अजब-गजब उत्तराखंड: आपदाओं की पीड़ा पर सम्मान के तमगे?

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उत्तराखंड  देवभूमि हिमालय की गोद में बसा यह राज्य प्राकृतिक सौंदर्य, नदियों, ग्लेशियरों और धार्मिक आस्था का केंद्र है। लेकिन पिछले दो दशकों में यह राज्य एक और पहचान से भी जाना जाने लगा है—लगातार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का प्रदेश।
जब भी उत्तराखंड का नाम राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आता है, तो अक्सर उसके साथ किसी न किसी आपदा का उल्लेख जुड़ा होता है। कभी केदारनाथ त्रासदी, कभी चमोली आपदा, कभी जोशीमठ का भू-धंसाव, कभी सिलक्यारा सुरंग हादसा, तो कभी धराली में बादल फटने की घटना। ऐसे में जब यह कहा जाता है कि उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन मॉडल दुनिया के लिए उदाहरण बन गया है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा जा रहा है, तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े होते हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

आपदाओं पर पुरस्कारों की बारिश: क्या उत्तराखंड की हकीकत से दुनिया अनजान है?
अजब-गजब उत्तराखंड: त्रासदियों के बीच सम्मान के तमगे
केदारनाथ से धराली तक: दर्द जनता का, वाहवाही सरकार की?
आपदा प्रबंधन या आपदा प्रचार? उत्तराखंड पर उठते सवाल
जब पहाड़ रो रहे हैं, तब पुरस्कार क्यों मिल रहे हैं?
उत्तराखंड का सच: आपदाओं की राजधानी या प्रबंधन का मॉडल?
आपदा में अवसर: क्या यही है उत्तराखंड मॉडल?
धराली, जोशीमठ, सिलक्यारा और पुरस्कारों की कहानी
सम्मान की चमक में छिपा पहाड़ का दर्द
जनता पूछ रही है: आपदाएं बढ़ीं या प्रबंधन बेहतर हुआ?
त्रासदी से तालियां तक: उत्तराखंड की विरोधाभासी कहानी
पहाड़ का दर्द बनाम पुरस्कारों का शोर
उत्तराखंड को अवार्ड क्यों? जब सवाल अभी बाकी हैं
आपदाओं से कराहता उत्तराखंड और उपलब्धियों के दावे
झूठ का पुलिंदा या हकीकत? आपदा प्रबंधन पर बड़ा सवाल


सबसे पहला प्रश्न यही है कि आखिर किस उपलब्धि के लिए यह सम्मान और प्रशंसा दी जा रही है? क्या इसलिए कि राज्य में बार-बार आपदाएं आ रही हैं? या इसलिए कि आपदाओं के बाद राहत और बचाव कार्य किए जा रहे हैं?
सच्चाई यह है कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की चर्चा अक्सर तब शुरू होती है जब कोई बड़ी त्रासदी हो चुकी होती है। आपदा रोकने की बजाय आपदा के बाद राहत कार्यों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह वैसा ही है जैसे किसी घर में बार-बार आग लगती रहे और हर बार आग बुझाने वालों को पुरस्कार मिलते रहें, लेकिन कोई यह न पूछे कि आग लग क्यों रही है।
केदारनाथ त्रासदी: क्या सबक लिया गया?
साल 2013 में हुई केदारनाथ आपदा को कौन भूल सकता है? हजारों लोगों की मौत हुई, पूरे गांव बह गए, सड़कें और पुल नष्ट हो गए। इसे स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में गिना जाता है।
उस समय कहा गया था कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यापक नीति बनाई जाएगी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ? आज भी अनियंत्रित निर्माण, पहाड़ों की कटाई और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी जारी है।
चमोली आपदा और विकास मॉडल
फरवरी 2021 में चमोली जिले के ऋषिगंगा और धौलीगंगा क्षेत्र में आई आपदा ने दर्जनों लोगों की जान ले ली। वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्र में अंधाधुंध निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर गंभीर चिंता जताई थी।
लेकिन क्या इन चेतावनियों पर गंभीरता से अमल हुआ? या फिर विकास के नाम पर वही पुरानी नीतियां जारी रहीं?
जोशीमठ: डूबता शहर, मौन व्यवस्था
जोशीमठ भू-धंसाव ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। घरों में दरारें आईं, लोगों को अपने आशियाने छोड़ने पड़े। विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी देते रहे कि यह क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील है।
फिर भी प्रशासन और सरकार तब सक्रिय दिखे जब संकट विकराल रूप ले चुका था। आज भी कई प्रभावित परिवार स्थायी पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सिलक्यारा सुरंग: हादसा या चेतावनी?
सिलक्यारा सुरंग में 41 मजदूरों का फंसना निश्चित रूप से एक बड़ी मानवीय त्रासदी थी। उनका सुरक्षित बाहर निकलना राहत की बात थी और बचाव दलों की मेहनत सराहनीय थी।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सुरंग धंसी क्यों? क्या परियोजना के निर्माण में कोई तकनीकी या भूगर्भीय खामियां नहीं थीं? क्या उन सवालों के जवाब कभी जनता को मिले?
आज बचाव अभियान की सफलता को उपलब्धि बताया जाता है, लेकिन हादसे के कारणों पर चर्चा बहुत कम होती है।
धराली की त्रासदी
धराली में बादल फटने और मलबे के सैलाब ने लोगों की जिंदगी बदल दी। घर, दुकानें, सड़कें और आजीविका सब कुछ प्रभावित हुआ।
राहत कार्य हुए, बचाव दलों ने मेहनत की, लेकिन क्या यह पूछना गलत है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व चेतावनी व्यवस्था और जोखिम मूल्यांकन कितना प्रभावी था?
आपदा में अवसर की राजनीति
उत्तराखंड की जनता लंबे समय से एक सवाल पूछती रही है कि आखिर हर आपदा के बाद करोड़ों रुपये के पुनर्निर्माण और राहत पैकेज कहां खर्च होते हैं?
सड़कें बार-बार टूटती हैं, पुल बह जाते हैं, गांव खाली होते जा रहे हैं, लेकिन योजनाओं की घोषणाएं लगातार बढ़ती जाती हैं।
ऐसा लगता है मानो आपदाएं केवल प्राकृतिक नहीं रहीं, बल्कि एक प्रशासनिक और राजनीतिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गई हों।
क्या सचमुच दुनिया के लिए मॉडल है उत्तराखंड?
यदि किसी राज्य को आपदा प्रबंधन का मॉडल कहा जाता है तो उसके कुछ स्पष्ट मानदंड होने चाहिए—
क्या वहां आपदाओं की आवृत्ति कम हुई?
क्या जनहानि में उल्लेखनीय कमी आई?
क्या संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण नियंत्रण प्रभावी हुआ?
क्या विस्थापन रुका?
क्या वैज्ञानिक चेतावनियों का पालन हुआ?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल बचाव अभियानों की सफलता के आधार पर पूरे मॉडल को आदर्श घोषित करना जल्दबाजी होगी।
सम्मान किसे मिलना चाहिए?
यदि किसी को सम्मान मिलना चाहिए तो सबसे पहले उन स्थानीय लोगों को, जिन्होंने संकट के समय अपने प्राणों की परवाह किए बिना दूसरों की सहायता की।
उन जवानों को, जिन्होंने बर्फ, बारिश और मलबे के बीच राहत अभियान चलाए।
उन ग्रामीणों को, जिन्होंने अपने घरों के दरवाजे पीड़ितों के लिए खोले।
और उन वैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों को, जिन्होंने वर्षों पहले आने वाले खतरों की चेतावनी दी थी।
जनता का सवाल
उत्तराखंड की जनता सम्मान और पुरस्कारों से अधिक सुरक्षित जीवन चाहती है। वह चाहती है कि उसके गांव सुरक्षित रहें, उसकी नदियां स्वच्छ रहें, उसके पहाड़ स्थिर रहें और उसके बच्चों को हर मानसून में भय के साथ न जीना पड़े।
यदि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उत्तराखंड की प्रशंसा हो रही है तो स्वागत है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि राज्य के लोग स्वयं महसूस करें कि आपदाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता कम हुई है और उनकी सुरक्षा बढ़ी है।
जब तक केदारनाथ, चमोली, जोशीमठ, रैणी, धराली, सिलक्यारा और अन्य अनेक त्रासदियों से मिले सबक नीति और व्यवहार में पूरी तरह नहीं उतरते, तब तक पुरस्कारों और प्रशंसाओं के बीच जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा—क्या हम वास्तव में आपदा प्रबंधन में मॉडल बन गए हैं, या फिर केवल आपदाओं के बाद की कहानियों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं?
उत्तराखंड की जनता को सम्मान नहीं, सुरक्षित भविष्य चाहिए। यही सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।

खबर प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों से जूझने वाला उत्तराखंड अब आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। ब्रिक्स देशों की तीन दिवसीय DRRG बैठक में उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मॉडल की विशेष सराहना की गई। बैठक में 11 सदस्य एवं साझेदार देशों के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व एसडीआरएफ सेनानायक अर्पण यदुवंशी और यूएलएमएमसी निदेशक शांतनु सरकार ने किया। उन्होंने राज्य की पूर्व चेतावनी प्रणाली, जोखिम न्यूनीकरण, तकनीक आधारित निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र की जानकारी साझा की। सिल्क्यारा टनल रेस्क्यू और धराली आपदा प्रबंधन अभियानों को कठिन परिस्थितियों में सफल संचालन के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रतिनिधियों ने उत्तराखंड की प्रशासनिक समन्वय क्षमता, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और मानवीय दृष्टिकोण की प्रशंसा की। अधिकारियों ने कहा कि पूर्व तैयारी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, प्रशिक्षित बल और भू-स्थानिक तकनीक भविष्य की आपदा चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।


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