रुद्रपुर/देहरादून के कंडोली-1 में 1015 वर्गमीटर आरक्षित वनभूमि पर वर्षों से किए गए अतिक्रमण को आखिरकार वन विभाग ने ध्वस्त कर दिया। खास बात यह है कि इस मामले में विभागीय आदेशों के बाद मामला न्यायालय तक पहुंचा और नैनीताल हाईकोर्ट से भी विभाग के पक्ष में फैसले आए। इसके बाद सरकारी भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। यह कार्रवाई बताती है कि सरकारी भूमि पर कब्जा कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि शासन-प्रशासन और विभाग कानून के मुताबिक आगे बढ़ें तो भूमि वापस सरकारी नियंत्रण में लाई जा सकती है।
लेकिन यही सवाल अब ऊधम सिंह नगर के रुद्रपुर में उठना स्वाभाविक है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रुद्रपुर में तालाब, सरकारी और अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि को अभिलेखों में अलग स्वरूप दिखाकर निजी उपयोग अथवा प्लाटिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगातार उठते रहे हैं। कहीं सरकारी भूमि पर निर्माण और प्लाटिंग के आरोप हैं तो कहीं फ्रीहोल्ड की कार्रवाई पर सवाल खड़े हुए हैं। यदि इन मामलों में सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों या प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी सरकारी भूमि का स्वरूप बदलकर उसे निजी हित में पहुंचाया गया, तो केवल जमीन का सौदा करने वाले लोगों की ही जांच होगी या उस पूरी प्रक्रिया को मंजूरी देने वाले अधिकारियों और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी?
देहरादून का कंडोली मामला सरकार और प्रशासन के सामने एक उदाहरण है। न्यायालय के आदेशों का सम्मान करते हुए वन विभाग ने जमीन वापस अपने कब्जे में ले ली। इसी तरह प्रदेश के उन सभी मामलों की जांच होनी चाहिए, जहां सरकारी भूमि पर कब्जा, अवैध प्लाटिंग, फ्रीहोल्ड अथवा अन्य तरीके से निजी हित साधने के आरोप लगे हैं।
सरकार की जिम्मेदारी केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं हो सकती। सरकारी जमीन पहले किसके नाम दर्ज थी, उसका स्वरूप कब बदला, किस अधिकारी ने आदेश दिया, किस स्तर पर अनुमति मिली और उससे किसे लाभ हुआ—इन सभी सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
पहाड़ों में भी जमीन को लंबे समय के पट्टे पर दिए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सरकार की मंशा और उसकी भूमि नीति पर सार्वजनिक बहस जरूरी है। विकास के नाम पर यदि सरकारी और सार्वजनिक संपत्तियों का निजी हित में इस्तेमाल होता है तो यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का सवाल है।
नैनीताल हाईकोर्ट के आदेशों का सम्मान करते हुए देहरादून में वनभूमि वापस ली गई है। अब प्रदेश की जनता यह भी देखना चाहती है कि क्या सरकार उन मामलों में भी इसी दृढ़ता से कार्रवाई करेगी, जहां सरकारी जमीन निजी हाथों में जाने के आरोप हैं?
और यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी अधिकारी, कर्मचारी या प्रभावशाली व्यक्ति ने सरकारी जमीन को निजी लाभ पहुंचाने में भूमिका निभाई, तो कानून सबके लिए समान होना चाहिए। जमीन बचाने के साथ-साथ जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही जरूरी है।
उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि प्रदेशभर की सरकारी, वन, तालाब, चारागाह और अन्य सार्वजनिक भूमि के विवादित मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराए। जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि सरकारी जमीन किसी नेता, अधिकारी या भूमाफिया की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की सार्वजनिक धरोहर है।
कंडोली में बुलडोजर चला है—अब सवाल यह है कि रुद्रपुर और प्रदेश की उन जमीनों पर कार्रवाई कब होगी, जिनके सरकारी से निजी हाथों में पहुंचने पर सवाल उठ रहे हैं?
