

उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर वैचारिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। इस बार स्वर बुलंद किया है उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की सक्रिय महिला नेत्री प्रमिला रावत ने, जिन्होंने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों को “धूल चटाने” का आह्वान करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। उनका यह संदेश केवल चुनावी हुंकार नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल आत्मा को पुनर्जीवित करने का प्रयास प्रतीत होता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
प्रमिला रावत ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि उत्तराखंड का निर्माण केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता, क्षेत्रीय स्वाभिमान, बोली-भाषा और धार्मिक आस्थाओं की रक्षा के लिए हुआ था। 9 नवंबर 2000 को जब पृथक राज्य अस्तित्व में आया, तब इसकी परिकल्पना में पहाड़ की पीड़ा, पलायन की समस्या, बेरोजगारी और स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय अधिकार की भावना प्रमुख थी। किंतु पिछले दो दशकों में राष्ट्रीय दलों की सत्ता राजनीति ने इन मूल उद्देश्यों को हाशिए पर धकेल दिया—ऐसा आरोप यूकेडी लगातार लगाती रही है।
रावत का तर्क है कि राष्ट्रीय पार्टियों ने उत्तराखंड को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया, जहां नेतृत्व अक्सर बाहर से थोपा गया और स्थानीय मुद्दे घोषणापत्रों तक सीमित रह गए। राज्य की सांस्कृतिक पहचान—गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी बोली—को वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी अपेक्षा थी। मंदिरों और धार्मिक स्थलों की परंपराओं में सरकारी हस्तक्षेप पर भी समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं, जिससे धार्मिक आस्था से जुड़े वर्गों में असंतोष पनपा।
प्रमिला रावत ने अपने संदेश में महिला शक्ति और युवाओं को विशेष रूप से संबोधित किया। उनका कहना है कि यदि राज्य की मूल अवधारणा को पुनः स्थापित करना है तो क्षेत्रीय नेतृत्व को सशक्त करना होगा। यूकेडी, जिसने राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, आज पुनर्गठन और पुनरुत्थान के दौर से गुजर रही है। रावत का वीडियो इसी पुनर्जागरण की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। यूकेडी को ठोस संगठनात्मक ढांचा, स्पष्ट आर्थिक दृष्टि और मजबूत नेतृत्व प्रस्तुत करना होगा। 2027 का चुनाव केवल राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह विकास मॉडल, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी केंद्रित रहेगा।
फिर भी, प्रमिला रावत की पहल को हल्के में नहीं लिया जा सकता। पहाड़ की राजनीति में जब भी अस्मिता और स्वाभिमान का प्रश्न उठा है, उसने अप्रत्याशित परिणाम दिए हैं। यदि यूकेडी राज्य आंदोलन की विरासत को समकालीन मुद्दों से जोड़ पाने में सफल होती है, तो वह राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
अंततः प्रश्न यही है—क्या उत्तराखंड अपनी मूल आत्मा की ओर लौटना चाहता है, या राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा में ही अपनी दिशा तलाशेगा? प्रमिला रावत का आह्वान इसी द्वंद्व को पुनः जीवंत करता है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि यह आवाज़ एक क्षणिक प्रतिध्वनि थी या परिवर्तन की ठोस शुरुआत।




