उत्तराखंड बंद: सवाल, संवेदना और सियासतअंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखंड की@अंकिता प्रकरण में राज्य आंदोलनकारियों का स्पष्ट रुख, बंद से किया किनारा

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रुद्रपुर उत्तराखंड, सामूहिक चेतना को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला केवल एक बेटी की नृशंस हत्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्याय व्यवस्था, सत्ता की जवाबदेही और कथित ‘वीआईपी’ संरक्षण जैसे गंभीर प्रश्नों का प्रतीक बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में सीबीआई जांच और वीआईपी के नाम उजागर करने की मांग को लेकर आहूत ‘उत्तराखंड बंद’ ने राज्य में बहस को एक नई दिशा दी।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

अंकिता प्रकरण में राज्य आंदोलनकारियों का स्पष्ट रुख, बंद से किया किनारा
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद ने स्पष्ट किया कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में वे शुरू से ही सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। परिषद ने यह भी बताया कि 11 जनवरी को प्रस्तावित उत्तराखंड बंद का उन्होंने पहले ही खंडन कर दिया था। राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि न्याय की लड़ाई जनहित और शांति के साथ लड़ी जानी चाहिए, न कि जनता को असुविधा में डालकर। परिषद ने कहा कि वे किसी भी राजनीतिक या संगठनात्मक बंद का हिस्सा नहीं हैं और केवल निष्पक्ष, पारदर्शी व समयबद्ध जांच के पक्षधर हैं।


हालांकि, इस बंद का असर प्रदेश में एकसमान नहीं रहा। गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों—विशेषकर अंकिता के गृह क्षेत्र श्रीनगर गढ़वाल—में जहां जनभावनाएं सड़कों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दीं, वहीं रुद्रपुर,खटीमा,देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश और अन्य मैदानी इलाकों में जनजीवन लगभग सामान्य रहा। यह असमानता इस बात का संकेत है कि जनता के भीतर आक्रोश के साथ-साथ व्यावहारिक सवाल भी खड़े हो चुके हैं।
मुख्यमंत्री द्वारा सीबीआई जांच की घोषणा के बाद भी बंद का आयोजन होना कई लोगों को असमंजस में डालता है। व्यापारिक संगठनों और आम नागरिकों का एक वर्ग यह मानता है कि जब प्रमुख मांग मान ली गई है, तो बार-बार बंद का आह्वान जनसुविधा के विरुद्ध है। यह तर्क पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। लगातार बंद से न केवल आम नागरिक प्रभावित होता है, बल्कि आंदोलन की नैतिक ताकत भी कमजोर पड़ने का खतरा रहता है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों का कहना है कि केवल सीबीआई जांच पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और वीआईपी के नामों का खुलासा उनकी मूल मांग है, क्योंकि जनता का भरोसा तभी बहाल होगा जब जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे। यह अविश्वास अपने आप में राज्य की शासन व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
दरअसल, यह बंद केवल सड़कों पर दुकानों के खुलने या बंद होने का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस खाई को उजागर करता है जो जनता की संवेदनाओं और राजनीतिक रणनीतियों के बीच बनती जा रही है। अंकिता के लिए न्याय की लड़ाई में संवेदना जरूरी है, लेकिन उसी संवेदना को राजनीतिक जिद में बदल देना भी उचित नहीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार जांच प्रक्रिया को केवल घोषणा तक सीमित न रखे, बल्कि समयबद्ध, पारदर्शी और विश्वसनीय कार्रवाई से जनता का भरोसा जीते। वहीं, विपक्ष और सामाजिक संगठनों को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि न्याय की लड़ाई को जनता की दैनिक जिंदगी के विरुद्ध खड़ा करना कितना उचित है।
अंकिता को न्याय तभी मिलेगा जब संवेदना, विवेक और जवाबदेही—तीनों एक साथ चलें। वरना बंद की राजनीति में सच कहीं पीछे छूट जाएगा।


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