उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ने वाले सेनानी आज उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। किसी के कदम जवाब दे चुके हैं, कोई बीमारी से जूझ रहा है और कई आंदोलनकारी इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने अपने संघर्ष, त्याग और बलिदान से उत्तराखंड राज्य का सपना साकार किया, उनके आश्रित आज किस हाल में हैं?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के पत्रकार अवतार सिंह बिष्ट को भेजे गए एक मार्मिक संदेश ने इस सवाल को फिर से जीवित कर दिया है। एक राज्य आंदोलनकारी महिला, जिसने उत्तराखंड आंदोलन के दौरान सड़कों पर संघर्ष किया, धरनों में भाग लिया और अपने छोटे बच्चों को भी आंदोलन स्थलों तक लेकर गई, आज अपनी बेटी के भविष्य को लेकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।
यह बेटी, जिसे सरकार ने राज्य आंदोलनकारी का आश्रित प्रमाण पत्र भी जारी किया है, लगभग चार वर्ष पूर्व एक दुर्घटना का शिकार हुई। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि वह दोनों पैरों से चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। आज उसका जीवन व्हीलचेयर और दूसरों के सहारे पर टिका हुआ है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और उम्मीद की आखिरी किरण राज्य आंदोलनकारी संगठन तथा सरकार से मिलने वाली सहायता पर टिकी है।
विडंबना देखिए कि जिस आंदोलन में महिलाएं अपने नाबालिग बच्चों को साथ लेकर गईं, उन बच्चों का आज तक कोई समुचित चिन्हीकरण नहीं हो पाया। कई आश्रित सरकारी योजनाओं और सुविधाओं से वंचित हैं। जिन लोगों ने आंदोलन का विरोध किया, वे लाभ उठा रहे हैं, जबकि आंदोलन की असली पीढ़ी और उनके परिवार उपेक्षा का शिकार हैं।
राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्हें आरक्षण, रोजगार और अन्य सुविधाओं के नाम पर केवल आश्वासन मिले। कई मामलों में पेंशन तक समय पर नहीं मिलती। आश्रितों की समस्याएं वर्षों से फाइलों में दबी हुई हैं। जिन परिवारों ने राज्य निर्माण के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया, आज वही परिवार सहायता और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
एक ओर उत्तराखंड सरकार को आपदा प्रबंधन और विकास कार्यों के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य निर्माण की नींव रखने वाले आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों की पीड़ा अनसुनी बनी हुई है। यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है। क्या राज्य निर्माण का सपना देखने वालों का यही सम्मान है? क्या आंदोलनकारियों के आश्रितों का भविष्य केवल घोषणाओं और आश्वासनों तक सीमित रहेगा?
यह कहानी केवल एक बेटी की नहीं है। उत्तराखंड के गांव-गांव में ऐसे न जाने कितने राज्य आंदोलनकारी परिवार हैं, जो पहचान, सम्मान, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। समय आ गया है कि सरकार केवल सम्मान समारोहों और घोषणाओं से आगे बढ़कर इन परिवारों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करे।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि उन परिवारों की आंखों में दर्ज है जो आज भी न्याय और सम्मान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
