उत्तर प्रदेश समेत देश के 5 राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक बार फिर अपने पारंपरिक और कोर वोट बैंक यानी सवर्ण समाज को साधने की कवायद तेज कर दी है।

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पार्टी के भीतर सवर्णों की कथित नाराजगी की खबरों के बीच पिछले एक सप्ताह के दौरान केंद्र सरकार ने बैक-टू-बैक दो बेहद अहम और रणनीतिक फैसले लिए हैं। इनमें से पहला फैसला जातिगत जनगणना (Caste Census) के स्वरूप से जुड़ा है, तो वहीं दूसरा फैसला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी नियमों से संबंधित है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


जंतर-मंतर पर सवर्ण समाज का प्रदर्शन, सरकार की नीतियों के खिलाफ जनआक्रोश की चेतावनी
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर सवर्ण समाज से जुड़े विभिन्न संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की कुछ नीतियों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि इनसे सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिल रहा है। आंदोलनकारियों ने सरकार से नीतियों पर पुनर्विचार करने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि देश के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ाने वाली नीतियां सामाजिक एकता के लिए चुनौती हैं। उन्होंने सरकार पर ‘फूट डालो और राज करो’ जैसी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता लोकतांत्रिक तरीके से इसका जवाब देगी।
आंदोलनकारियों ने कहा कि दिल्ली में सीमित संख्या में लोगों की मौजूदगी को समाज की सहमति के रूप में देखा जाना उचित नहीं है। उनका दावा है कि देशभर में बड़ी संख्या में लोग इन मुद्दों को लेकर चिंतित हैं।
प्रदर्शन के दौरान प्रशासन को चेतावनी दी गई कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज या दमनात्मक कार्रवाई की स्थिति में आंदोलन को देश के अन्य हिस्सों तक विस्तार दिया जाएगा। आयोजकों ने लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण विरोध की स्वतंत्रता का सम्मान करने की मांग की।

2 बड़े फैसलों की पूरी क्रोनोलॉजी समझिए

1. जातिगत जनगणना में उपजातियों का अलग वर्गीकरण नहीं: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए जनगणना के ड्राफ्ट में जातियों को अलग-अलग उपजातियों में नहीं बांटने का फैसला किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के जरिए सवर्ण समाज के भीतर किसी भी प्रकार के बिखराव को रोककर उनकी सामाजिक एकजुटता को बनाए रखने की कोशिश की गई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि उपजातियों की अलग गिनती न होने से समाज का सटीक और विस्तृत सामाजिक-आर्थिक डेटा सामने नहीं आ पाएगा। इससे पहले साल 2012 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में भी कुछ ऐसा ही तरीका अपनाया गया था, जिसमें करीब 47 लाख जातियां दर्ज हुई थीं।

2. यूजीसी इक्विटी नीति 2026 पर पुनर्विचार: दूसरा बड़ा कदम UGC इक्विटी नियम 2026 को लेकर उठाया गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि वह इस नीति पर पुनर्विचार कर रही है। दरअसल, सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों में इस नीति को लेकर लंबी नाराजगी देखी जा रही थी। उनका मानना था कि इन नए नियमों से उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के सामने प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। सरकार के इस रुख से सवर्णों की चिंताओं को शांत करने का स्पष्ट संदेश दिया गया है।

आखिर सवर्णों को क्यों साध रही है बीजेपी?

फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें से चार राज्यों में फिलहाल बीजेपी की सरकारें काम कर रही हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है, जहां बीजेपी हैट्रिक बनाकर लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लक्ष्य पर काम कर रही है। पार्टी की स्थापना के समय से ही सवर्ण समाज को बीजेपी का सबसे मजबूत कोर वोटर माना जाता रहा है। ऐसे में किसी भी चुनावी राज्य में सवर्णों की अनमनी मौजूदगी पार्टी के गणित को बिगाड़ सकती है।

यदि आप आगामी चुनावों के संबंध में आधिकारिक जानकारी, मतदाता सूची या चुनाव तिथियों का अपडेट प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर नवीनतम विवरण देख सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में कितना असरदार है सवर्ण वोट बैंक?

उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरणों में सवर्ण यानी सामान्य वर्ग की आबादी करीब 15 से 19 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इसमें सामाजिक ताने-बाने के हिसाब से अलग-अलग वर्गों की हिस्सेदारी इस प्रकार है:

  • ब्राह्मण समाज: लगभग 9 से 10 प्रतिशत
  • राजपूत (ठाकुर) समाज: लगभग 5 प्रतिशत
  • भूमिहार समाज: लगभग 2 प्रतिशत
  • वैश्य (बनिया) समाज: लगभग 2 प्रतिशत
  • कायस्थ व अन्य सवर्ण जातियां: शेष हिस्सेदारी

यूपी जैसे विशाल राज्य में करीब 19 प्रतिशत का यह संगठित वोट बैंक किसी भी राजनीतिक दल की जीत या हार तय करने की क्षमता रखता है।

बीजेपी के लिए क्यों बेहद अहम हैं आंकड़े?

CSDS-Lokniti के पोस्ट-पोल सर्वे के मुताबिक, साल 2024 के आम चुनावों में उत्तर प्रदेश के करीब 79 प्रतिशत सवर्ण मतदाताओं ने एनडीए (NDA) के पक्ष में मतदान किया था। इस चुनाव में बीजेपी गठबंधन को यूपी में जो सीटें मिली थीं, उनमें से लगभग आधे सांसद सवर्ण समाज से ही आते हैं। यह आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि सवर्ण न सिर्फ बीजेपी का वोट बैंक हैं, बल्कि पार्टी के सांगठनिक ढांचे और संसदीय प्रतिनिधित्व का भी मुख्य स्तंभ हैं।

यूपी की राजनीति में सवर्णों का ऐतिहासिक चुनावी पैटर्न

उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें आती हैं, जो देश के राजनीतिक केंद्र को तय करती हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो सवर्ण समाज हमेशा से एक मुश्त और अनुशासित वोटिंग पैटर्न के लिए जाना जाता रहा है:

  • 2007 विधानसभा चुनाव: बीएसपी ने दलित, मुस्लिम और ब्राह्मणों का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला बनाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
  • 2009 लोकसभा चुनाव: करीब 53 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं ने बीजेपी का समर्थन किया था।
  • 2012 विधानसभा चुनाव: सवर्ण वोटों में बड़ा फेरबदल हुआ और समाजवादी पार्टी को अप्रत्याशित सवर्ण समर्थन मिला (सर्वे अनुसार करीब 19% ब्राह्मण और 6% अतिरिक्त राजपूत वोट), जिससे सपा 224 सीटों के साथ सत्ता में आई।
  • 2014, 2017, 2019, 2022 और 2024: सवर्णों ने एक बार फिर बीजेपी के पक्ष में एकतरफा और भारी मतदान किया।

इतिहास गवाह है कि जब-जब सवर्ण वोट बैंक में थोड़ा सा भी बिखराव हुआ है, तब-तब यूपी का राजनीतिक नक्शा बदल गया है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी दंगल में उतरने से पहले बीजेपी अपने इस मजबूत आधार को किसी भी सूरत में छिटकने नहीं देना चाहती और हालिया दोनों फैसले इसी रणनीति की अहम कड़ी माने जा रहे हैं।

पार्टी के भीतर सवर्णों की कथित नाराजगी की खबरों के बीच पिछले एक सप्ताह के दौरान केंद्र सरकार ने बैक-टू-बैक दो बेहद अहम और रणनीतिक फैसले लिए हैं। इनमें से पहला फैसला जातिगत जनगणना (Caste Census) के स्वरूप से जुड़ा है, तो वहीं दूसरा फैसला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी नियमों से संबंधित है।

2 बड़े फैसलों की पूरी क्रोनोलॉजी समझिए

1. जातिगत जनगणना में उपजातियों का अलग वर्गीकरण नहीं: केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए जनगणना के ड्राफ्ट में जातियों को अलग-अलग उपजातियों में नहीं बांटने का फैसला किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के जरिए सवर्ण समाज के भीतर किसी भी प्रकार के बिखराव को रोककर उनकी सामाजिक एकजुटता को बनाए रखने की कोशिश की गई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि उपजातियों की अलग गिनती न होने से समाज का सटीक और विस्तृत सामाजिक-आर्थिक डेटा सामने नहीं आ पाएगा। इससे पहले साल 2012 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण में भी कुछ ऐसा ही तरीका अपनाया गया था, जिसमें करीब 47 लाख जातियां दर्ज हुई थीं।

2. यूजीसी इक्विटी नीति 2026 पर पुनर्विचार: दूसरा बड़ा कदम UGC इक्विटी नियम 2026 को लेकर उठाया गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए कहा कि वह इस नीति पर पुनर्विचार कर रही है। दरअसल, सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों में इस नीति को लेकर लंबी नाराजगी देखी जा रही थी। उनका मानना था कि इन नए नियमों से उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के सामने प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। सरकार के इस रुख से सवर्णों की चिंताओं को शांत करने का स्पष्ट संदेश दिया गया है।


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