“विकास या विस्थापन? उत्तराखंड में आंकड़ों की चमक के पीछे का स्याह सच

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उत्तराखंड सरकार अपनी उपलब्धियों का लंबा-चौड़ा बखान कर रही है—जी-20 समिट, ग्लोबल इन्वेस्टर समिट, राष्ट्रीय खेलों जैसे बड़े आयोजन, लाखों करोड़ के निवेश समझौते, और रोजगार के दावे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मंचों से बताते हैं कि राज्य तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास वास्तव में आम जनता तक पहुंच रहा है या केवल आंकड़ों और घोषणाओं तक सीमित है?
सरकार का दावा है कि 3.76 लाख करोड़ रुपये के निवेश समझौते हुए और एक लाख करोड़ से अधिक के प्रोजेक्ट धरातल पर उतर चुके हैं। 20 हजार से ज्यादा उद्योग स्थापित किए गए और 30 हजार युवाओं को सरकारी नौकरियां दी गईं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है। रोजगार के अवसर जितनी तेजी से गिनाए जा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा तेजी से लोगों को उनके रोजगार और आशियानों से बेदखल किया जा रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


बुलडोजर की राजनीति: विकास या विनाश?
राज्य में “जीरो टॉलरेंस” नीति के नाम पर बुलडोजर कार्रवाई तेज हुई है। सरकार इसे अवैध कब्जों के खिलाफ सख्ती बताती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई निष्पक्ष है?
रुद्रपुर जैसे शहरों में दशकों से छोटे व्यापारियों, रेहड़ी-पटरी वालों और मेहनतकश लोगों के ठिकानों पर बुलडोजर चलाए गए। ये वे लोग हैं जो 30-40 वर्षों से अपने परिवार का पेट पाल रहे थे। स्मार्ट सिटी के नाम पर उन्हें उजाड़ दिया गया।
लेकिन दूसरी ओर, यही सरकारी भूमि बड़े बिल्डरों, भू-माफियाओं और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों के कब्जे में अब भी सुरक्षित है। रुद्रपुर में ही एक तालाब को “बंजर भूमि” दिखाकर करीब 500 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट खड़ा करने की तैयारी इसका ज्वलंत उदाहरण है। अनुमान है कि अकेले रुद्रपुर में ही 10,000 करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी जमीन आज भी भू-माफियाओं और प्रभावशाली लोगों के कब्जे में है—जहां बुलडोजर नहीं पहुंचता।
रोजगार बनाम विस्थापन: किसे मिला फायदा?
सरकार 30 हजार नौकरियों का दावा करती है, लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि कितने लोगों का रोजगार छीना गया।
छोटे दुकानदार, स्थानीय व्यवसायी और पारंपरिक रोजगार से जुड़े हजारों परिवार आज असुरक्षा में जी रहे हैं। “लखपति दीदी” जैसी योजनाएं कागजों में सशक्तिकरण दिखाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर महिलाएं अब भी संसाधनों और बाजार की कमी से जूझ रही हैं।
मूल मुद्दे हाशिये पर
उत्तराखंड राज्य की स्थापना जिन मूल मुद्दों पर हुई थी—जल, जंगल, जमीन और स्थायी राजधानी—वे आज भी अधूरे हैं।
पहाड़ों से पलायन अब भी पूरी तरह नहीं रुका
स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता नहीं मिल रही
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है
स्थायी राजधानी का मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित है
सरकार “रिवर्स पलायन” का दावा करती है, लेकिन हकीकत में गांवों की स्थिति अब भी चिंताजनक है।
आंकड़ों की राजनीति बनाम जमीनी सच्चाई
प्रति व्यक्ति आय में 41% वृद्धि, जीएसटी में बढ़ोतरी, और बजट का एक लाख करोड़ पार होना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन जब विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, तो ये आंकड़े केवल राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
क्या विकास केवल बड़े निवेश और आयोजनों तक सीमित रहेगा?
क्या बुलडोजर केवल गरीबों के लिए ही है?
क्या भू-माफियाओं और बड़े कब्जाधारियों पर भी समान कार्रवाई होगी?
क्या उत्तराखंड की मूल पहचान—जल, जंगल, जमीन—को बचाया जाएगा?
जवाबदेही जरूरी है
सरकार को यह समझना होगा कि विकास केवल सड़कों, निवेश और आयोजनों से नहीं मापा जाता, बल्कि यह इस बात से तय होता है कि आम आदमी कितना सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी रहा है।
यदि रोजगार देने के साथ-साथ लोगों को उनके घर और रोज़गार से उजाड़ा जाएगा, तो यह विकास नहीं बल्कि विस्थापन की कहानी कहलाएगी। उत्तराखंड की जनता अब आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक बदलाव और न्यायपूर्ण नीति की अपेक्षा रखती है।
अब समय है कि सरकार आंकड़ों के पीछे छिपने के बजाय जमीनी सच्चाई का सामना करे—और यह सुनिश्चित करे कि विकास का बुलडोजर केवल गरीबों पर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और भू-माफियाओं पर भी चले।


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