उत्तराखंड राज्य आंदोलन : संघर्ष की वह आग, जो आज भी बुझी नहींसपने अधूरे हैं, उन्हें पूरा करना अभी बाकी है

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उधम सिंह नगर को उत्तराखंड में मिला जनआंदोलनों का जननायक — अवतार सिंह बिष्ट,

“1987 से आज तक उत्तराखंड राज्य आंदोलन: संघर्ष, बलिदान और जनआकांक्षाओं की गाथा”
1987 से प्रारंभ हुआ उत्तराखंड राज्य आंदोलन क्षेत्रीय अस्मिता, विकास और अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक रहा। हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष, अनेक शहीदों के बलिदान और जनदबाव के परिणामस्वरूप वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, जो आज भी आंदोलन की विरासत को स्मरण कराता है।


उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्षपूर्ण इतिहास में अवतार सिंह बिष्ट का नाम एक ऐसे जननायक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने उधम सिंह नगर की धरती से आंदोलन को नई ऊर्जा और नई दिशा दी। 24, 36 और 72 घंटे के ऐतिहासिक बंद, नगला स्टेशन और नगला चौराहे पर हुए अभूतपूर्व धरनों, से पूरे उधम सिंह नगर में मिल का पत्थर साबित हुआ उधम सिंह नगर को उत्तराखंड में मिलने का विरोध करने वालों के मंसूबा पर पानी गिर दिया गया।और पूरे उत्तराखंड में इसका व्यापक असर देखने को मिला था ,दिल्ली में फिरोजशाह कोटला मैदान से इंडिया गेट और संसद भवन तक निकाली गई पदयात्राओं में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें आंदोलन की अग्रिम पंक्ति का योद्धा बनाया। राज्य आंदोलन के पुरोधाओं काशी सिंह एरी, स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी, स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी और डॉ. नारायण सिंह जटवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने वाले अवतार सिंह बिष्ट आज भी पत्रकारिता के माध्यम से उत्तराखंड आंदोलन की मूल भावना, जनसरोकारों और अधूरे सपनों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और जनहित की निरंतर लड़ाई का प्रेरक अध्याय है।


उत्तराखंड राज्य की स्थापना को आज पच्चीस वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। एक लंबे संघर्ष, बलिदान, जेल यात्राओं, लाठीचार्ज, गोलियों और जनआंदोलनों की तपिश से यह राज्य अस्तित्व में आया। लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जिस उत्तराखंड का सपना हमने देखा था, वह आज भी अधूरा है। राज्य तो बना, लेकिन राज्य आंदोलन की मूल अवधारणा आज भी अपने वास्तविक स्वरूप की प्रतीक्षा कर रही है।
मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के उन महान सेनानियों के साथ संघर्ष करने का अवसर मिला, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वोत्तम समय इस आंदोलन को समर्पित कर दिया। पांच बार विधायक रहे काशी सिंह एरी, राज्य आंदोलन के पुरोधा स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी, स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी, पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जंतवाल सहित अनेक संघर्षशील साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का अवसर मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
उत्तराखंड आंदोलन केवल एक राज्य की मांग नहीं था। यह पर्वतीय अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के अधिकार की लड़ाई थी। यह उस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष था जिसने दशकों तक पहाड़ों की उपेक्षा की। उस दौर में हम सबने मिलकर जो आंदोलन खड़ा किया, वह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान था।
मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब जिला उधम सिंह नगर  पर आंदोलन अपने चरम पर था। 24 घंटे, 36 घंटे और 72 घंटे के ऐतिहासिक बंद आयोजित किए गए। इन बंदों का प्रभाव इतना व्यापक था कि रेल यातायात तक पूरी तरह प्रभावित हुआ। नगला स्टेशन और नगला चौराहा आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र बन गए थे। वहां दिया गया धरना उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
उस समय न कोई व्यक्तिगत स्वार्थ था और न कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा। हर व्यक्ति के मन में केवल एक ही भावना थी—अलग उत्तराखंड राज्य का निर्माण। किसान, मजदूर, व्यापारी, छात्र, महिलाएं और युवा सभी आंदोलन का हिस्सा बने। यही कारण था कि आंदोलन जनांदोलन बन गया।
उधम सिंह नगर में आंदोलन को नई दिशा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए। दस से अधिक बड़े धरना-प्रदर्शनों और जनसभाओं में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मुझे मिला। आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए दिल्ली में भी कई कार्यक्रम आयोजित हुए।
फिरोजशाह कोटला मैदान से इंडिया गेट तक निकाली गई पैदल यात्रा केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि देश की राजधानी को यह संदेश देने का प्रयास था कि उत्तराखंड की जनता अब अपने अधिकारों के लिए किसी भी सीमा तक संघर्ष करने को तैयार है। इसके बाद फिरोजशाह कोटला मैदान से संसद भवन तक की दूसरी यात्रा ने आंदोलन को और अधिक मजबूती प्रदान की।
मुझे गर्व है कि उधम सिंह नगर को उत्तराखंड आंदोलन के मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करने में जो भूमिका निभाई गई, उसमें मेरा भी योगदान रहा। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष का परिणाम था जिन्होंने दिन-रात एक कर दिया।
लेकिन आज जब राज्य बनने के वर्षों बाद हम वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन करते हैं तो कई प्रश्न सामने खड़े हो जाते हैं।
क्या पलायन रुका?
क्या युवाओं को रोजगार मिला?
क्या गांवों की तस्वीर बदली?
क्या पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई?
क्या आंदोलन के शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बन पाया?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने पर निराशा हाथ लगती है।
आज भी हजारों गांव खाली हो रहे हैं। युवा रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। कृषि संकट में है। पर्वतीय क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। राज्य बनने के पीछे जो सोच थी, वह कहीं न कहीं सत्ता और राजनीति के गलियारों में खोती हुई दिखाई देती है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल भौगोलिक पुनर्गठन का आंदोलन नहीं था। यह जनभागीदारी आधारित विकास मॉडल का सपना था। हम ऐसा राज्य चाहते थे जहां स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार हो। जहां नीति निर्माण में जनता की भागीदारी हो। जहां पहाड़, मैदान और सीमांत क्षेत्र समान रूप से विकसित हों।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आंदोलन की मूल भावना को पुनः समझें। नई पीढ़ी को यह बताया जाए कि उत्तराखंड राज्य उन्हें विरासत में नहीं मिला, बल्कि हजारों लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। यह राज्य उन माताओं की आंखों के आंसुओं से बना है जिन्होंने अपने बेटों को आंदोलन में खोया। यह उन युवाओं की कुर्बानियों से बना है जिन्होंने अपने भविष्य की चिंता किए बिना आंदोलन का रास्ता चुना।
एक पत्रकार के रूप में मैं आज भी उसी संघर्ष को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूं। पत्रकारिता मेरे लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि जनसरोकारों की लड़ाई का माध्यम है। मेरी कलम आज भी उन्हीं मुद्दों को उठाने का प्रयास करती है जिनके लिए उत्तराखंड आंदोलन हुआ था।
सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता के मुद्दे स्थायी होते हैं। जब तक अंतिम व्यक्ति तक विकास नहीं पहुंचता, जब तक युवाओं को सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलता, जब तक गांवों में जीवन नहीं लौटता और जब तक आंदोलन के मूल उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होती, तब तक यह संघर्ष समाप्त नहीं माना जा सकता।
उत्तराखंड आंदोलन की मशाल बुझी नहीं है। वह आज भी जल रही है। जरूरत केवल उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की है। हमें फिर से उस चेतना को जगाना होगा जिसने कभी लाखों लोगों को एक सूत्र में बांध दिया था।
मैं उन सभी ज्ञात-अज्ञात आंदोलनकारियों को नमन करता हूं जिन्होंने इस राज्य के निर्माण में अपना योगदान दिया। विशेष रूप से काशी सिंह एरी, स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी, स्वर्गीय विपिन चंद्र त्रिपाठी, डॉ. नारायण सिंह जंतवाल और उन असंख्य साथियों को, जिनकी बदौलत उत्तराखंड अस्तित्व में आया।
राज्य बन गया है, लेकिन आंदोलन के सपने अभी अधूरे हैं। उन्हें पूरा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन शहीदों और आंदोलनकारियों के प्रति जिन्होंने उत्तराखंड के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।

यह विषय ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से जुड़ा है, इसलिए इसे एक मत-आधारित लेख के रूप में प्रस्तुत करना उचित होगा।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में उधम सिंह नगर के कई मैदानी क्षेत्रों—रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर और जसपुर—में पृथक उत्तराखंड राज्य के विरोध की आवाजें भी सुनाई देती थीं। आंदोलन समर्थकों का मानना है कि उस समय रुद्रपुर विरोध का प्रमुख केंद्र बना हुआ था, जहां उत्तराखंड राज्य की मांग के खिलाफ संगठित गतिविधियां चलती थीं। इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने संघर्ष जारी रखा और राज्य निर्माण की आवाज को कमजोर नहीं होने दिया।
इस पूरे संघर्ष में नगला क्षेत्र की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। आंदोलन समर्थकों के अनुसार नगला के जागरूक नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने राज्य आंदोलन की वास्तविक स्थिति और जनभावनाओं को दिल्ली दरबार तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। उनके प्रयासों से यह संदेश राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा कि उत्तराखंड की मांग केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक जनआकांक्षाएं जुड़ी हुई हैं। यही संघर्ष और जनदबाव अंततः उत्तराखंड राज्य के गठन का आधार बना।


संघर्ष जारी है, क्योंकि सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं।


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