राज्यसभा सांसदों के लगातार इस्तीफों और एनडीए के साथ जाने की चर्चाओं ने ममता दीदी की टीएमसी की नींव हिला दी है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
TMC के भीतर चल रहा राजनीतिक संकट बुधवार को और गहरा गया, जब पार्टी राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफा देने से कुछ दिन पहले ही राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने भी तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी थी और संसद से इस्तीफा दे दिया था। दोनों नेताओं ने अपने फैसले की घोषणा करते हुए पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों का हवाला दिया है। वहीं कई प्रमुख सांसदों के नाम नेतृत्व को चुनौती देने वाले असंतुष्ट गुट के सदस्य के रूप में सामने आए हैं। आइए जानते हैं कौन हैं वो 19 सांसद जिन्होंने ममता दीदी से बगावत कर दी है?
ममता का साथ छोड़ने वाले 19 सांसद कौन हैं?
मीडिया में सूत्रों के हवाले से आई खबरों के अनुसार इस विद्रोह से जुड़े सांसदों की लिस्ट में अबू ताहिर खान, पार्थ भौमिक, काकोली घोष दस्तीदार, बापी हलदार, सायोनी घोष, रचना बनर्जी, असित मल, के रहमान, शर्मिला सरकार, मिताली बाग, कालीपद सोरेन, जून मालिया,माला रॉय, देव अधिकारी, शताब्दी रॉय, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया अरूप चक्रवर्ती के अलावा शत्रुघ्न सिन्हा और यूसुफ पठान का भी नाम शामिल हैं।
क्या शत्रुघन सिन्हा और यूसूफ पठान ने दे दिया इस्तीफा?
सूत्रों का दावा है कि यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा और सायोनी घोष सहित 19 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए में शामिल होने की मंशा जाहिर की है। हालांकि शुत्रघन सिन्हा, सायोनी घोष और युसूफ पठान ने अपने इस्तीफे की अधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
काकोली घोष ने संभाली बागडोर
ये घटनाक्रम विद्रोही सांसद काकोली घोष दस्तीदार द्वारा सोमवार को किए गए उस दावे के बाद सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ जुड़ना चाहते हैं। काकोली विद्रोह का चेहरा बनकर उभरी हैं और वह असंतुष्ट गुट का नेतृत्व कर रही हैं जिसने खुले तौर पर पार्टी नेतृत्व को चुनौती दी है।
राजनीतिक गलियारों में काकोली घोष दस्तीदार की भूमिका को विशेष महत्व दिया जा रहा है। बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा मुहैया कराए जाने वाली वह तृणमूल कांग्रेस की पहली मौजूदा सांसद थीं। इसे उस समय से ही उनके और भाजपा नेतृत्व के बीच बदलते राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा था।
