्रम कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगातार उठते रहे हैं। महिला कर्मचारियों के उत्पीड़न की शिकायतें भी चिंता बढ़ाती हैं।
विडंबना यह है कि जमीन उत्तराखंड की गई, लेकिन बड़े पदों पर स्थानीय भागीदारी नगण्य रही। जब युवा आवाज उठाते हैं तो प्रशासनिक सख्ती देखने को मिलती है। सवाल सीधा है—क्या यह विकास मॉडल स्थानीय लोगों के हित में है या केवल उद्योगपतियों के लिए? उत्तराखंड को जवाब चाहिए।




