संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसियों ने दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ते भुखमरी संकट को लेकर चेतावनी दी है। सूडान, गाजा, यमन और सोमालिया जैसे क्षेत्रों में युद्ध, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता के कारण करोड़ों लोग खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो एक सवाल भारत के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के संदर्भ में भी उठता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।
वर्ष 2000 में राज्य गठन के समय उत्तराखंड की पहचान कृषि और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में थी। लेकिन पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर पलायन, कृषि भूमि का परती होना, पारंपरिक खेती में गिरावट और युवाओं का कृषि से मोहभंग देखने को मिला है। कई गांवों में खेती का क्षेत्र लगातार घटा है और पशुपालन भी कमजोर हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज बड़ी संख्या में परिवार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (सरकारी राशन), वृद्धावस्था पेंशन, मनरेगा और स्वयं सहायता समूहों की आय पर निर्भर हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी कारणवश खाद्यान्न वितरण व्यवस्था बाधित हो जाए, तो कमजोर वर्गों की खाद्य सुरक्षा पर कितना असर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में खाद्य संकट की आशंका से बचने के लिए कृषि को पुनर्जीवित करना, बंजर भूमि का उपयोग बढ़ाना, स्थानीय अनाजों जैसे मंडुवा, झंगोरा और चौलाई को प्रोत्साहित करना तथा पशुपालन एवं ग्रामीण रोजगार को मजबूत करना आवश्यक है। विकास परियोजनाओं के साथ-साथ कृषि भूमि संरक्षण और ग्रामीण आजीविका पर भी समान ध्यान देने की जरूरत है।
वैश्विक भुखमरी की चुनौती हमें यह याद दिलाती है कि खाद्य सुरक्षा केवल अनाज वितरण का प्रश्न नहीं, बल्कि कृषि, रोजगार, पर्यावरण और सामाजिक न्याय से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए यह चेतावनी समय रहते आत्मनिर्भर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अवसर भी है।
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उत्तराखंड में खाद्य सुरक्षा का आधार धीरे-धीरे स्थानीय कृषि के बजाय सरकारी राशन प्रणाली बनता जा रहा है। राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक खेती संकट के दौर से गुजर रही है। खेती की लागत बढ़ने, जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक, सिंचाई सुविधाओं की कमी और युवाओं के पलायन के कारण हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो चुकी है। कभी मंडुवा, झंगोरा, राजमा और अन्य पारंपरिक फसलों के लिए प्रसिद्ध गांव आज उत्पादन में लगातार पीछे होते जा रहे हैं।
सरकार खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सस्ता राशन उपलब्ध कराकर भूख की समस्या को नियंत्रित करने का दावा करती है, लेकिन यह व्यवस्था आत्मनिर्भर कृषि का विकल्प नहीं बन सकती। यदि स्थानीय उत्पादन घटता रहेगा और जनता केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर होती जाएगी, तो खाद्य सुरक्षा की जड़ें कमजोर पड़ेंगी।
सरकार की नीतियों पर इसलिए प्रश्नचिह्न उठते हैं कि कृषि पुनर्जीवन, सिंचाई विस्तार, कृषि विपणन और किसानों को प्रोत्साहन देने के क्षेत्र में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। पहाड़ की खेती को बचाने के लिए विशेष योजनाओं की आवश्यकता है, अन्यथा आने वाले समय में उत्तराखंड खाद्यान्न उत्पादन के बजाय पूरी तरह बाहरी आपूर्ति और सरकारी राशन पर निर्भर राज्य बन सकता है। यह स्थिति राज्य की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकती है।
