उत्तराखंड रुद्रपुर/सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना जाता है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व मां महालक्ष्मी की आराधना, भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना और चंद्रदेव की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा का उपवास 25 अक्टूबर, रविवार को रखा जाएगा, जबकि उदया तिथि के अनुसार स्नान-दान की पूर्णिमा 26 अक्टूबर, सोमवार को रहेगी। इस अवसर पर श्रद्धालु सुख-समृद्धि, आरोग्य, शांति और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ पूजा-अर्चना करेंगे।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
श्री श्री पंडित ज्योतिष आचार्य एवं कर्मकांड विशेषज्ञ पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार, शरद पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, भक्ति, संयम और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ने का पावन अवसर है। इस दिन श्रद्धालुओं को विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ अपने जीवन में सदाचार, सेवा, दान और परोपकार को भी महत्व देना चाहिए।
मां महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात मां महालक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘कोजागरी’ शब्द का संबंध इस मान्यता से है कि देवी लक्ष्मी रात्रि में जागरण करने वाले भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। इसी कारण अनेक स्थानों पर श्रद्धालु रात्रि जागरण करते हुए मां लक्ष्मी, भगवान विष्णु और चंद्रदेव की पूजा करते हैं।
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार, इस पावन रात्रि में श्रद्धालुओं को अपने घर और पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मां महालक्ष्मी के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पुष्प, अक्षत, धूप, नैवेद्य और फल अर्पित करने चाहिए। इसके बाद लक्ष्मी मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ अथवा श्री सत्यनारायण भगवान की कथा का श्रवण किया जा सकता है।
चंद्रदेव की पूजा और खीर का धार्मिक महत्व
शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा और खीर का भोग लगाने की परंपरा सदियों से प्रचलित है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ दिखाई देता है और उसकी शीतल चांदनी मन को शांति प्रदान करती है। श्रद्धालु दूध, चावल और मिश्री से बनी खीर तैयार कर भगवान को भोग लगाते हैं। कई परिवारों में खीर को रात में खुले स्थान पर रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार, इस परंपरा को श्रद्धा और स्वच्छता के साथ निभाना चाहिए। खीर को खुले आसमान के नीचे रखने पर उसे धूल, कीड़ों और अन्य दूषित पदार्थों से बचाना जरूरी है। खीर को चंद्रमा की किरणों में रखने से असाध्य रोग ठीक होने या रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने के दावों की पुष्टि करने वाला पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे धार्मिक परंपरा और प्रसाद के रूप में ही ग्रहण करना उचित है।
25 अक्टूबर को व्रत और रात्रि पूजा
उपलब्ध पंचांग विवरण के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026 को प्रातः 11:57 बजे प्रारंभ होकर 26 अक्टूबर को प्रातः 9:42 बजे तक रहेगी। इसी आधार पर 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का व्रत तथा रात्रि में कोजागरी लक्ष्मी पूजन किया जाएगा। 26 अक्टूबर को उदया तिथि के अनुसार स्नान-दान किया जाएगा। चंद्रोदय का बताया गया समय शाम 5:44 बजे है, हालांकि स्थानीय समय में अंतर हो सकता है। श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग से समय की पुष्टि करनी चाहिए।
पूजा-विधान और मंत्र जाप
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार, संध्या के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर मां महालक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर दीपक जलाएं। श्रद्धापूर्वक पुष्प, फल, मिठाई और खीर अर्पित करें। इसके बाद परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
मां महालक्ष्मी की आराधना के लिए श्रद्धालु इस मंत्र का जाप कर सकते हैं:
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
चंद्रदेव की उपासना करते समय उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करें और मानसिक शांति, सद्बुद्धि तथा परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें। मंत्रों का उच्चारण अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार किया जा सकता है।
दान-पुण्य और सेवा का संदेश
शरद पूर्णिमा पर दूध, चावल, सफेद वस्त्र अथवा अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करने की परंपरा भी है। जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, बुजुर्गों की सेवा करना और असहाय लोगों की सहायता करना इस पर्व की भावना को सार्थक बनाता है। दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए।
पंडित त्रिलोचन पनेरु के अनुसार, किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का वास्तविक उद्देश्य केवल मनोकामना पूर्ति नहीं, बल्कि मन में करुणा, विनम्रता और सकारात्मक विचारों का विकास भी है। ग्रह बाधा या विवाह में विलंब जैसी समस्याओं के लिए पूजा-पाठ को श्रद्धा का माध्यम माना जा सकता है, लेकिन ऐसे उपायों को निश्चित परिणाम देने वाला नहीं समझना चाहिए।
श्रद्धा, शांति और समृद्धि का संदेश
शरद पूर्णिमा का पर्व हमें प्रकृति की सुंदरता, चंद्रमा की शीतलता और आध्यात्मिक जीवन के महत्व का स्मरण कराता है। यह अवसर परिवार के साथ पूजा करने, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और समाज में सेवा एवं सद्भाव बढ़ाने का संदेश देता है।
पंडित त्रिलोचन पनेरु ने श्रद्धालुओं से अपील की कि वे शरद पूर्णिमा को श्रद्धा, स्वच्छता और सात्त्विक भाव से मनाएं। मां महालक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करते हुए सभी के सुख, स्वास्थ्य, शांति और कल्याण की कामना करें। यही इस पावन पर्व की आध्यात्मिक भावना और सनातन परंपरा का मूल संदेश है।
