राहुल गांधी की अल्मोड़ा सभा और उत्तराखंड की राजनीति : सवाल मौसम का या रणनीति का?

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अल्मोड़ा में प्रस्तावित राहुल गांधी की जनसभा में उनके नहीं पहुंच पाने के पीछे मौसम खराब होने का कारण बताया गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम की अनिश्चितता कोई नई बात नहीं है। विशेषकर मानसून पूर्व और मानसून काल में कुमाऊं क्षेत्र से लेकर तराई तक अचानक बादल, वर्षा और कम दृश्यता हवाई संचालन को प्रभावित करती रही है। ऐसे में यदि सुरक्षा एजेंसियों और विमानन विशेषज्ञों ने उड़ान को सुरक्षित नहीं माना, तो कार्यक्रम में बदलाव स्वाभाविक माना जा सकता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


हालांकि राजनीति में हर घटना के पीछे कई तरह की चर्चाएं भी जन्म लेती हैं। राहुल गांधी के कार्यक्रम में परिवर्तन के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या इसके पीछे केवल मौसम था या फिर संगठनात्मक कारण भी थे। कुछ लोग भीड़ के अनुमान, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल और शक्ति प्रदर्शन जैसे सवाल उठा रहे हैं। लेकिन जब तक किसी प्रकार का ठोस प्रमाण सामने न आए, तब तक इन चर्चाओं को केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जाना चाहिए।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के लिए उत्तराखंड में बड़े नेताओं की सभाएं पर्याप्त होंगी? उत्तराखंड का मतदाता अब पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व माना जाता है। राज्य निर्माण के बाद जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को सत्ता में बैठाया है और दोनों को विपक्ष में भी भेजा है। इससे स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति किसी एक नेता या दल के व्यक्तित्व के बजाय जनता के अनुभव और अपेक्षाओं पर आधारित होती जा रही है।
राहुल गांधी का उत्तराखंड आना या न आना राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से एक खबर हो सकती है, लेकिन राज्य की जनता के लिए अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़क, पर्यटन, कृषि और आपदा प्रबंधन हैं। जनता अंततः इन्हीं विषयों पर सरकारों का मूल्यांकन करती है।
कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह केवल भाजपा विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी बताए कि यदि उसे सत्ता मिलती है तो वह राज्य के लिए क्या अलग करेगी। वहीं भाजपा को भी अपने कार्यकाल की उपलब्धियों और अधूरे वादों का जवाब जनता के सामने रखना होगा। लोकतंत्र में जनता का फैसला भावनाओं से अधिक कार्यों के आधार पर होता है।
इसलिए अल्मोड़ा की सभा में राहुल गांधी का नहीं पहुंच पाना राजनीतिक चर्चा का विषय अवश्य हो सकता है, लेकिन इसे किसी बड़े का आधार बनाना जल्दबाजी होगी। उत्तराखंड की जनता नेताओं की उपस्थिति से अधिक उनके काम और नीतियों को महत्व देती है। जिसने अच्छा काम किया होगा, जनता उसे अवसर देगी और जिसने अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा होगा, उसे विपक्ष में बैठने का निर्णय भी जनता ही करेगी।
लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि अंतिम फैसला किसी नेता, दल या सभा का नहीं, बल्कि मतदाता का होता है।राहुल गांधी भले ही मौसम के कारण अल्मोड़ा की जनसभा में नहीं पहुंच सके, लेकिन कांग्रेस संगठन ने इस आयोजन के माध्यम से अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन कर दिया है। प्रदेश भर से नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए पूरी तरह सक्रिय हो चुकी है। अल्मोड़ा से कांग्रेस ने कुमाऊं की जनता को यह संकेत भी दिया है कि वह मैदान में उतर चुकी है और भाजपा को सीधी चुनौती देने की तैयारी कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह शक्ति प्रदर्शन चुनावी समर्थन में कितना बदल पाता है।

अल्मोड़ा में उमड़ा जनसैलाब, राहुल गांधी की सभा ने रचा ऐतिहासिक माहौल
अल्मोड़ा में प्रस्तावित राहुल गांधी की जनसभा ने कुमाऊं की राजनीति में एक अलग ही संदेश दिया। सभा स्थल पर सुबह से ही लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। मैदान ही नहीं, उससे जुड़ी सड़कें, गलियां और आसपास के क्षेत्र भी लोगों से खचाखच भरे दिखाई दिए। बड़ी संख्या में लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे और मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उत्साह कम नहीं हुआ। हालात ऐसे थे कि सभा स्थल भर जाने के बाद भी लोगों का आना लगातार जारी रहा।
यह भीड़ केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं दिखी, बल्कि इसे कांग्रेस के प्रति बढ़ते जनसमर्थन और संगठनात्मक ताकत के प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर इसे हाल के वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक जुटानों में से एक माना जा रहा है। राहुल गांधी के नहीं पहुंच पाने के बावजूद जनसमूह की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस ने कुमाऊं क्षेत्र में अपनी राजनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क को नई धार देने की कोशिश की है।


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