


केंद्र सरकार ने 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण देकर सामाजिक न्याय की नई राह खोली थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे संवैधानिक मान्यता दी। उद्देश्य था कि सामान्य वर्ग का असली गरीब शिक्षा और नौकरी में अवसर पा सके। लेकिन उत्तराखंड में यह व्यवस्था गरीबों का सहारा बनने के बजाय भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है।

।✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
तहसील और पटवारी स्तर पर ₹500 से ₹3000 तक में फर्जी ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र बन जाते हैं। जिनकी सरकारी नौकरी है, जिनके पास पक्का मकान और गाड़ियां हैं, वही कागजों पर “गरीब” बनकर लाभ उठा रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी इस खेल में सबसे आगे बताए जाते हैं। यही हाल बीपीएल कार्ड का है—असली गरीब लाइन में खड़ा रह जाता है, लेकिन सरकारी कर्मचारी और व्यापारी बीपीएल बनकर मुफ्त राशन और योजनाओं का फायदा उठाते हैं।
प्रशासनिक तंत्र भी सवालों के घेरे में है। आय व संपत्ति की जांच केवल कागजों तक सीमित है, जमीनी हकीकत की पड़ताल शायद ही कभी होती है। इस वजह से असली जरूरतमंद अपने हक से वंचित हो जाते हैं और सामाजिक न्याय की पूरी अवधारणा मजाक बनकर रह जाती है।
जरूरत है कि उत्तराखंड सरकार तत्काल स्वतंत्र जांच आयोग गठित करे, बीते पांच साल में जारी सभी ईडब्ल्यूएस और बीपीएल प्रमाणपत्रों की पुन: जांच हो और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। गरीबों के अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब फर्जीवाड़े पर लगाम कसी जाए।
उत्तराखंड की हकीकत: कागजों पर गरीब, असलियत में संपन्न।ईडब्ल्यूएस आरक्षण का उद्देश्य और पेच।दुर्भाग्य यह है कि उत्तराखंड में यह योजना भ्रष्टाचार का नया अड्डा बन चुकी है। तहसील और प्रशासनिक स्तर पर फर्जी ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्रों का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है। जिन कर्मचारियों की मोटी सैलरी है, जिनके पास जमीन-जायदाद है, वही “गरीब” बनकर सरकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। यही हाल बीपीएल कार्ड का है। असली गरीब झोपड़ियों में लाइन लगाते हैं, लेकिन बीपीएल और ईडब्ल्यूएस के फर्जी कार्ड लेकर अधिकारी, कर्मचारी और रसूखदार लोग सरकारी योजनाओं की मलाई काट रहे हैं।
साल 2019 में केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों (EWS) को 10% आरक्षण देकर सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया था। संविधान के 103वें संशोधन के तहत लागू किए गए इस प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में अपनी मुहर भी दे दी। लेकिन आरक्षण की इस नई श्रेणी का उद्देश्य गरीबों तक अवसर पहुंचाना था, न कि उन लोगों को और अधिक लाभ पहुंचाना जो पहले से ही नौकरी, पैसा और संसाधनों से संपन्न हैं।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण का उद्देश्य और पेच?ईडब्ल्यूएस का मकसद था कि सामान्य वर्ग के वे लोग जिनकी सालाना आय 8 लाख से कम है, जिनके पास बड़ी जमीन-जायदाद नहीं है, उन्हें शिक्षा और नौकरियों में अवसर मिलें।
- लेकिन यह सुविधा विशेष रूप से ईमानदार और वास्तविक गरीबों के लिए थी।
- कानूनी पेच यह था कि आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर नहीं जा सकती, लेकिन केंद्र सरकार ने सफाई दी कि यह आरक्षण “बाकी बचे 50%” में से ही लिया जा रहा है।
उत्तराखंड की हकीकत: कागजों पर गरीब, असलियत में संपन्न?उत्तराखंड में तहसील स्तर पर ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र बनवाना मुश्किल नहीं है।
- ₹500 से लेकर ₹3000 तक की रिश्वत देकर कोई भी प्रमाणपत्र हासिल कर सकता है।
- सबसे ज्यादा शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार के कर्मचारी फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने में आगे हैं।
- असली गरीब, मजदूर, दिहाड़ीदार और खेतिहर वर्ग लाइन में लगे रह जाते हैं, लेकिन लाभ उठाते हैं वही जिनकी तिजोरियां पहले से भरी हैं।
बीपीएल कार्ड का खेल?बीपीएल (Below Poverty Line) कार्ड का हाल भी इससे जुदा नहीं है।
- जिनके पास पक्के मकान, गाड़ियां और मोटी सैलरी है, वे भी बीपीएल कार्डधारी बने बैठे हैं।
- सरकारी अनाज, राशन, गैस, स्वास्थ्य योजनाएं और छात्रवृत्ति—सबका लाभ वही ले रहे हैं।
- वास्तविक गरीब महिला-पुरुष या ग्रामीण परिवारों तक राहत पहुंच ही नहीं पाती।
प्रशासनिक तंत्र की भूमिका?तहसील प्रशासन और पटवारियों की भूमिका सबसे संदिग्ध है।
- बिना जांच-पड़ताल के आय प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं।
- “सत्यापन” केवल कागजों पर होता है, असलियत में कोई अधिकारी मौके पर नहीं जाता।
- कई मामलों में खुद तहसील स्तर के अधिकारी और कर्मचारियों के परिवार फर्जी ईडब्ल्यूएस और बीपीएल कार्डधारी पाए गए हैं।
भ्रष्टाचार की चेन?फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने वाला चुप रहता है।
- रिश्वत लेने वाला अधिकारी चुप रहता है।
- और लाभ उठाने वाला “फर्जी गरीब” भी चुप रहता है।
- परिणाम यह है कि राज्य में हजारों नौकरियां और छात्रवृत्तियां असली गरीबों से छीनकर अमीरों की जेब में चली जाती हैं।
उत्तराखंड में उदाहरण?शिक्षा विभाग में देखा गया है कि शिक्षक और अधिकारियों के बच्चे ईडब्ल्यूएस कोटे से एडमिशन लेते हैं।
- स्वास्थ्य विभाग में सरकारी डॉक्टर और कर्मचारी तक अपने परिवार के लिए बीपीएल और ईडब्ल्यूएस कार्ड बनवाते हैं।
- कई जगह पर जांच बैठने के बाद मामला “मामूली फटकार” में खत्म कर दिया जाता है।
सामाजिक अन्याय?असली गरीबों का हक मारा जा रहा है।
- समाज में असमानता और गहरी हो रही है।
- भ्रष्टाचार और पाखंड ने ईडब्ल्यूएस और बीपीएल दोनों योजनाओं को खोखला बना दिया है।
- राज्य स्तरीय जांच आयोग बनाया जाए, जिसमें न्यायिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी शामिल किया जाए।
- पिछले 5 साल में जारी सभी ईडब्ल्यूएस और बीपीएल प्रमाणपत्रों की पुन: जांच हो।
- जो फर्जी पाए जाएं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर नौकरी और लाभ रद्द किए जाएं।
- तहसील प्रशासन पर भी जवाबदेही तय की जाए।
- भविष्य में ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली लागू हो, जिसमें संपत्ति, बैंक खाता, आयकर रिटर्न और बिजली-पानी के बिल की जांच स्वचालित रूप से जुड़ी हो।
ईडब्ल्यूएस और बीपीएल योजनाएं गरीबों को सहारा देने के लिए बनी थीं। लेकिन उत्तराखंड में इन योजनाओं का रूप भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। यह सीधे-सीधे गरीबों के अधिकारों पर डाका है। सरकार चाहे तो 15 दिन के भीतर एक स्वतंत्र जांच आयोग गठित कर सच्चाई सामने ला सकती है। अगर सरकार चुप रहती है तो यह मान लेना चाहिए कि वह भी इस गोरखधंधे की साझीदार है।
भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा लंबे संघर्षों और संवैधानिक बहसों का परिणाम है। दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग को उनके ऐतिहासिक व सामाजिक शोषण की भरपाई करने के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन जब 2019 में केंद्र की मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को (EWS) 10% आरक्षण देने का ऐतिहासिक कदम उठाया, तो यह चर्चा का विषय बन गया।
संविधान के 103वें संशोधन के जरिए लागू हुए इस प्रावधान को कई वर्गों ने गरीब सवर्णों के लिए बड़ी राहत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2022 में इसे 3:2 के बहुमत से सही ठहराया। लेकिन समस्या वहीं से शुरू हुई जहां कागज़ पर गरीब बनकर अमीर और रसूखदार वर्ग ने इस योजना को हथियाना शुरू कर दिया।
उत्तराखंड, जो एक संवेदनशील पहाड़ी राज्य है और जहां बड़ी आबादी गांवों में दिहाड़ी मजदूरी या खेती पर निर्भर है, वहां ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र का सबसे बड़ा गोरखधंधा चल रहा है। तहसील से लेकर उच्च प्रशासनिक स्तर तक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। ₹500 से ₹3000 तक में ईडब्ल्यूएस बन जाता है, और लाभ वही उठाते हैं जो पहले से नौकरी, वेतन, मकान और गाड़ी वाले हैं।
ठीक यही हाल बीपीएल कार्ड का है। वास्तव में गरीब को सस्ते राशन या मुफ्त इलाज का लाभ नहीं मिलता, बल्कि सरकारी कर्मचारी, व्यापारी और रसूखदार लोग बीपीएल कार्ड के सहारे सरकारी योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं।
इस संपादकीय का उद्देश्य यही है कि सरकार और समाज, दोनों को आईना दिखाया जाए कि कैसे गरीब का हक छीनकर अमीरों की जेब में पहुंच रहा है।




