अटरिया मंदिर विवाद: आस्था, अधिकार और कानून के बीच बढ़ता तनाव?अटरिया मंदिर और डिजिटल विमर्श: क्या सोशल मीडिया पर वामपंथी प्रभाव बढ़ रहा है?

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रुद्रपुर,जगतपुरा स्थित अटरिया मंदिर के सामने खाली पड़ी जमीन पर नमाज़ पढ़ने को लेकर हुए विवाद ने क्षेत्र का माहौल संवेदनशील बना दिया है। आरोप है कि एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति शाहिद के साथ मारपीट की गई और धार्मिक नारा लगवाया गया। यह घटना यदि तथ्यात्मक रूप से सही पाई जाती है, तो किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है—क्योंकि कानून अपने हाथ में लेना न तो धार्मिक आस्था की रक्षा है और न ही सामाजिक मर्यादा का पालन।

Pantnagar कोतवाली क्षेत्र में 24/02/2026 को वायरल वीडियो प्रकरण पर पुलिस अधीक्षक अपराध/यातायात ऊधमसिंहनगर, Jitendra Chaudhary ने बताया कि मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस टीमों का गठन कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। जनपद पुलिस ने आमजन से अपील की है कि किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें और शांति बनाए रखें।


साथ ही, यह भी सच है कि अटरिया मंदिर स्थानीय जनमानस की गहरी आस्था से जुड़ा एक प्राचीन धार्मिक स्थल माना जाता है। मंदिर केवल एक ढांचा नहीं होता; उससे जुड़ी भावनाएं, परंपराएं और सांस्कृतिक परिधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं। यदि मंदिर प्रबंधन को यह लगा कि उनकी भूमि या परिधि में किसी अन्य धार्मिक गतिविधि से भविष्य में विवाद खड़ा हो सकता है, तो उन्हें प्रशासन को सूचित करना चाहिए था—न कि टकराव की स्थिति बनने देनी चाहिए थी।
मंदिर प्रबंधक अरविंद शर्मा ने यह कहा है कि मंदिर की जमीन पर अन्य धार्मिक गतिविधि स्वीकार्य नहीं है। वहीं पार्षद परवेज कुरैशी और कांग्रेस नेत्री सोफिया नाज ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। यह स्पष्ट है कि मामला अब केवल एक व्यक्ति या एक स्थल का नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक विश्वास और कानून-व्यवस्था की परीक्षा बन गया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


यह भी जांच का विषय है कि संबंधित व्यक्ति वहां बार-बार नमाज़ पढ़ने क्यों आ रहा था, जबकि शहर में अन्य स्थान भी उपलब्ध बताए जा रहे हैं। क्या यह केवल सुविधा का प्रश्न था, या इसके पीछे कोई अन्य कारण? इस प्रश्न का उत्तर जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है। बिना तथ्यात्मक प्रमाण के किसी भी समुदाय, विचारधारा या संगठन पर आरोप लगाना स्थिति को और जटिल कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक आस्था की रक्षा कानून के दायरे में रहकर ही संभव है। यदि किसी पक्ष ने उकसावे में आकर हिंसा की, तो वह भी गलत है; यदि किसी ने जानबूझकर संवेदनशील स्थान चुना, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अभी आवश्यकता है संयम, तथ्य आधारित जांच और प्रशासन की त्वरित व पारदर्शी कार्रवाई की—ताकि न तो मंदिर की आस्था आहत हो और न ही किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो। समाज को भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, बल्कि कानून और पारस्परिक सम्मान से आगे बढ़ना होगा।


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