भारत में जेल का नाम सुनते ही लोगों के मन में अपराध, सजा और कठोर जीवन की तस्वीर उभरती है। अक्सर यह धारणा भी बन जाती है कि जिसने अपराध किया है, उसे किसी प्रकार की सुविधा क्यों मिले। लेकिन इस सोच से अलग एक संवैधानिक सच्चाई भी है—जेल में बंद व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता खोता है, इंसान होने का अधिकार नहीं। उसे सम्मानपूर्वक जीवन, स्वास्थ्य और पर्याप्त भोजन का अधिकार संविधान और कानून दोनों देते हैं।
हाल ही में तिहाड़ जेल में बंद अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैनडाइक की विशेष भोजन संबंधी मांग चर्चा का विषय बनी। उसने अपने लिए अलग भोजन और स्वयं खाना बनाने की अनुमति मांगी। उसकी मांग स्वीकार हो या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन इस बहस ने देश की जेलों में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता पर ध्यान अवश्य खींचा है।
तिहाड़ जेल का भोजन वैज्ञानिक मानकों के अनुसार तय होता है। वहां डाइटिशियन की सलाह पर भोजन तैयार किया जाता है। कैदियों को तय मात्रा में अनाज, दाल, हरी सब्जियां, तेल, नमक और अन्य पोषक तत्व दिए जाते हैं। सप्ताह में अंडा, दूध या सोया उत्पाद भी उपलब्ध कराए जाते हैं। भोजन में कैलोरी, प्रोटीन और पोषण का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि कैदी कुपोषण या गंभीर बीमारियों का शिकार न हों।
लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की सभी जेलों में यही व्यवस्था धरातल पर दिखाई देती है?
उत्तराखंड की जेलों की स्थिति पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हल्द्वानी जेल से रिहा हुए कई बंदियों ने भोजन की गुणवत्ता को लेकर गंभीर शिकायतें की हैं। उनका कहना है कि दाल इतनी पतली होती है कि उसमें दाल से अधिक पानी दिखाई देता है। कई लोगों का दावा है कि एक किलो दाल से दो दर्जन से अधिक लोगों का भोजन तैयार कर दिया जाता है। रोटियां भी कई बार गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं।
यह केवल स्वाद का प्रश्न नहीं है। यह स्वास्थ्य, पोषण और मानव गरिमा का विषय है।
जेल में हर कैदी आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होता। कुछ कैदियों के परिवार नियमित रूप से पैसे भेज देते हैं। ऐसे लोग जेल कैंटीन से अतिरिक्त खाद्य सामग्री खरीद लेते हैं। लेकिन अनेक कैदी ऐसे भी होते हैं जिनका परिवार उनसे संबंध तोड़ चुका होता है। कई वर्षों तक जेल में रहने वाले ऐसे बंदियों के पास अतिरिक्त भोजन खरीदने का कोई साधन नहीं होता। उनके लिए जेल का सामान्य भोजन ही जीवन का एकमात्र सहारा होता है।
ऐसी स्थिति में यदि वही भोजन गुणवत्ताहीन हो तो उसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन्हीं गरीब और असहाय कैदियों पर पड़ता है।
यह भी सच है कि जेलों में भोजन की आपूर्ति एक बड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया है। अनाज की खरीद, सब्जियों की आपूर्ति, रसोई संचालन और वितरण तक कई स्तरों पर व्यवस्था चलती है। जहां इतनी लंबी श्रृंखला होगी, वहां भ्रष्टाचार की संभावना भी बनी रहती है। यदि कहीं बीच में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता से समझौता होता है या मात्रा में कटौती होती है तो उसका सीधा असर कैदियों की थाली पर पड़ता है।
समय-समय पर जेलों में निरीक्षण होते हैं, लेकिन केवल औपचारिक निरीक्षण से स्थिति नहीं बदलती। आवश्यकता है कि भोजन की गुणवत्ता का नियमित और स्वतंत्र ऑडिट हो। पोषण विशेषज्ञ, चिकित्सक और न्यायिक अधिकारियों की संयुक्त निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। कैदियों की शिकायतों को गोपनीय तरीके से दर्ज करने और उनका समाधान करने की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए।
उत्तराखंड सरकार को इस विषय को केवल जेल प्रशासन का आंतरिक मामला मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। राज्य की प्रत्येक जेल में भोजन की गुणवत्ता, पोषण स्तर और स्वच्छता का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। भोजन पकाने के पानी से लेकर दाल, सब्जी, आटा और तेल की गुणवत्ता की नियमित जांच होनी चाहिए।
जेलों में सीसीटीवी निगरानी केवल सुरक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि रसोई और भोजन वितरण व्यवस्था पर भी प्रभावी निगरानी हो। खाद्यान्न की खरीद और उपयोग का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जाए ताकि पारदर्शिता बढ़े। यदि कहीं भी खाद्य सामग्री में गड़बड़ी मिले तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
यह भी आवश्यक है कि जेलों में स्थानीय कृषि और डेयरी उत्पादों का अधिक उपयोग किया जाए। इससे भोजन की गुणवत्ता बेहतर होगी और स्थानीय किसानों को भी लाभ मिलेगा। रसोई में स्वच्छता, पोषण और खाद्य सुरक्षा के मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार भी है। यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक ऐसा भोजन मिले जो उसके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए, तो यह सुधार नहीं बल्कि एक अतिरिक्त दंड बन जाता है। जेल से बाहर आने के बाद वही व्यक्ति समाज का हिस्सा बनता है। यदि वह शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होकर निकलेगा तो समाज पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा।
भारत का संविधान प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। यह अधिकार जेल की चारदीवारी के भीतर भी समाप्त नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय भी कई निर्णयों में स्पष्ट कर चुका है कि कैदियों के मौलिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते।
उत्तराखंड की जेलों में यदि वास्तव में भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें हैं तो सरकार को उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। केवल रिपोर्ट मांगने से काम नहीं चलेगा। वास्तविक स्थिति जानने के लिए औचक निरीक्षण, स्वतंत्र जांच और कैदियों से प्रत्यक्ष संवाद आवश्यक है।
समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। जेल में बंद व्यक्ति ने अपराध किया हो सकता है, लेकिन उसे भूख, बीमारी या कुपोषण की सजा नहीं दी जा सकती। कानून ने उसे जितनी सजा दी है, उससे अधिक सजा देने का अधिकार किसी को नहीं है।
एक सभ्य समाज की पहचान केवल उसके बड़े शहरों, आधुनिक सड़कों या ऊंची इमारतों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे उपेक्षित और सबसे असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जेल की थाली उसी पहचान का महत्वपूर्ण पैमाना है।
उत्तराखंड सरकार के लिए यह उचित समय है कि वह राज्य की सभी जेलों में भोजन व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराए, गुणवत्ता सुधार के लिए ठोस कदम उठाए और यह सुनिश्चित करे कि जेल की सजा, भूख और कुपोषण की सजा में न बदल जाए। क्योंकि अंततः जेल में बंद व्यक्ति भी एक इंसान है, और उसकी थाली में परोसा गया सम्मान ही किसी लोकतांत्रिक और संवेदनशील व्यवस्था की वास्तविक पहचान है।
जेल की थाली: क्या सजा का मतलब सम्मानजनक भोजन से वंचित करना है?उत्तराखंड की जेलों में कैदियों के खाने की गुणवत्ता पर कौन देगा जवाब?
