

वहीं दूसरी तरफ नेपाल की सत्ता संभालते ही देश के भीतर बड़े और सख्त सुधारों का एजेंडा लागू कर दिया है. बालेन शाह ने 100 सूत्रीय एक्शन प्लान लाकर साफ कर दिया है कि उनकी सरकार तेजी से बदलाव के मूड में है.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने पुष्टि की है कि भारत सरकार का निमंत्रण स्वीकार कर लिया गया है और दोनों देशों के विदेश मंत्रालय इस यात्रा की तैयारियों में जुट गए हैं. यह दौरा बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पहली बड़ी कूटनीतिक पहल होगी. इससे पहले नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड जून 2023 में भारत आए थे. ऐसे में इस यात्रा को भारत-नेपाल संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.
क्यों अहम बालेन शाह की यह भारत यात्रा?
बालेन शाह की यह भारत यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पद संभालने के बाद यह उनकी पहली बड़ी कूटनीतिक पहल है. इसे काठमांडू के सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने के प्रयास की तरह देखा जा रहा है. भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार, प्रमुख पारगमन मार्ग और बुनियादी ढांचे, ऊर्जा तथा कनेक्टिविटी परियोजनाओं में एक प्रमुख हितधारक बना हुआ है. यही कारण है कि शुरुआती जुड़ाव राजनीतिक और आर्थिक दोनों ही नजरिये से महत्वपूर्ण है.
नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा को देखते हुए, इस यात्रा का मुख्य जोर सीमा-पार सहयोग, व्यापार को सुगम बनाने और लोगों के आपसी आवागमन पर रहने की भी उम्मीद है. कूटनीतिक दृष्टि से भी यह यात्रा काफी अहमियत रखती है, क्योंकि यह ऐसे समय में हो रही है जब शाह अपने देश में शासन-प्रशासन संबंधी सुधारों को आगे बढ़ा रहे हैं, और नई दिल्ली के साथ मज़बूत संबंध इन विकास पहलों को समर्थन देने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं.
घरेलू मोर्चे पर भी खूब तीर चला रहे पीएम बालेन
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता के साथ-साथ बालेन शाह ने घरेलू मोर्चे पर भी एक के बाद एक बड़े फैसले लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है. उनकी सरकार ने वीआईपी कल्चर पर रोक, सरकारी कामकाज में देरी खत्म करने, गरीबों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने, महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और बच्चों के लिए तनावमुक्त शिक्षा जैसे कई अहम मुद्दों पर काम शुरू कर दिया है.
सबसे विवादित और चर्चित फैसला छात्र राजनीति पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का है. सरकार ने आदेश दिया है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों में सक्रिय सभी राजनीतिक छात्र संगठनों को 90 दिनों के भीतर खत्म कर दिया जाए. उनकी जगह गैर-राजनीतिक छात्र परिषदें या ‘वॉयस ऑफ स्टूडेंट्स’ जैसे मंच बनाए जाएंगे. इस फैसले का ऐलान करते हुए बालेन शाह ने कहा कि अब शैक्षणिक संस्थान राजनीति के अखाड़े नहीं, बल्कि केवल पढ़ाई के केंद्र होंगे.
सरकार का तर्क है कि लंबे समय से छात्र राजनीति के कारण कैंपसों में हिंसा, तोड़फोड़, जबरन वसूली और पढ़ाई में बाधा जैसी समस्याएं बढ़ रही थीं. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कदम युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को कमजोर कर सकता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है.
शिक्षा व्यवस्था पर भी बड़ी पहल
इसी तरह सरकार ने नौकरशाही और शिक्षा व्यवस्था को भी राजनीति से अलग करने का फैसला लिया है. नए नियमों के तहत सरकारी कर्मचारी और शिक्षक किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं रह सकेंगे. साथ ही सरकारी संस्थानों में सक्रिय राजनीतिक यूनियनों को भी खत्म किया जाएगा. समर्थकों का मानना है कि इससे प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी, जबकि विरोधियों को आशंका है कि इससे कर्मचारियों की सामूहिक आवाज कमजोर हो सकती है.
शिक्षा क्षेत्र में भी कई बड़े बदलावों की घोषणा की गई है. अब स्नातक में प्रवेश के लिए नागरिकता अनिवार्यता हटाने का प्रस्ताव है. परीक्षा परिणाम समय पर घोषित करने के लिए सख्त शैक्षणिक कैलेंडर लागू किया जाएगा. पांचवीं कक्षा तक आंतरिक परीक्षाएं खत्म कर वैकल्पिक मूल्यांकन प्रणाली लाई जाएगी.
बालेन शाह सरकार ने अपने विरोधियों के खिलाफ भी सख्त रुख अपनाया है. पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है. उन पर पिछले साल हुए जन-आंदोलनों के दौरान दमन के आरोप हैं, जिसमें कई लोगों की जान गई थी. इसी मामले में पूर्व मंत्री रमेश लेखाक को भी हिरासत में लिया गया है. यह कदम राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील माना जा रहा है.
जेन-जी आंदोलनकारियों के लिए भी बड़ा फैसला
सरकार ने जनआंदोलनों में मारे गए छात्रों के परिवारों के लिए भी बड़ा फैसला लिया है. कैबिनेट की पहली बैठक में तय किया गया कि ऐसे 27 छात्रों के परिवारों के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी. नेपाल विद्युत प्राधिकरण ने इसके लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी भी कर ली है.
महज 35 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने बालेन शाह ने अपनी राजनीति की शुरुआत एक एंटी-एस्टैब्लिशमेंट चेहरे के रूप में की थी. उनकी पार्टी की जीत युवाओं के गुस्से और बदलाव की चाह का नतीजा मानी जा रही है. अब उनके सामने चुनौती यह है कि वह इन तेज और बड़े फैसलों को जमीनी स्तर पर कितना लागू कर पाते हैं.
कुल मिलाकर, बालेन शाह की सरकार ने शुरुआत में ही यह संकेत दे दिया है कि वह परंपरागत राजनीति से अलग रास्ता अपनाने जा रही है. हालांकि, यह देखना बाकी है कि ये सुधार लंबे समय तक टिकाऊ साबित होंगे या फिर इससे एक नया राजनीतिक टकराव पैदा होगा.




