उत्तराखंड में “कबूतरबाजी उद्योग” का फैलता साम्राज्य : आखिर युवाओं के सपनों का सौदागर कौन?

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हिन्दुस्तान ग्लोबल टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार अवतार सिंह बिष्ट द्वारा लगातार प्रकाशित की गई खबरों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। विदेश भेजने के नाम पर युवाओं से ठगी करने वाले कथित कबूतरबाजों और फर्जी इमीग्रेशन एजेंसियों के खिलाफ भारत सरकार का Ministry of External Affairs सक्रिय हो गया है। मंत्रालय ने उत्तराखंड में संचालित 14 संदिग्ध एजेंसियों और एजेंटों की सूची जारी कर दी है। वहीं Special Task Force Uttarakhand और स्थानीय पुलिस ने भी जांच तेज कर दी है। एसएसपी एसटीएफ अजय सिंह के निर्देश पर शिकायतों का ब्योरा जुटाया जा रहा है और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी चल रही।

विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर युवाओं से धोखाधड़ी करने वाले गिरोहों पर विदेश मंत्रालय ने शिकंजा कस दिया है। मंत्रालय ने उत्तराखंड में सक्रिय 14 एजेंटों और कंपनियों की पहचान कर उनकी सूची वेबसाइट पर जारी की है। इनमें काशीपुर की इनफीवे इमीग्रेशन आईलेट्स, रुद्रपुर का अब्रॉड जॉब वाला और गैलेक्सी ओवरसीज, देहरादून की फास्ट ट्रैक ओवरसीज इंडिया व जीबीसी सॉल्यूशंस, रुड़की की केजी एंटरप्राइज, ऋषिकेश की विमरो इंटरनेशनल समेत कई एजेंट शामिल हैं। जांच में सामने आया कि कई युवाओं को विदेश भेजने के नाम पर ठगा गया और वे विदेशों में फंस गए। देहरादून स्थित फास्ट ट्रैक ओवरसीज इंडिया का कार्यालय बंद मिला, जबकि जीबीसी सॉल्यूशंस और गैलेक्सी ओवरसीज में काम जारी पाया गया। मामले में STF ने कार्रवाई तेज कर दी है। SSP STF अजय सिंह ने बताया कि विदेश मंत्रालय से शिकायतों का पूरा ब्यौरा मांगा गया है, जिसके बाद संबंधित संचालकों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उत्तराखंड में बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं को विदेश में नौकरी, मोटी तनख्वाह और “सुनहरे भविष्य” का सपना दिखाकर ठगने वाले कबूतरबाजों पर अब भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। यह कोई छोटी कार्रवाई नहीं है। मंत्रालय ने उत्तराखंड में सक्रिय 14 संदिग्ध एजेंटों और कंपनियों की सूची सार्वजनिक कर दी है, जिन पर विदेश भेजने के नाम पर युवाओं से लाखों रुपये ऐंठने के आरोप हैं।
यह मामला केवल कुछ फर्जी एजेंसियों का नहीं, बल्कि उत्तराखंड में तेजी से फैलते एक ऐसे “अवैध उद्योग” का है, जिसने हजारों परिवारों की जिंदगी बर्बाद कर दी। खासकर ऊधमसिंह नगर, रुद्रपुर, काशीपुर, देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे शहर अब विदेश भेजने वाले कथित कंसल्टेंसी ऑफिसों के अड्डे बनते जा रहे हैं। हर गली-मोहल्ले में चमकदार बोर्ड, विदेशी झंडे, आईलेट्स और वीजा प्रोसेसिंग के बड़े-बड़े दावे—लेकिन अंदर चल रहा है युवाओं के भविष्य का व्यापार।
विदेश मंत्रालय की सूची ने खोली पोल
विदेश मंत्रालय द्वारा जिन एजेंसियों और एजेंटों को चिन्हित किया गया है, उनमें रुद्रपुर, काशीपुर, देहरादून, ऋषिकेश और रामनगर तक के नाम शामिल हैं।
इनमें प्रमुख रूप से:
इनफीवे इमीग्रेशन आईलेट्स, काशीपुर
अब्रॉड जॉब वाला, आवास विकास रुद्रपुर
गैलेक्सी ओवरसीज, गाबा चौक रुद्रपुर
फास्ट ट्रैक ओवरसीज इंडिया, देहरादून
जीबीसी सॉल्यूशंस, राजपुर रोड देहरादून
विमरो इंटरनेशनल, ऋषिकेश
जैसी एजेंसियां शामिल हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कई एजेंसियां बंद मिलीं, कई दूसरे नाम से संचालित हो रही हैं, और कुछ के पते पर कार्यालय ही नहीं मिला। यह दर्शाता है कि यह पूरा नेटवर्क केवल कागजों और विज्ञापनों पर चलता है। जब शिकायतें बढ़ती हैं तो एजेंसी बंद, नाम बदलो, नया बोर्ड लगाओ और फिर वही खेल शुरू।
रुद्रपुर बना “वीजा मार्केट”?
यदि उत्तराखंड में किसी शहर में सबसे तेजी से “विदेश भेजने का कारोबार” फैला है तो वह है Rudrapur।
रुद्रपुर में गाबा चौक, आवास विकास, मुख्य बाजार, ट्रांजिट कैंप, काशीपुर रोड और कई कॉलोनियों में दर्जनों ऐसी एजेंसियां चल रही हैं जो कनाडा, दुबई, पोलैंड, साइप्रस, रूस, मलेशिया और यूरोप के नाम पर युवाओं को फंसा रही हैं।
कुछ कार्यालयों में एयरपोर्ट की तस्वीरें, विदेशी नोट, नकली ऑफर लेटर और सोशल मीडिया पर “सक्सेस स्टोरी” दिखाकर युवाओं को आकर्षित किया जाता है। बेरोजगारी से परेशान परिवार जमीन बेचकर, गहने गिरवी रखकर या कर्ज लेकर लाखों रुपये इन एजेंसियों को दे देते हैं।
लेकिन जब युवक विदेश पहुंचता है तो वहां:
नौकरी नहीं होती,
वीजा फर्जी निकलता है,
पासपोर्ट जब्त कर लिया जाता है,
मजदूरी कराई जाती है,
या फिर एजेंट गायब हो जाता है।
ऐसे कई युवा विदेशों में फंसकर दूतावासों के चक्कर काटते रहे। तब जाकर विदेश मंत्रालय को इन मामलों की गंभीरता समझ में आई।
आखिर इतनी बड़ी ठगी संभव कैसे?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि ये एजेंसियां वर्षों से चल रही थीं तो स्थानीय प्रशासन, पुलिस, श्रम विभाग, जिला प्रशासन और खुफिया तंत्र क्या कर रहा था?
रुद्रपुर और ऊधमसिंह नगर में वर्षों से यह शिकायत उठती रही कि:
बिना लाइसेंस के इमीग्रेशन ऑफिस खुल रहे हैं,
फर्जी वीजा बनाए जा रहे हैं,
युवाओं से नकद रकम ली जा रही है,
और सोशल मीडिया पर झूठे विज्ञापन चल रहे हैं।
फिर भी कार्रवाई सीमित क्यों रही?
यह प्रश्न केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम पर अविश्वास पैदा करता है।
जब किसी शहर में हर गली में विदेश भेजने वाले ऑफिस खुल जाएं, बड़े-बड़े होर्डिंग लग जाएं, और खुलेआम लाखों रुपये का लेन-देन हो—तो क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं होती?
यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि जानकारी नहीं थी तो यह प्रशासनिक विफलता नहीं तो और क्या है?
बेरोजगारी ने बनाया शिकार
उत्तराखंड का युवा आज सबसे ज्यादा बेरोजगारी से जूझ रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन, उद्योगों में सीमित अवसर और सरकारी नौकरियों की कमी ने युवाओं को विदेश की ओर धकेला है।
कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप जाने का सपना अब गांव-गांव तक पहुंच चुका है। सोशल मीडिया ने इस सपने को और चमकदार बना दिया।
कई एजेंसियां युवाओं को यह कहकर फंसाती हैं:
“तीन महीने में कनाडा”
“वर्क परमिट गारंटी”
“दुबई में 2 लाख वेतन”
“बिना आईलेट्स विदेश नौकरी”
और यही सपना कई परिवारों को बर्बादी के रास्ते पर ले जाता है।
“आईलेट्स सेंटर” की आड़ में कारोबार
ऊधमसिंह नगर और देहरादून में बड़ी संख्या में आईलेट्स और स्पोकन इंग्लिश सेंटर खुले हैं। इनमें से कई वैध हैं, लेकिन कुछ कथित सेंटर विदेश भेजने की दलाली का माध्यम बन चुके हैं।
पहले छात्र को अंग्रेजी कोर्स में जोड़ो, फिर विदेश में पढ़ाई का सपना दिखाओ, फिर नौकरी और वीजा पैकेज बेचो।
युवाओं को यह नहीं बताया जाता कि:
कौन सी यूनिवर्सिटी मान्यता प्राप्त है,
कौन सा वीजा वैध है,
कौन सी नौकरी वास्तविक है।
कई मामलों में युवाओं को टूरिस्ट वीजा पर भेजकर अवैध काम में धकेल दिया जाता है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स पहले भी उठा चुका मुद्दा
इस तरह की गतिविधियों को लेकर Hindustan Global Times लगातार खबरें प्रकाशित करता रहा है। कई मामलों में रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद कार्रवाई भी हुई।
लेकिन समस्या यह है कि:
एजेंसी बंद,
नया नाम,
नया बोर्ड,
नया ऑफिस,
और फिर वही खेल।
कई एजेंटों ने तो अपने रिश्तेदारों या कर्मचारियों के नाम पर नई कंपनियां खोल लीं।
इस पूरे नेटवर्क में स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कुछ मामलों में राजनीतिक संरक्षण और सांठगांठ के आरोप भी सामने आते रहे हैं।
क्या केवल एजेंट दोषी हैं?
यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि कोई युवक लाखों रुपये देकर विदेश जा रहा है, तो:
बैंकिंग ट्रांजैक्शन कौन देख रहा है?
लाइसेंस कौन जांच रहा है?
पुलिस सत्यापन कौन कर रहा है?
श्रम विभाग क्या कर रहा है?
जिला प्रशासन की निगरानी कहां है?
सिर्फ एजेंटों को पकड़ लेने से समस्या खत्म नहीं होगी।
जब तक सिस्टम में जवाबदेही तय नहीं होगी, यह कारोबार चलता रहेगा।
एसटीएफ की कार्रवाई कितनी प्रभावी होगी?
Special Task Force Uttarakhand ने कार्रवाई तेज करने की बात कही है। एसएसपी अजय सिंह ने शिकायतों का पूरा ब्योरा मांगा है।
यह स्वागत योग्य कदम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई केवल कुछ दिनों की औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
क्योंकि उत्तराखंड में पहले भी कई बड़े फर्जीवाड़े सामने आए:
फर्जी कॉल सेंटर,
ऑनलाइन ट्रेडिंग ठगी,
जमीन घोटाले,
और भर्ती घोटाले।
लेकिन कुछ समय बाद मामले ठंडे पड़ जाते हैं।
क्या उत्तराखंड “नया मानव तस्करी कॉरिडोर” बन रहा है?
यह चिंता अब गंभीर होती जा रही है।
जब बेरोजगार युवाओं को गलत दस्तावेजों पर विदेश भेजा जाता है, अवैध काम में लगाया जाता है या दूसरे देशों में फंसाया जाता है—तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं रह जाता। यह मानव तस्करी जैसी गंभीर श्रेणी तक पहुंच सकता है।
कुछ मामलों में युवाओं को:
होटल वर्कर बनाकर भेजा गया,
लेकिन वहां मजदूरी कराई गई,
पासपोर्ट छीन लिए गए,
और महीनों तक वेतन नहीं मिला।
ऐसे मामलों में परिवारों ने स्थानीय पुलिस से लेकर दूतावास तक गुहार लगाई।
देवभूमि की छवि पर दाग
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की पहचान ईमानदारी, सैन्य परंपरा और मेहनतकश समाज रही है।
लेकिन आज वही राज्य फर्जी इमीग्रेशन, वीजा धोखाधड़ी और कबूतरबाजी जैसे शब्दों से जुड़ने लगा है।
यह केवल प्रशासनिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट भी है।
जब युवा मेहनत और शिक्षा के बजाय “शॉर्टकट विदेश” के जाल में फंसने लगे तो यह समाज के भविष्य के लिए भी खतरा है।
सरकार को क्या करना चाहिए?
राज्य सरकार और केंद्र सरकार को मिलकर कुछ सख्त कदम उठाने होंगे:
1. सभी इमीग्रेशन एजेंसियों का सत्यापन
राज्यभर में चल रही सभी एजेंसियों की जांच होनी चाहिए।
2. बिना लाइसेंस ऑफिस सील हों
जो एजेंसियां विदेश मंत्रालय से अधिकृत नहीं हैं, उन्हें तत्काल बंद किया जाए।
3. जिला स्तर पर हेल्पलाइन
विदेश जाने वाले युवाओं के लिए सरकारी सत्यापन हेल्पलाइन बनाई जाए।
4. जनजागरूकता अभियान
गांव-गांव तक बताया जाए कि फर्जी एजेंटों से कैसे बचें।
5. अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
जहां वर्षों से अवैध एजेंसियां चल रही थीं, वहां संबंधित अधिकारियों से जवाब लिया जाए।
6. पीड़ित परिवारों के लिए सहायता तंत्र
जो युवा विदेशों में फंस गए हैं, उन्हें कानूनी और राजनयिक सहायता दी जाए।
उत्तराखंड का युवा ठगी नहीं, अवसर चाहता है
सच्चाई यह है कि उत्तराखंड का युवा मेहनती है। वह रोजगार चाहता है, सम्मानजनक जीवन चाहता है।
लेकिन जब राज्य में पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तब वह विदेश जाने का सपना देखता है। और इसी मजबूरी का फायदा उठाते हैं कबूतरबाज।
आज जरूरत केवल एजेंसियों पर कार्रवाई की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की है जिसने युवाओं को ठगी के दलदल में धकेल दिया।


विदेश मंत्रालय की कार्रवाई ने उत्तराखंड में फैले एक बड़े नेटवर्क की परतें खोल दी हैं। लेकिन यह केवल शुरुआत है।
यदि सरकार सचमुच इस “कबूतरबाजी उद्योग” को खत्म करना चाहती है तो उसे:
राजनीतिक संरक्षण,
प्रशासनिक लापरवाही,
और भ्रष्ट नेटवर्क
सब पर एक साथ चोट करनी होगी।
अन्यथा कुछ दिनों बाद वही होगा जो वर्षों से होता आया है—
पुराना बोर्ड हटेगा, नया नाम लगेगा, नया सपना बेचा जाएगा, और उत्तराखंड का एक और परिवार अपनी गाढ़ी कमाई गंवा देगा।


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