उत्तराखंड की धरती सिर्फ देवभूमि नहीं है, यह श्रम, संघर्ष और स्वाभिमान की भूमि भी है। यहां के लोग सदियों से प्रकृति की गोद में कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने जीवन को जिया करते थे। लेकिन आज वही पहाड़, जिनसे जलधाराएं बहती थीं, अब पलायन की धाराओं से सूखते जा रहे हैं। रोजगार की तलाश में लोग मैदानों की ओर भाग रहे हैं। खेती की जमीनें बंजर हो रही हैं, गांव वीरान हो रहे हैं, और सरकारें घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ रहीं।
लेकिन इस सबके बीच एक अद्भुत बात हुई। जो चीज पहले बेकार समझी जाती थी—लकड़ी जलने के बाद बची चूल्हे की राख—वह आज ‘डिश वॉशिंग वुड ऐश’ बनकर ऑनलाइन बिक रही है, वह भी अच्छी कीमत पर। इसे कहते हैं मार्केटिंग।
राख की महिमा: दादी की सीख से ऑनलाइन तक
पहले दादी, मां, चाची सभी इसी राख से बर्तन मांजती थीं। राख न सिर्फ साफ करती थी बल्कि रसायनों से मुक्त एकदम देसी तरीका थी। लेकिन तब इसे ‘पर्यावरण हितैषी’ नहीं कहा जाता था, बस ‘घरेलू तरीका’ माना जाता था। आज वही राख अच्छे डिब्बों में बंद होकर ऑनलाइन मार्केट में पहुंच चुकी है। नाम है—डिश वॉशिंग वुड ऐश। पैकेट पर हरे रंग का ऑर्गेनिक का सर्टिफिकेट, और दाम—आप सोच भी नहीं सकते।
क्या उत्तराखंड की राख जलने के बाद चमक सकती है?
उत्तराखंड सरकार अगर इस पर गंभीर हो तो चूल्हे की राख इस राज्य के लिए एक स्थायी और स्थानीय रोजगार का स्रोत बन सकती है। गांव-गांव में लकड़ी से खाना बनता है, चूल्हे जलते हैं, राख बनती है, और वहीं से शुरू हो सकता है एक नया बिज़नेस मॉडल। महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल सकता है, पैकिंग की यूनिट गांवों में खोली जा सकती है, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ‘Organic Himalayan Ash’ नाम से ब्रांड बन सकता है।
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