यूकेडी की सियासत में आशीष नेगी का आक्रामक तेवर चर्चा में, सोशल मीडिया से आगे जमीनी संघर्ष की चुनौती

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रुद्रपुर। उत्तराखंड की राजनीति में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर क्षेत्रीय दलों की सक्रियता बढ़ने लगी है। इसी बीच उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के युवा नेता आशीष नेगी अपने आक्रामक और बेबाक राजनीतिक तेवरों के चलते चर्चा में हैं। सोशल मीडिया के साथ जमीनी मुद्दों को उठाने की उनकी शैली ने युवा वर्ग के बीच अलग पहचान बनाई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


आशीष नेगी को उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय बताया जाता है। उनके राजनीतिक अभियान में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, पलायन रोकने, स्थानीय युवाओं के रोजगार, पहाड़ी क्षेत्रों के अधिकार और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने आते रहे हैं। ‘पहाड़ी हल्ला बोल’ और ‘जय पहाड़-जय पहाड़ी’ जैसे नारों के माध्यम से वह सोशल मीडिया पर भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

द्वाराहाट-रानीखेत साल्ट से लेकर पूरे कुमाऊं में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की बढ़ती सक्रियता ने भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। हाल के दिनों में जनरुझान में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। ‘जय पहाड़-जय पहाड़ी’ जैसे नारों को लेकर सत्तापक्ष की ओर से उठाई गई आपत्तियों ने भी यूकेडी की चर्चा को और तेज किया है। अब निगाहें गढ़वाल पर भी हैं, जहां यूकेडी अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। यदि पहाड़ के स्थानीय मुद्दे, युवा नेतृत्व और संगठनात्मक सक्रियता एक साथ जनसमर्थन में बदलते हैं तो 2027 में यूकेडी के पक्ष में आश्चर्यजनक चुनावी परिणाम सामने आ सकते हैं।

हाल ही में (अगस्त 2026) भाजपा विधायक महेश जीना और UKD कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस का वीडियो ज़रूर वायरल हुआ है। लेकिन चुनावी तौर पर यह सीट भाजपा और कांग्रेस का गढ़ रही है। पिछले चुनाव में UKD को केवल 2.87% वोट मिले थे।


2027 में यूकेडी के सामने संगठन विस्तार की चुनौती
आगामी विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए अहम माने जा रहे हैं। ऐसे समय में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने क्षेत्रीय मुद्दों को व्यापक जनसमर्थन में बदलने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की है। राजनीतिक गतिविधियों के साथ मैदानी क्षेत्रों में संगठन विस्तार और कार्यकर्ताओं की सक्रियता को लेकर भी चर्चा तेज है।
इसी संदर्भ में हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की एक पूर्व सर्वे रिपोर्ट का उल्लेख सामने आया है, जिसमें यूकेडी के लिए 12 विधानसभा सीटों की संभावना का आकलन किए जाने का दावा किया गया। बाद में सोशल मीडिया पर इसी आकलन को 13 सीटों के आंकड़े के साथ प्रचारित किए जाने की बात कही गई है। इस संबंध में मूल रिपोर्ट और बाद में प्रसारित सामग्री के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
‘व्हाट्सऐप क्रांति’ से आगे बढ़ने की जरूरत
उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका के साथ यह बहस भी तेज हो रही है कि डिजिटल प्रचार को वास्तविक जमीनी संगठन में कैसे बदला जाए। यूकेडी के सामने भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के सांगठनिक ढांचे से मुकाबला करने की चुनौती है।
राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि चुनावी वर्ष में खोले जाने वाले कार्यालय, सोशल मीडिया अभियान और नारों के साथ गांव-कस्बों में नियमित जनसंपर्क कितना मजबूत किया जा रहा है। ऐसे माहौल में आशीष नेगी जैसे युवा नेताओं की सक्रियता यूकेडी के लिए एक उदाहरण के रूप में देखी जा रही है।
गांव-गांव पहुंच बनाना होगा
यूकेडी यदि 2027 में मजबूत क्षेत्रीय विकल्प के रूप में अपनी दावेदारी पेश करना चाहती है तो उसे सोशल मीडिया अभियान के साथ गांव, कस्बे और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक लगातार पहुंच बनानी होगी। स्थानीय मुद्दों को लेकर जनसंवाद, युवाओं की भागीदारी और बूथ स्तर पर मजबूत संगठन चुनावी राजनीति में उसकी वास्तविक ताकत तय कर सकते हैं।
आशीष नेगी की सक्रियता ने यूकेडी के युवा नेतृत्व और उसके संघर्षशील तेवर को चर्चा में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली राजनीतिक सक्रियता कितनी व्यापक जमीनी ताकत में बदलती है और 2027 के चुनाव में यूकेडी अपने दावों को कितनी सीटों में तब्दील कर पाती है।


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