उत्तराखंड के मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित अनेक होटल, ढाबों और छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में आज भी नाबालिग बच्चों से कार्य कराए जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई मामलों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को अग्रिम धनराशि, ऋण या अन्य प्रलोभन देकर बच्चों को काम पर भेजने के लिए प्रेरित किया जाता है। कुछ बच्चे अपने माता-पिता या रिश्तेदारों द्वारा बेहतर जीवन और रोजगार की आशा में भेजे जाते हैं, लेकिन बाद में वे लंबे समय तक श्रम करने के लिए विवश हो जाते हैं।
यह स्थिति बाल श्रम और कई मामलों में बंधुआ मजदूरी जैसी गंभीर सामाजिक समस्याओं को जन्म देती है। ऐसे बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित बचपन के अपने मूल अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। होटलों, ढाबों, चाय की दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों में कार्यरत नाबालिग बच्चों का जीवन कठिन परिश्रम, कम पारिश्रमिक और शोषण के जोखिम से घिरा रहता है।
हमें यह समझना होगा कि किसी भी परिवार की गरीबी का समाधान बच्चों से श्रम कराना नहीं हो सकता। समाज, प्रशासन और नागरिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा मजदूरी करने के लिए मजबूर न हो तथा प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानपूर्ण जीवन का अवसर प्राप्त हो। :::
ध्यान रहे कि “लाखों बंधुआ मजदूर” या किसी विशेष संख्या का उल्लेख तभी करें जब उसके समर्थन में विश्वसनीय सरकारी या शोध आधारित आँकड़े उपलब्ध हों। बिना प्रमाण के बड़ी संख्या लिखना उचित नहीं होगा।
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