इस हाई-प्रोफाइल मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर गरमागरम सुनवाई देखने को मिली, जहां उद्धव गुट की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बेहद दमदार और तीखी दलीलें पेश कीं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
लोकतंत्र की मूल भावना और ‘संवैधानिक आत्महत्या’ पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे के वकील कपिल सिब्बल ने जोरदार तरीके से अपनी बात रखते हुए कहा कि लोकतंत्र की मूल भावना यही कहती है कि कोई भी जनप्रतीनिधि जिस राजनीतिक दल के नाम और चुनाव चिन्ह पर चुनकर सदन में पहुंचता है, उसे उसी पार्टी का वफादार रहकर उसका प्रतिनिधित्व करना चाहिए।
सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि कानून बिल्कुल साफ है, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह खेल लगातार देखा जा रहा है कि एक पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर आने के बाद नेता पाला बदलकर दूसरी तरफ चले जाते हैं। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘संवैधानिक आत्महत्या’ करार दिया और चेताया कि इस तरह के राजनीतिक खेल का सीधा और बुरा असर देश के लोकतंत्र पर पड़ता है।
31 विधायकों का जिक्र कर सिब्बल ने उठाए बड़े सवाल
साल 2022 में एकनाथ शिंदे ने तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था, जिसके चलते महाविकास आघाड़ी (MVA) की सरकार गिर गई थी और शिंदे ने बीजेपी के समर्थन से महाराष्ट्र के सीएम पद की शपथ ली थी। कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी दलील दी कि अगर इस मामले की सुनवाई समय रहते हो जाती, तो शायद आज हालात कुछ और होते और शिंदे मुख्यमंत्री नहीं बन पाते। उन्होंने अदालत से इस मामले में जल्द से जल्द फैसला सुनाने की पुरजोर अपील की।
सिब्बल ने सिर्फ 31 विधायकों का विशेष रूप से जिक्र करते हुए दो टूक कहा कि मुट्ठीभर विधायकों को पूरी राजनीतिक पार्टी नहीं माना जा सकता है। उन्होंने चर्चित ‘सुभाष देसाई’ केस का उदाहरण देते हुए साफ किया कि किसी भी लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायक दल) को सिर्फ इसलिए असली प्राइमरी पॉलिटिकल पार्टी नहीं माना जा सकता क्योंकि उनके पाले में विधायकों की संख्या ज्यादा है। इसके बावजूद एकनाथ शिंदे ने शिवसेना पार्टी के नाम और उसके चुनाव चिन्ह पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया।
चुनाव आयोग और स्पीकर के फैसलों पर खड़े किए गंभीर सवाल
कपिल सिब्बल ने केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) और महाराष्ट्र विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसलों पर भी बेहद गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने साल 2018 में पार्टी के बदले गए संविधान पर बिना किसी विचार-विमर्श के, सिर्फ और सिर्फ विधायकों की गिनती और संख्या के आधार पर शिंदे गुट को असली शिवसेना और ‘धनुष-बाण’ थमा दिया, जो कि पूरी तरह से गलत और नियमों के विरुद्ध था।
तीन सीजेआई बदले, पर अब तक नहीं आया फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह जानकारी दी कि इस बहुचर्चित मामले पर अब अगली सुनवाई आगामी 4 अगस्त को होगी। आपको बता दें कि उद्धव ठाकरे की पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर शुरू से ही हमलावर तेवर अपनाए हुए है। उनका मुख्य आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में फैसला आने में बहुत अधिक देरी हो रही है। फरवरी 2023 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट में तीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन इस मामले का अंतिम फैसला सामने नहीं आ सका है।
जब यह मामला सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, तब जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ देश के सीजेआई थे। उनके बाद जस्टिस संजीव खन्ना और फिर जस्टिस बी.आर. गवई इस पद पर रहे, और अब वर्तमान में जस्टिस सूर्यकांत देश के सीजेआई हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जस्टिस सूर्यकांत 9 फरवरी 2027 को अपने पद से सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
