रुद्रपुर को भिक्षावृत्ति मुक्त बनाने की पहल क्यों नहीं? 327 भिक्षुकों के पुनर्वास के लिए समाजसेवी, नेता और SIDCUL की कंपनियां मिलकर बनाएं ठोस योजना
2687 पंजीकृत NGO, करीब 500 समाजसेवी व नेता और कंपनियों के CSR फंड से बदल सकती है सैकड़ों परिवारों की जिंदगी; बच्चों को भिक्षावृत्ति के दलदल से निकालकर शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की जरूरत
रुद्रपुर | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
औद्योगिक नगरी रुद्रपुर में जब विकास, रोजगार और सामाजिक उत्थान की चर्चा होती है, तो एक सवाल भी सामने आना चाहिए—क्या रुद्रपुर को भिक्षावृत्ति मुक्त शहर बनाया जा सकता है? उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, शहर में 327 लोग भीख मांगकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं। दूसरी ओर, करीब 500 समाजसेवी और नेता तथा 2687 पंजीकृत गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है। सिडकुल की कंपनियां भी कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत सामाजिक कार्यों में योगदान देती हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या इन सभी संसाधनों को एक साझा अभियान से जोड़कर जरूरतमंद परिवारों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर दिया जा सकता है?
यह पहल केवल भीख मांगने वाले लोगों को सड़कों से हटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य उनकी परिस्थितियों को समझना, स्थायी आजीविका उपलब्ध कराना और उनके बच्चों को शिक्षा के माध्यम से बेहतर भविष्य की ओर ले जाना होना चाहिए।
भीख नहीं, सम्मानजनक रोजगार बने जीवन का आधार
भीख मांगने वाले सभी लोगों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। कुछ लोग आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, बीमारी, दिव्यांगता, वृद्धावस्था या पारिवारिक संकट के कारण इस स्थिति में पहुंचते हैं। इसलिए सबसे पहले प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं और प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए। इसमें प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक स्थिति, कौशल, रोजगार की क्षमता और वास्तविक जरूरतों का आकलन किया जाए।
इसके बाद इच्छुक और काम करने में सक्षम लोगों को कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार, छोटे कारोबार, दुकानों, स्थानीय प्रतिष्ठानों और औद्योगिक इकाइयों में रोजगार से जोड़ने की योजना बनाई जा सकती है। जरूरत के अनुसार औजार, कार्यस्थल, शुरुआती आर्थिक सहायता, बाजार से संपर्क और नियमित मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए।
वहीं, वृद्ध, दिव्यांग, गंभीर रूप से बीमार और काम करने में असमर्थ लोगों के लिए पेंशन, स्वास्थ्य सेवाएं, आश्रय तथा अन्य पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
बच्चों का भविष्य बचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी
इस अभियान का सबसे संवेदनशील पहलू उन परिवारों के बच्चे हैं, जो सड़कों पर भीख मांगने या मांगवाए जाने की परिस्थितियों में बड़े हो रहे हैं। यदि आज उनके लिए शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और नियमित देखभाल की व्यवस्था नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ी भी इसी दुष्चक्र में फंस सकती है।
ऐसे बच्चों को स्कूलों से जोड़ने, स्कूल छोड़ चुके बच्चों का दोबारा प्रवेश कराने, छात्रवृत्ति, पोषण, किताबें, कपड़े और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आवास की व्यवस्था की जा सकती है। यदि किसी बच्चे से जबरन भीख मंगवाई जा रही हो या उसके शोषण की आशंका हो, तो बाल संरक्षण तंत्र को तत्काल सक्रिय किया जाना चाहिए। बच्चों के हित में कार्रवाई संवेदनशीलता और कानून के अनुसार होनी चाहिए।
2687 NGO और 500 समाजसेवी-नेता क्या मिलकर बदल सकते हैं तस्वीर?
यदि उपलब्ध आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि हो जाती है, तो रुद्रपुर में सामाजिक भागीदारी का व्यापक नेटवर्क तैयार करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। प्रत्येक NGO से अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार कुछ परिवारों की जिम्मेदारी लेने का प्रस्ताव रखे। समाजसेवी रोजगार के अवसर तलाशें, नेता प्रशासन और सरकारी योजनाओं के बीच समन्वय कराएं तथा उद्योगपति और सिडकुल की कंपनियां CSR के माध्यम से प्रशिक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका परियोजनाओं में सहयोग दें।
इसके लिए नगर निगम, जिला प्रशासन, जिला समाज कल्याण विभाग, श्रम विभाग, बाल संरक्षण इकाइयों, उद्योग संगठनों और विश्वसनीय सामाजिक संस्थाओं की संयुक्त समिति बनाई जा सकती है। सहायता राशि के उपयोग, लाभार्थियों की प्रगति और रोजगार की स्थिति का पारदर्शी रिकॉर्ड भी रखा जाना चाहिए।
शुरुआत 327 लोगों से क्यों नहीं?
यदि शहर में बताए गए 327 भिक्षुकों की संख्या सत्यापन के बाद सही पाई जाती है, तो पहले चरण में इन सभी की जरूरतों का आकलन कर एक समयबद्ध पुनर्वास योजना बनाई जा सकती है। लक्ष्य केवल कुछ दिनों तक भोजन या कपड़े बांटना नहीं, बल्कि लोगों को ऐसी व्यवस्था देना हो जिसमें वे लंबे समय तक सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
इसके लिए पहले 90 दिनों का एक पायलट अभियान शुरू किया जा सकता है। इसमें सर्वेक्षण, परामर्श, दस्तावेज तैयार कराने, सरकारी योजनाओं से जोड़ने, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शामिल हो। इसके बाद हर परिवार की स्थिति की नियमित समीक्षा की जाए।
रुद्रपुर को भिक्षावृत्ति मुक्त बनाने का अर्थ लोगों को शहर से हटाना नहीं, बल्कि उन्हें मजबूरी से बाहर निकालना होना चाहिए। यदि प्रशासन, समाजसेवी, नेता, उद्योग जगत और NGO मिलकर जिम्मेदारी निभाएं, तो यह पहल सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। अब जरूरत है कि इस विचार को चर्चा से आगे बढ़ाकर ठोस कार्ययोजना में बदला जाए, ताकि किसी बच्चे का बचपन सड़क पर न बीते और किसी परिवार को पेट भरने के लिए मजबूरी में हाथ न फैलाना पड़े।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
रुद्रपुर को भिक्षावृत्ति मुक्त बनाने की पहल क्यों नहीं? 327 भिक्षुकों के पुनर्वास के लिए समाजसेवी, नेता और SIDCUL की कंपनियां मिलकर बनाएं ठोस योजना
