गौला की रेत से ‘डी-कंपनी’ का कनेक्शन: जब मुंबई अंडरवर्ल्ड के इशारों पर नाचता था हल्द्वानी!
हल्द्वानी। आज अपनी शांत वादियों और व्यापार के लिए मशहूर कुमाऊं का यह ‘प्रवेश द्वार’ कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड की तर्ज पर चलता था। 80 और 90 के दशक में हल्द्वानी की सड़कों पर कानून का नहीं, बल्कि बंदूकों का राज था। पहाड़ों से बहने वाली गूलों का साफ़ पानी तब तस्करों और गैंगस्टरों की आपसी खूनी रंजिश के लाल रंग में बदल चुका था।
इस काले साम्राज्य की बुनियाद टिकी थी हल्द्वानी की जीवनरेखा गौला नदी के खनन, बेशकीमती लीसा और जंगलों की लकड़ी पर। इस अकूत दौलत पर कब्जा जमाने के लिए भोपाल सिंह रावत, रमेश बंबाईया और प्रकाश पांडे (पीपी) जैसे स्थानीय बाहुबलियों ने अपने-अपने खूंखार सिंडिकेट खड़े किए। ताकत और आधुनिक हथियारों की भूख इन्हें सीधे मुंबई के दाऊद इब्राहिम (डी-कंपनी) और छोटा राजन गैंग के दरवाज़े तक ले गई। हालात ये थे कि हल्द्वानी के व्यापारियों को रंगदारी के लिए सीधे बैंकॉक और वियतनाम के इंटरनेशनल नंबरों से धमकियां मिलती थीं।
दिन-दिहाड़े सरेआम गोलियां चलना और व्यापारियों से चौथ वसूली उस दौर की कड़वी हकीकत थी। शाम ढलते ही पूरा शहर खौफ के सन्नाटे में डूब जाता था। हालांकि, बाद में पुलिस के ‘ऑपरेशन क्लीन’ और एसटीएफ की ताबड़तोड़ एनकाउंटर नीति ने इस सिंडिकेट को जड़ से उखाड़ फेंका। आज भले ही हल्द्वानी बदल चुका है, लेकिन जरायम की दुनिया के ये खौफनाक पन्ने आज भी पुराने निवासियों के जेहन में सिहरन पैदा कर देते हैं
रमेश बंबाईया और प्रकाश पांडे (पीपी) की खूनी जंग
80 के दशक के आखिरी सालों और 90 के दशक की शुरुआत में कुमाऊं क्षेत्र (विशेषकर हल्द्वानी, नैनीताल और लालकुआं) में जरायम की दुनिया पर एकाधिकार जमाने के लिए जबरदस्त गैंगवार छिड़ा।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
- अदावत की शुरुआत: रमेश चिलवाल उर्फ रमेश बंबाईया उस समय हल्द्वानी का बेताज बादशाह बन चुका था। शराब की तस्करी, गौला नदी का खनन, और लीसा के अवैध व्यापार पर उसका पूरा कब्जा था। इसी दौरान प्रकाश पांडे (पीपी) नाम का युवा अपराध की दुनिया में अपना पैर पसारने की कोशिश कर रहा था। पीपी ने बंबाईया के सिंडिकेट को चुनौती देना शुरू कर दिया।
- सरेआम गोलीबारी: वर्चस्व की इस जंग में प्रकाश पांडे (पीपी) ने रमेश बंबाईया को जान से मारने की नीयत से हल्द्वानी में उस पर सरेआम अंधाधुंध फायरिंग करवा दी। बंबाईया इस हमले में बच तो गया, लेकिन इस घटना ने नैनीताल पुलिस के होश उड़ा दिए। पुलिस ने पीपी को ‘मोस्ट वांटेड’ घोषित कर जगह-जगह उसके पोस्टर लगा दिए।
- मुंबई क्राइम ब्रांच का दखल: कहा जाता है कि मुंबई क्राइम ब्रांच का एक अधिकारी जब नैनीताल घूमने आया, तो उसने पीपी का पोस्टर देखा और स्थानीय पुलिस को बताया कि यह कोई मामूली अपराधी नहीं, बल्कि मुंबई के छोटा राजन गैंग का बेहद खतरनाक शूटर है।
- गैंगवार का अंत और नया मोड़: बंबाईया का अंत भी खूनी रहा, जब उसने खनन टेंडर विवाद में पवन जोशी नाम के व्यक्ति की हत्या कर दी और बाद में वह खुद भी मारा गया। वहीं दूसरी तरफ, पीपी भारत से भागकर वियतनाम और बैंकॉक चला गया, जहां वह छोटा राजन का राइट हैंड बना। साल 2010 में मुंबई क्राइम ब्रांच ने पीपी को वियतनाम से गिरफ्तार किया।
- वर्तमान स्थिति: प्रकाश पांडे (पीपी) फिलहाल उत्तराखंड की जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। सितंबर 2024 में उसने जेल के भीतर ही दीक्षा लेकर ‘संन्यासी’ (प्रकाशानंद गिरी) बनने की घोषणा की, जिससे वह एक बार फिर मीडिया की सुर्खियों में आया।
अंडरवर्ल्ड के पनपने का कारण: प्राकृतिक संसाधनों की लूट
80 के दशक में हल्द्वानी और उसके आसपास के तराई क्षेत्रों में कोई औद्योगिक फैक्ट्रियां नहीं थीं। यहां पैसा कमाने के केवल तीन ही मुख्य जरिए थे, जिन पर अंडरवर्ल्ड ने कब्जा कर लिया:
- गौला नदी का खनन: हल्द्वानी की जीवनरेखा कही जाने वाली गौला नदी से बजरी, रेत और पत्थरों का अवैध खनन इस काले साम्राज्य की रीढ़ बना।
- लीसा (Resin) की तस्करी: चीड़ के पेड़ों से निकलने वाले मूल्यवान लीसा की अवैध तस्करी कर बड़े पैमाने पर काला धन कमाया जाने लगा।
- जंगलों से बेशकीमती लकड़ी का कटान: तराई के घने जंगलों से सागौन और शीशम जैसी कीमती लकड़ियों की तस्करी शुरू हुई।
इन अवैध धंधों के टेंडरों पर कब्जा करने के लिए भोपाल सिंह रावत, रमेश बंबाईया और प्रकाश पांडे (पीपी) जैसे स्थानीय अपराधियों ने अपने-अपने गैंग बना
. हल्द्वानी का मुंबई अंडरवर्ल्ड से सीधा कनेक्शन
जैसे-जैसे लीसा और लकड़ी तस्करी से पैसा बढ़ा, इन स्थानीय गैंग्स का दुस्साहस भी बढ़ा। स्थानीय पुलिस से बचने और आधुनिक हथियार (जैसे उस दौर में पहली बार तराई में एके-47 और विदेशी पिस्तौलें देखी गईं) हासिल करने के लिए इन्होंने मुंबई के डी-कंपनी (दाऊद इब्राहिम) और छोटा राजन गैंग से संपर्क साधा।
- छोटा राजन का ‘राइट हैंड’ बना हल्द्वानी का शूटर: काठगोदाम का प्रकाश पांडे (पीपी) हल्द्वानी से भागकर सीधे मुंबई के सेंट्रल रेलवे स्टेशन पहुंचा। वहां वह छोटा राजन गैंग के विक्की मल्होत्रा और पुनीत तानाशाह के संपर्क में आया। राजन ने पीपी की बेखौफ शैली को देखते हुए उसे अपना बेहद खास शूटर बना लिया और जरायम की दुनिया में उसे नया नाम ‘बंटी पांडे’ मिला।
- इंटरनेशनल नेटवर्क: 80 के दशक के आखिर तक स्थिति यह थी कि हल्द्वानी के व्यापारी या ठेकेदार अगर स्थानीय गैंग्स को रंगदारी देने से मना करते, तो उन्हें सीधे बैंकॉक, वियतनाम या दुबई से अंडरवर्ल्ड के इंटरनेशनल नंबरों से धमकी भरे फोन आते थे।
हल्द्वानी पर इसके क्या-क्या असर हुए?
(क) खूनी गैंगवार और सरेआम हत्याएं
80 के दशक के उत्तरार्ध में हल्द्वानी के बाजारों और सड़कों पर सरेआम गोलियां चलना आम बात हो गई थी। रमेश बंबाईया और पीपी गैंग के बीच वर्चस्व की जंग इतनी बढ़ी कि हल्द्वानी के बाजारों में दिन-दिहाड़े व्यापारियों के सामने शूटर एक-दूसरे पर गोलियां बरसाते थे। आम नागरिकों में इस कदर खौफ बैठ गया था कि लोग शाम ढलते ही घरों के अंदर दुबक जाते थे।
(ख) ठेकेदारी और व्यापार में ‘माफिया राज’
गौला नदी के खनन के पट्टे (टेंडर) और लोक निर्माण विभाग (PWD) के सरकारी ठेके लोकतांत्रिक तरीके से नहीं, बल्कि बंदूक की नोंक पर तय होने लगे。 अंडरवर्ल्ड के डर से कोई भी आम ठेकेदार टेंडर डालने की हिम्मत नहीं करता था। पूरी अर्थव्यवस्था पर माफिया का सिंडिकेट हावी हो चुका था।
(ग) युवाओं का जरायम की तरफ झुकाव
अंडरवर्ल्ड के इस ग्लैमर, अंधाधुंध पैसे और रसूख को देखकर हल्द्वानी, काठगोदाम और लालकुआं के कई स्थानीय भटके हुए युवा इन गैंगस्टरों के ‘शूटर’ या ‘मुखबिर’ बनने की राह पर चल पड़े। इससे कई हंसते-खेलते कुमाऊनी परिवार तबाह हो गए।
(घ) पुलिसिंग और कानून व्यवस्था का पूरी तरह फेल होना
उत्तराखंड उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। स्थानीय पुलिस इन गैंगस्टरों के सामने असहाय नजर आती थी। पुलिस को यह अंदाजा ही नहीं था कि काठगोदाम की गलियों में घूमने वाले लड़के मुंबई की डी-कंपनी के साथ मिलकर दाऊद और छोटा राजन के लिए ‘सुपारी किलिंग’ (कॉन्ट्रैक्ट किलिंग) का नेटवर्क चला रहे हैं। जब मुंबई क्राइम ब्रांच ने आकर नैनीताल पुलिस को इन इनपुट्स से चौंकाया, तब जाकर स्थानीय प्रशासन की नींद टूटी।
अंततः क्या हुआ?
90 के दशक के आते-आते पुलिस ने ‘एनकाउंटर’ और सख्त धरपकड़ नीति अपनाई।
- रमेश बंबाईया का साम्राज्य जेल जाने और आपसी हत्याओं के बाद खत्म हुआ।
- प्रकाश पांडे (पीपी) वियतनाम भाग गया था, जिसे साल 2010 में प्रत्यर्पित (Extradite) कर भारत लाया गया। वह फिलहाल उम्रकैद की सजा काट रहा है और हाल ही में जेल के भीतर ही ‘संन्यासी’ (प्रकाशानंद गिरी) बन चुका है।
80 के दशक की इस अंडरवर्ल्ड संस्कृति ने हल्द्वानी को जो जख्म दिए, उसकी वजह से आगे चलकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहां पुलिसिंग और एसटीएफ (STF) को बेहद मजबूत किया गया, ताकि शांत पहाड़ों में दोबारा ऐसा खौफनाक दौर लौटकर न आ सके।
- ITI गैंग का उदय और अंत: पिछले कुछ समय में हल्द्वानी और काशीपुर के इलाकों में ‘ITI गैंग’ (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान के भटके युवाओं द्वारा शुरू किया गया गिरोह) ने पैर पसारे थे। यह गैंग मुख्य रूप से रंगदारी, जमीन कब्जाने, कट्टा लहराकर सोशल मीडिया पर रील्स बनाने और स्थानीय व्यापारियों को डराने का काम करता था।
- एसटीएफ (STF) और पुलिस का कड़ा रुख: उत्तराखंड स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और कुमाऊं रेंज की पुलिस ने हाल के महीनों में सख्त कार्रवाई करते हुए ITI गैंग के सरगनाओं और शूटरों को सलाखों के पीछे भेज दिया है।
- ड्रग्स (स्मैक) माफिया पर टारगेट: आज हल्द्वानी पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती खनन से ज्यादा ‘ड्रग तस्करी’ (स्मैक और चरस) है, जो यूपी के बरेली और फतेहगंज से हल्द्वानी सप्लाई की जा रही है। इसके खिलाफ पुलिस लगातार ‘एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स’ के जरिए गिरफ्तारियां और संपत्तियां कुर्क करने की कार्रवाई कर रही है।
- डिजिटल माइनिंग और पारदर्शिता: अब गौला नदी में खनन का पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत और डिजिटल हो चुका है। हर गाड़ी पर GPS ट्रैकिंग, सीसीटीवी कैमरे और ऑनलाइन ई-रवाना परमिट अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे पुराने जमाने के सिंडिकेट राज का लगभग पूरी तरह खात्मा हो चुका है।
80 और 90 के दशक में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन क्लीन’ और एनकाउंटर नीति अपनाई, तो उसका सीधा असर हल्द्वानी और पूरे तराई क्षेत्र पर पड़ा। उस दौर में नैनीताल पुलिस और एसटीएफ (STF) के गठन के बाद माफियाओं के सिंडिकेट को तोड़ने के लिए कई बड़ी कार्यवाहियां की गईं
रमेश बंबाईया (Ramesh Bambaiya) का अंत
रमेश चिलवाल उर्फ रमेश बंबाईया का हल्द्वानी में इतना खौफ था कि पुलिस भी फूंक-फूंक कर कदम रखती थी। [
- अपराध का चरम: बंबाईया ने वन विभाग के एक बैरियर (धर्मकांटा) पर रॉयल्टी विवाद को लेकर विनीत जोशी नाम के व्यक्ति की सरेआम हत्या कर दी थी। इस मर्डर के बाद जनता में भारी आक्रोश फैल गया और पुलिस पर भारी दबाव आ गया।
- पुलिस एक्शन और अंत: बंबाईया पुलिस के साथ सीधे एनकाउंटर में तो नहीं मरा, लेकिन पुलिस ने उस पर चौतरफा शिकंजा कसा। चौतरफा घेराबंदी और ताबड़तोड़ दबिशों के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा, जहां कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। करीब 8 साल जेल में काटने के बाद गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में उसकी मौत हो गई, और इस तरह हल्द्वानी के पहले बड़े सिंडिकेट का अंत हुआ।
तराई के जंगलों में ‘लकड़ी तस्करों’ के खिलाफ एनकाउंटर
80 के दशक में रामपुर, बरेली और मुरादाबाद के कई शातिर क्रिमिनल हल्द्वानी और लालकुआं के जंगलों में छिपकर सागौन और शीशम की तस्करी करते थे। इनके पास आधुनिक बंदूकें होती थीं और ये वन विभाग के रेंजरों पर सीधे हमला कर देते थे।
- बड़ी मुठभेड़ें: यूपी पुलिस के पीएसी (PAC) बल और स्थानीय पुलिस ने चोरगलिया, टांडा और लालकुआं के घने जंगलों में कॉम्बिंग ऑपरेशन चलाए।
- इन ऑपरेशन्स के दौरान कई खूंखार लकड़ी तस्करों को पुलिस ने मुठभेड़ (Encounters) में ढेर कर दिया, जिससे जंगलों में माफिया राज पर लगाम लगी।
3. नवाबी रोड की ऐतिहासिक डकैती और एनकाउंटर
हल्द्वानी के आपराधिक इतिहास में नवाबी रोड पर हुई एक बड़ी डकैती का मामला आज भी याद किया जाता है।
- हाई-प्रोफाइल एनकाउंटर: गाजियाबाद और अमरोहा के शातिर बदमाशों ने हल्द्वानी में करीब 25-26 लाख रुपये के जेवरातों की बड़ी डकैती डाली थी। बदमाशों ने रुद्रपुर की संजय कॉलोनी में एक ठिकाना बनाया हुआ था।
- तत्कालीन पुलिस कप्तान (एसएसपी) और पुलिस टीम ने जब इनके कमरे पर दबिश दी, तो बदमाशों ने सीधे फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने बदमाशों को दबोचा। इस गैंग का मुख्य सरगना बाद में गाजियाबाद पुलिस के साथ हुए एक भीषण एनकाउंटर में मारा गया।
स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का खौफ
- हल्द्वानी के हालिया सक्रिय गैंग्स (जैसे ITI गैंग) के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जानकारी दे सकता हूं
- तराई में लीसा और खनन सिंडिकेट के काम करने के पुराने तौर-तरीकों को विस्तार से समझा सकता हूं
हल्द्वानी और उधम सिंह नगर (तराई) में जब यूपी और मुंबई के गैंगस्टरों का दखल बहुत बढ़ गया, तब पुलिस ने अपराधियों के सफाए के लिए STF और एसओजी (SOG) जैसी विशेष विंग्स को मैदान में उतारा।
- एसटीएफ ने रंगदारी वसूलने वाले और छोटा राजन गैंग के लिए काम करने वाले लोकल शूटरों की लिस्ट बनाई।
- पुलिस की इस सख्त एनकाउंटर नीति और ‘टारगेटेड चेसिंग’ के डर से ही प्रकाश पांडे (पीपी) जैसे बड़े माफिया भारत छोड़कर बैंकॉक और वियतनाम भागने पर मजबूर हुए, जिन्हें सालों बाद इंटरनेशनल एजेंसियों की मदद से वापस लाकर सलाखों के पीछे डाला गया।
80 और 90 के दशक में हल्द्वानी और तराई क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों (लीसा और खनन) पर अंडरवर्ल्ड का कब्जा केवल बंदूकों के दम पर नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही संगठित, वैज्ञानिक और खतरनाक ‘सिंडिकेट सिस्टम’ काम कर रहा था।
लीसा (Resin) तस्करी का पुराना नेटवर्क और तौर-तरीके
चीड़ के पेड़ों से निकलने वाला लीसा साबुन, पेंट, और तारपीन के तेल के निर्माण के लिए बेहद कीमती कच्चा माल है। 80 के दशक में इसकी तस्करी का नेटवर्क कुछ इस तरह काम करता था:
- फर्जी परमिट (Fake Transit Pass): वन विभाग के नियम के अनुसार, पहाड़ों से लीसा नीचे लाने के लिए सरकारी ‘Transit Pass’ (रवानगी पर्ची) जरूरी होती थी। माफिया वन विभाग के भ्रष्ट कर्मचारियों के साथ मिलकर एक ही असली परमिट पर 10-10 अवैध गाड़ियां (ट्रक) पार करवा देते थे।
- तस्करी के गुप्त रूट: नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के जंगलों से भारी मात्रा में अवैध लीसा चोरी छिपे निकाला जाता था। हल्द्वानी के चोरगलिया, काठगोदाम और लालकुआं के घने जंगलों के रास्ते इन ट्रकों को बिना मुख्य चौकियों पर आए उत्तर प्रदेश के रामपुर, बरेली और मुरादाबाद की फैक्ट्रियों में सप्लाई कर दिया जाता था।
- जंगलों को नुकसान: ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए माफिया ठेकेदार चीड़ के पेड़ों पर तय मानकों से कहीं अधिक गहरा और बड़ा कट लगाते थे, जिससे पेड़ कमजोर होकर गिर जाते थे या सूख जाते थे।
गौला नदी में खनन (Mining) का माफिया राज
गौला नदी को हल्द्वानी की ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता है क्योंकि इससे निकलने वाला आरबीएम (रेत, बजरी, बोल्डर) पूरे उत्तर भारत के निर्माण कार्य के लिए बेस्ट माना जाता है। 80 के दशक के सिंडिकेट ने इसे लूट का जरिया बनाया:
- ‘गुंडा टैक्स’ या रंगदारी वसूली: गौला नदी के गेटों (जैसे शीशमहल, इंदिरा नगर गेट) पर जो भी आम डंपर या बैलगाड़ी चालक खनन सामग्री लेने जाता, उसे सरकारी रॉयल्टी के अलावा माफिया के गुर्गों को प्रति गाड़ी ‘गुंडा टैक्स’ देना पड़ता था। जो मना करता, उसे सरेआम पीट दिया जाता था।
- नंबरिंग और सिंडिकेट लॉबी: टेंडर प्रक्रिया में किसी नए या सीधे इंसान को घुसने नहीं दिया जाता था। माफिया आपसी सहमति से टेंडर का रेट तय करते थे, जिससे सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होता था और सारा मुनाफा अंडरवर्ल्ड के पास जाता था।
- अवैध भंडारण (Illegal Stocking): रात के अंधेरे में पोकलैंड और जेसीबी मशीनों से तय सीमा से कहीं अधिक गहरा अवैध खनन किया जाता था और उस सामग्री को हल्द्वानी के आसपास के खेतों में डंप कर लिया जाता था। बाद में इसे ऊंचे दामों पर दिल्ली और यूपी के बाजारों में बेचा जाता था।
- 80 के दशक की शुरुआत: भोपाल सिंह रावत ने 1980 के दशक की शुरुआत में हल्द्वानी और नैनीताल जिलों में अपने आपराधिक करियर की शुरुआत की थी। [1]
- वर्चस्व: वह बहुत कम समय में कुमाऊं और तराई क्षेत्र का एक ऐसा बड़ा चेहरा बन गया, जिसके नाम से व्यापारी और स्थानीय लोग कांपते थे। वह हल्द्वानी के अंडरवर्ल्ड के शुरुआती संस्थापकों में से एक था। [1]
🪨 2. मुख्य काले धंधे और सिंडिकेट राज
- गौला नदी पर एकाधिकार: भोपाल सिंह रावत के लिए हल्द्वानी की गौला नदी का खनन व्यापार सबसे महत्वपूर्ण और कीमती था। इस नदी से निकलने वाले उपखनिजों के टेंडरों और परिवहन पर उसका पूरा नियंत्रण था। [1]
- जंगल और जड़ी-बूटी तस्करी: खनन के अलावा, उसका गैंग तराई और पहाड़ों के सुरक्षित रास्तों का इस्तेमाल बेशकीमती लकड़ी, जंगलों के अन्य उत्पादों और दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों (Medicinal Herbs) की ब्लैक मार्केट में तस्करी के लिए करता था। [1]
- क्रूरता: उस दौर के अंडरवर्ल्ड में यह बात मशहूर थी कि जो कोई भी रावत के इन धंधों में दखल देने या उसके सिंडिकेट को चुनौती देने की कोशिश करता, उसका अंजाम सरेआम खूनी मौत होता था। पुलिस कार्रवाई और अंत
90 के दशक में जब उत्तर प्रदेश पुलिस ने संगठित अपराध के खिलाफ अभियान चलाया और आगे चलकर उत्तराखंड में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) मजबूत हुई, तो भोपाल सिंह रावत के इस सिंडिकेट को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया गया। उसके गुर्गे और शूटर या तो पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए या लंबे समय के लिए सलाखों के पीछे भेज दिए गए।
(नोट: यदि आप हाल के किसी नए अपराधी या किसी विशिष्ट घटना के संदर्भ में ‘गोपाल रावत’ नाम के बारे में पूछ रहे हैं, तो कृपया थोड़ा और विवरण साझा करें, क्योंकि 80 के दशक के खनन और तस्करी सिंडिकेट के इतिहास में मुख्य नाम भोपाल सिंह रावत ही दर्ज है)
2026 की वर्तमान स्थिति: ITI गैंग और आधुनिक पुलिस कार्रवाई
समय बदला और उत्तराखंड बनने के बाद पुलिस ने इन पारंपरिक माफियाओं की रीढ़ तोड़ दी। लेकिन हाल के वर्षों में हल्द्वानी और कुमाऊं में अपराध का स्वरूप बदल गया है। 80 के दशक के कट्टा-कल्टीवेटर गिरोहों की जगह अब टेक-सैवी (Tech-savvy) और ड्रग सिंडिकेट्स ने ले ली है।
