हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स – विशेष राजनीतिक संपादकीय विश्लेषण
लेखक: अवतार सिंह बिष्ट, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)

जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है” — जनता के गुस्से और सत्ता के डर का नया राजनीतिक प्रतीक?उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की गलियों में इन दिनों एक नया नारा गूंज रहा है —
जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है!”
यह नारा सिर्फ विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि उस सत्ता के भय और जनता की निराशा का आईना बन चुका है, जो अपने ही लोगों से संवाद करने की बजाय पुलिस की ढाल के पीछे छिप जाती है।
गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक, खासकर राजधानी देहरादून में, यह नारा अब हर आंदोलनकारी की जुबान पर है — चाहे मुद्दा नकल माफिया के खिलाफ हो, बेरोजगारी के खिलाफ हो या भूमि घोटालों के खिलाफ।
पिछले एक वर्ष में ऐसे कई मौके आए जब जनता की आवाज़ को पुलिस की लाठी से दबाने की कोशिश की गई। मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ते छात्र, युवा, बेरोजगार या राज्य आंदोलनकारी—सबका स्वागत “संवाद” से नहीं, “बल प्रयोग” से किया गया।
देहरादून की सड़कों से उठता सवाल: लोकतंत्र का रास्ता लाठी से क्यों जाता है?
राजधानी की हर बड़ी सड़क ने हाल के महीनों में आंदोलन और प्रतिबंध दोनों का संगम देखा है।
- नकल माफिया के खिलाफ छात्र संगठनों का प्रदर्शन,
- राज्य आंदोलनकारियों की पुरानी मांगों को लेकर धरना,
- स्वास्थ्य व शिक्षा नीति में भ्रष्टाचार के विरोध में पत्रकारों व सामाजिक संगठनों का प्रदर्शन,
- महिला संगठनों द्वारा लगातार धरना और पुलिसिया रवैये पर सवाल।
इन सबका जवाब सरकार ने “संवाद” से नहीं, बल्कि पुलिस बल की तैनाती और निषेधाज्ञाओं से दिया।
ऐसे में यह नारा “जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है” एक राजनीतिक टिप्पणी बन गया है — जो शासन की शैली पर तीखा व्यंग्य भी है और जनता के मन की निराशा का प्रतीक भी।
राष्ट्रपति का भाषण — सत्ता के लिए आईना, जनता के लिए प्रेरणा
उत्तराखंड की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विधानसभा के विशेष सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का भाषण जितना प्रेरणादायक था, उतना ही आत्ममंथन कराने वाला भी।
उन्होंने बड़ी सादगी से वह सब कहा, जो जनता सालों से कहना चाहती थी —
कि उत्तराखंड की आत्मा सिर्फ पहाड़ों में नहीं, जनता की संवेदनाओं में बसती है।
राष्ट्रपति ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनता की समस्याओं के समाधान की दिशा में कार्य करना चाहिए।”
यह वाक्य एक संविधानिक चेतावनी थी — कि जनता के धैर्य की परीक्षा अब ज्यादा नहीं ली जा सकती।
उन्होंने राज्य आंदोलनकारियों के बलिदान का सम्मान करते हुए कहा कि उत्तराखंड का निर्माण संघर्ष, समर्पण और बलिदान से हुआ है। इसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आप सभी की है।”
उनका भाषण उस “आईने” की तरह था जिसमें सत्ता का अहंकार, राजनीतिक लालच और जनता का मौन सब कुछ झलक रहा था।
सरकार की उपलब्धियां — जिन पर भरोसा और सवाल दोनों हैं
न्याय के साथ विकास का जो मॉडल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रस्तुत किया, उसमें कई सकारात्मक बिंदु भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता—
- UCC (समान नागरिक संहिता) पर देश में सबसे पहले निर्णायक कदम उठाया।
- ड्रग्स और नशे के खिलाफ कई बड़े अभियान चलाए।
- तीर्थाटन और धार्मिक पर्यटन में राज्य ने उल्लेखनीय बढ़त की।
- सीमा और पहाड़ के संपर्क मार्गों में तेजी से सुधार हुआ।
लेकिन इन उपलब्धियों की छाया में यह भी सच्चाई है कि—
- बेरोजगारी आज भी राज्य की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।
- नकल माफिया और भर्ती घोटाले लगातार शासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
- राज्य आंदोलनकारियों को सम्मान और अधिकार आज भी अधूरे हैं।
- और सबसे बड़ी बात, सरकार जनता के साथ संवाद खोती जा रही है।
धामी की चुनौती: जनता से सीधा संवाद या डर की राजनीति?
जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है” —
यह नारा सिर्फ विरोध का शोर नहीं है, यह लोकतंत्र की चेतावनी है।
क्योंकि जब जनता को अपने ही प्रतिनिधियों से बात करने के लिए लाठी और बैरिकेड्स पार करने पड़ें, तब सत्ता को आत्ममंथन करना चाहिए।
मुख्यमंत्री धामी के पास अभी भी मौका है कि वह इस नारे को अपने खिलाफ न रहने दें, बल्कि इसे अपने भीतर झाँकने का अवसर बनाएं।
क्योंकि जनता चाहती है कि उत्तराखंड का नेतृत्व संवादप्रिय, संवेदनशील और संघर्षशील हो — न कि डरकर पुलिस की ढाल के पीछे खड़ा।
नारा जो राजनीति को आईना दिखाता है
जब-जब धामी डरता है, पुलिस को आगे करता है”
— इस नारे को एक नया सकारात्मक रूप भी दिया जा सकता है:
“जब-जब जनता बोलती है, सरकार सुधार करती है।”
यही परिवर्तन की दिशा है। यही लोकतंत्र की आत्मा है।
और यही वह भाव है, जो राष्ट्रपति मुर्मू के भाषण से लेकर जनता के आंदोलनों तक हर जगह झलक रहा है —
कि उत्तराखंड को अब सत्ता का नहीं, संवाद का राज्य बनना होगा।
उत्तराखंड की रजत जयंती पर यह सवाल सबसे बड़ा है—
क्या सरकार जनता की आवाज़ से डरेगी या उसे सुनेगी?
क्योंकि इतिहास यही कहता है—
जब-जब सत्ता डरती है, जनता जागती है।”
और इस बार, जनता जाग चुकी है।

