रुद्रपुर | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की ओर से निकाली जा रही ‘न्याय यात्रा’ को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। 22 अक्टूबर से शुरू हुई इस यात्रा के माध्यम से कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, अंकिता भंडारी प्रकरण और अन्य मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेर रही है। इसी राजनीतिक माहौल में पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के दृष्टिकोण से कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े होते हैं कि क्या जनता को केवल नारों और आरोपों से संतुष्ट किया जा सकता है, या फिर राजनीतिक दलों को अपने काम और वादों का ठोस हिसाब भी देना चाहिए?
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
‘जनता को बरगलाने से नहीं, जमीन पर काम करने से मिलता है विश्वास’
राजेश शुक्ला की ओर से कांग्रेस पर राजनीतिक निशाना साधते हुए कहा जा सकता है कि विपक्ष को जनता की समस्याएं उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन जनहित के नाम पर राजनीति करने वालों को यह भी बताना चाहिए कि उनके पास समस्याओं के समाधान का ठोस खाका क्या है। चुनावी माहौल में यात्रा निकालना आसान है, लेकिन जनता के बीच जाकर हर समस्या का व्यावहारिक समाधान बताना असली परीक्षा है।
भाजपा का पक्ष रखते हुए शुक्ला कांग्रेस से सवाल कर सकते हैं कि उत्तराखंड में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, उद्योग और बुनियादी सुविधाओं को लेकर वह अपनी सरकारों के कार्यकाल का भी निष्पक्ष मूल्यांकन जनता के सामने रखे। केवल मौजूदा सरकार पर आरोप लगाकर राजनीतिक जिम्मेदारी से बचना लोकतंत्र में पर्याप्त नहीं है।
कांग्रेस से पांच बड़े सवाल
पहला सवाल—जनता को सिर्फ शिकायतें या समाधान भी?
कांग्रेस बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दे उठा रही है। लेकिन युवाओं के लिए कितने रोजगार के अवसर पैदा करने की उसकी स्पष्ट योजना है? पहाड़ों से पलायन रोकने, स्थानीय उद्योगों को मजबूत करने और स्वरोजगार बढ़ाने के लिए उसका समयबद्ध कार्यक्रम क्या है?
दूसरा सवाल—भ्रष्टाचार के आरोप या ठोस प्रमाण?
यदि कांग्रेस के पास भ्रष्टाचार के मामलों से संबंधित तथ्य और प्रमाण हैं, तो उन्हें संबंधित जांच एजेंसियों और सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन प्रमाण और जवाबदेही भी उतने ही जरूरी हैं।
तीसरा सवाल—विकास कार्यों का हिसाब कहां है?
कांग्रेस को बताना चाहिए कि जिन क्षेत्रों में वह सरकार की नीतियों का विरोध कर रही है, वहां विकास की अपनी वैकल्पिक योजना क्या है। भाजपा सरकार की उपलब्धियों और कमियों का मूल्यांकन भी परियोजनाओं, बजट, रोजगार के आंकड़ों तथा जनता को मिले लाभ के आधार पर होना चाहिए।
चौथा सवाल—महिला सुरक्षा और अंकिता भंडारी प्रकरण पर राजनीति या न्याय की ठोस पहल?
अंकिता भंडारी प्रकरण संवेदनशील विषय है। इसमें न्याय, निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता की मांग को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखा जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध आरोपों पर फैसला प्रमाण और कानून के आधार पर होना चाहिए। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग पर सभी दलों को गंभीरता दिखानी चाहिए।
पांचवां सवाल—चुनाव के बाद भी जनता के बीच रहेंगे नेता?
राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चुनाव समाप्त होने के बाद भी वे जनता की समस्याओं को कितनी प्राथमिकता देंगे। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी, स्वास्थ्य सेवाएं और स्थानीय नागरिक सुविधाएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सालभर काम होना चाहिए, केवल यात्रा के दौरान भाषण नहीं।
भाजपा का पक्ष: उपलब्धियों का मूल्यांकन तथ्यों से हो
राजेश शुक्ला के राजनीतिक दृष्टिकोण से भाजपा का तर्क यह हो सकता है कि राज्य में हुए विकास कार्यों, बुनियादी सुविधाओं के विस्तार, औद्योगिक गतिविधियों और सरकारी योजनाओं के लाभ को भी जनता के सामने रखा जाना चाहिए। कांग्रेस यदि सरकार की कमियां गिनाती है, तो भाजपा को भी अपने कार्यों का प्रमाणिक विवरण देना चाहिए। किसी भी सरकार की उपलब्धियों का आकलन घोषणाओं से नहीं, बल्कि धरातल पर हुए काम और नागरिकों को मिले वास्तविक लाभ से होना चाहिए।
जनता से अपील: दावों को परखें, सवाल पूछें
राजनीतिक बहस का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए। कांग्रेस को यात्रा निकालने का अधिकार है और भाजपा को उसका जवाब देने का। लेकिन जनता को भी हर दल से पूछना चाहिए कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, किसानों की आय और स्थानीय विकास के लिए उसने वास्तव में क्या किया है।
राजनीति में सावधान रहने का अर्थ किसी पार्टी की आलोचना से बचना नहीं, बल्कि हर दल के दावों की निष्पक्ष जांच करना है। जनता को भावनात्मक नारों, व्यक्तिगत आरोपों और चुनावी वादों से आगे बढ़कर काम का हिसाब मांगना चाहिए। लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता का होता है और जनता का विश्वास केवल भाषणों से नहीं, निरंतर काम, पारदर्शिता और जवाबदेही से हासिल होता है।
