हल्द्वानी का नया मीडिया सेंटर उम्मीद की किरण, रुद्रपुर का खंडहर बना चेतावनी?मीडिया के नए युग का स्वागत, लेकिन रुद्रपुर के खंडहर से भी सीख जरूरी

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उत्तराखंड के पत्रकारिता जगत के लिए हल्द्वानी में बनने जा रहा अत्याधुनिक “कुमाऊँ मीडिया सेंटर”  लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सम्मान और सशक्तिकरण का प्रतीक है। ₹6.75 करोड़ की लागत से बनने वाला यह केंद्र आधुनिक डिजिटल सुविधाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल, लाइब्रेरी और दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले पत्रकारों के लिए आवासीय व्यवस्था जैसी योजनाओं के साथ निश्चित रूप से कुमाऊँ की पत्रकारिता को नई दिशा देगा। मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami द्वारा पत्रकार कल्याण कोष, स्वास्थ्य बीमा और वरिष्ठ पत्रकार पेंशन जैसी योजनाओं को मजबूती देना भी स्वागतयोग्य पहल है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से कुमाऊँ मंडल के पत्रकारों को अपने छोटे-बड़े प्रशासनिक कार्यों के लिए देहरादून की दौड़ लगानी पड़ती थी। अब हल्द्वानी से ही अधिकांश कार्य संचालित होने की व्यवस्था पत्रकारों के समय, संसाधन और ऊर्जा की बचत करेगी। यह सरकार की उस सोच को दर्शाता है जिसमें पत्रकारिता को केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन की साझेदार शक्ति माना गया है।
लेकिन इस नई शुरुआत के बीच उत्तराखंड के तराई क्षेत्र उधम सिंह नगर, विशेषकर रुद्रपुर के अतीत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य गठन के बाद विकास के नाम पर सबसे पहले जिन महत्वपूर्ण संस्थागत पहलों में से एक थी, वह था रुद्रपुर का मीडिया हाउस। उस समय उम्मीद थी कि यह भवन तराई क्षेत्र की पत्रकारिता का मजबूत केंद्र बनेगा, पत्रकारों को एक मंच देगा और मीडिया की गरिमा को नई ऊंचाई तक पहुंचाएगा।
दुर्भाग्य यह रहा कि वह सपना धीरे-धीरे निजी स्वार्थों, गुटबाजी और कुछ तथाकथित पत्रकारों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया। सरकारों ने अपनी ओर से कमी नहीं छोड़ी। पत्रकारों के लिए आवासीय योजना के तहत भूमि आवंटन की पहल भी हुई, लेकिन पत्रकार एकजुटता के अभाव और व्यक्तिगत हितों की राजनीति ने उस योजना को भी खटाई में डाल दिया। परिणाम यह हुआ कि जो मीडिया हाउस पत्रकारिता की पहचान बन सकता था, वह आज बदहाली और खंडहर का प्रतीक बनकर खड़ा है।
यह कटु सत्य स्वीकार करना होगा कि हर विफलता के लिए केवल सरकार जिम्मेदार नहीं होती। कई बार संस्थाओं को खोखला करने का काम भीतर बैठे लोग ही करते हैं। रुद्रपुर मीडिया हाउस की दुर्दशा भी इसी सच्चाई का उदाहरण है, जहां सामूहिक हितों पर व्यक्तिगत लाभ भारी पड़ गया।
आज जब हल्द्वानी में नया मीडिया सेंटर आकार ले रहा है, खुशी का अवसर, आत्ममंथन का भी समय है। अगर पत्रकार समाज अपनी संस्थाओं को निजी स्वार्थों से ऊपर उठाकर सामूहिक उत्तरदायित्व के साथ नहीं चलाएगा, तो आधुनिक भवन भी भविष्य में खंडहर बनने से नहीं बच पाएंगे।
हल्द्वानी का मीडिया सेंटर उत्तराखंड की पत्रकारिता के लिए आशा की नई किरण है। जरूरत इस बात की है कि रुद्रपुर की गलतियों से सीख लेते हुए पत्रकारिता की संस्थाओं को संघर्ष, ईमानदारी और सामूहिक जिम्मेदारी के आधार पर आगे बढ़ाया जाए, ताकि लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ सच मायनों में मजबूत बन सके।


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