संपादकीय | आयोजन किसके लिए—बच्चों के लिए या सिर्फ रिपोर्ट के लिए?स्टेडियम खाली, फाइलें भरी—खेल विकास की नई परिभाषा? जिला प्रशासन और खेल आयोजन समिति—खेल कम, प्रबंधन ज़्यादाजिला प्रशासन और खेल आयोजन समिति—खेल कम, प्रबंधन ज़्यादा

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उत्तराखंड में होने वाले सरकारी खेल व सांस्कृतिक आयोजनों पर एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है—क्या ये आयोजन वास्तव में स्थानीय स्कूली बच्चों, खासकर किसानों और मेहनतकश वर्ग के बच्चों के लिए हैं, या केवल प्रशासनिक उपस्थिति और सरकारी रिपोर्ट सजाने के लिए? अक्सर देखा जाता है कि ऐसे आयोजनों में बच्चों की “उपस्थिति” तो दर्ज होती है, लेकिन उनकी भागीदारी केवल संख्या तक सीमित रहती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


स्कूली के बच्चों को बस भीड़ पूरा करने के लिए लाया जाता है। न उन्हें खेल की समझ दी जाती है, न प्रशिक्षण, न भविष्य की कोई दिशा। जिला प्रशासन और सरकार को सोचना होगा कि यदि स्थानीय बच्चों को इन आयोजनों से वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा, तो ऐसे खर्चीले कार्यक्रमों का औचित्य क्या है? खेल और प्रतिभा विकास दिखावे से नहीं, जमीनी जुड़ाव से होगा। जब तक नीति बच्चों के भविष्य पर केंद्रित नहीं होगी, तब तक आयोजन सिर्फ सरकारी औपचारिकता बने रहेंगे।

स्टेडियम खाली, फाइलें भरी—खेल विकास की नई परिभाषा
राज्य में खेलों के विकास का आलम यह है कि स्टेडियमों में सन्नाटा पसरा है, लेकिन दफ्तरों में खेल योजनाओं की फाइलें मोटी होती जा रही हैं। प्रतियोगिताएं होती हैं, उद्घाटन होते हैं, फोटो खिंचते हैं—बस दर्शक नहीं होते। बच्चे मोबाइल में रील देख रहे हैं और अधिकारी खाली कुर्सियों के सामने भाषण। खेल संस्कृति कागज़ों में फल-फूल रही है, मैदान में नहीं। सवाल यह नहीं कि पदक क्यों नहीं आ रहे, सवाल यह है कि खेल देखने वाला समाज ही क्यों गायब है। जब तक दर्शक नहीं, तब तक भविष्य की प्रतिभा भी सिर्फ फाइलों में ही जन्म लेती रहेगी।

| जिला प्रशासन और खेल आयोजन समिति—खेल कम, प्रबंधन ज़्यादा
जिला प्रशासन और खेल आयोजन समिति की खेलों के प्रति प्रतिबद्धता काबिले-तारीफ है—कम से कम कागज़ों में। मैदान में खिलाड़ी पसीना बहाएं या न बहाएं, समिति के सदस्य जरूर पूरे जोश में दिखाई देते हैं। स्टेडियम खाली हों तो क्या, मंच भरा होना चाहिए। बच्चों की मौजूदगी जरूरी है, चाहे वे खेल समझें या नहीं—हाजिरी पूरी होनी चाहिए।
खेल आयोजन अब प्रतिभा खोज नहीं, “व्यवस्था प्रदर्शन” बन चुके हैं। फोटो, भाषण और फाइलें तैयार हैं, बस दर्शक और भविष्य के खिलाड़ी गायब हैं। लगता है खेल समिति का असली लक्ष्य खेल नहीं, आयोजन का सफल समापन है—खेल अपने आप कहीं न कहीं हो ही जाएगा।


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