हजारों कांग्रेसियों के सामने सैकड़ों भाजपाई! टकराव कहां था, ड्रामा किसलिए?

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रुद्रपुर। कांग्रेस के कलेक्ट्रेट घेराव कार्यक्रम के दौरान भारी पुलिस व्यवस्था को लेकर जिस तरह से राजनीतिक टकराव की आशंका का माहौल प्रस्तुत किया गया, उसने पूरे घटनाक्रम को एक अलग ही सवाल के सामने खड़ा कर दिया है। एक तरफ कलेक्ट्रेट परिसर में कांग्रेस के हजारों युवा कार्यकर्ता शांतिपूर्वक नारे लगाते हुए पहुंचे, दूसरी तरफ मेट्रोपोलिस क्षेत्र में भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच भारी पुलिस बल, बैरिकेडिंग और प्रशासनिक अमला दिखाई दिया। सवाल सीधा है—जब एक पक्ष की संख्या हजारों में और दूसरे पक्ष की संख्या सौ से भी कम थी, तो टकराव की वास्तविक संभावना आखिर थी कहां?
मेट्रोपोलिस गेट पर लगाए गए बैरिकेड और पुलिस व्यवस्था को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष की आशंका हो। पुलिस भाजपा कार्यकर्ताओं को बैरिकेड के पीछे रखने और कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रखने का प्रयास करती दिखाई दी। पूरा दृश्य किसी बड़े टकराव की तैयारी से अधिक राजनीतिक मंचन जैसा नजर आया।
कांग्रेस के हजारों युवा कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रहे थे। उनके हाथों में कांग्रेस के झंडे थे, वे नारे लगा रहे थे और अपने राजनीतिक विरोध को दर्ज करा रहे थे। कार्यक्रम का प्रमुख मुद्दा मनुस्मृति, सामाजिक भेदभाव, दलित अधिकार, छुआछूत तथा समानता से जुड़ा था। पूरे काफिले में युवा कार्यकर्ताओं की संख्या बड़ी थी, फिर भी माहौल शांतिपूर्ण रहा।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हजारों कार्यकर्ताओं के सामने सौ से भी कम भाजपा कार्यकर्ता खड़े होकर किस तरह का टकराव पैदा कर सकते थे? संख्या बल और मौके की परिस्थितियों को देखते हुए प्रत्यक्ष टकराव की संभावना बेहद कमजोर दिखाई देती थी। फिर भी पुलिस व्यवस्था को इस तरह प्रदर्शित किया गया, मानो दो राजनीतिक सेनाएं आमने-सामने खड़ी हों।
सरकार भी आपकी, पुलिस भी आपकी, फिर यह राजनीतिक पटकथा किसके लिए?
सबसे दिलचस्प दृश्य मेट्रोपोलिस गेट पर दिखाई दिया। भाजपा कार्यकर्ता एक तरफ मौजूद थे और पुलिस उन्हें बैरिकेड के भीतर रोकने का प्रयास कर रही थी। दूसरी तरफ कांग्रेस के कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट परिसर में अपने कार्यक्रम में व्यस्त थे।
यह पूरा दृश्य राजनीतिक नौटंकी की बहस को जन्म देता है। सरकार भाजपा की, मुख्यमंत्री भाजपा के, विधायक भाजपा के, महापौर भाजपा के और पुलिस प्रशासन भी राज्य सरकार के अधीन। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं और विपक्ष के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव रोकने के नाम पर इस स्तर की व्यवस्था आखिर किस राजनीतिक संदेश को जन्म दे रही थी?
एक तरफ भाजपा कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे—“गली-गली में शोर है, राहुल गांधी चोर है।” यहां भी राजनीतिक व्यंग्य की स्थिति पैदा हो गई। जब केंद्र से लेकर राज्य तक सत्ता भाजपा के हाथ में है, मुख्यमंत्री भाजपा के हैं, विधायक भाजपा के हैं और नगर निगम की सत्ता भी भाजपा के पास है, तब सवाल उठता है कि राहुल गांधी को चोर बताने वाले नारे सत्ता पक्ष की राजनीतिक जिम्मेदारियों से जुड़े सवालों को कितना प्रभावित कर सकते हैं?
असली सवाल: फायर ब्रिगेड कहां थी?
घटनाक्रम का एक और पहलू व्यवस्था के दोहरे स्वरूप को सामने लाता है।
कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ता कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन कर रहे थे। वहां इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद फायर ब्रिगेड की गाड़ी दिखाई नहीं दी। दूसरी ओर मेट्रोपोलिस क्षेत्र में जहां भाजपा के सौ से भी कम कार्यकर्ता पुतला दहन कर रहे थे, वहां प्रशासनिक अमला फायर ब्रिगेड की गाड़ी के साथ पूरी मुस्तैदी में मौजूद दिखाई दिया।
यह अंतर अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
क्या प्रशासन के लिए भीड़ का आकार मायने रखता है या राजनीतिक पहचान? हजारों लोगों वाले कार्यक्रम में आपातकालीन व्यवस्था का स्तर अलग और सौ से कम लोगों के कार्यक्रम में प्रशासनिक मौजूदगी का स्तर अलग क्यों दिखाई दिया?
कांग्रेस विपक्ष में थी, इसलिए उसकी टीआरपी वास्तविक थी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण अंतर राजनीतिक भूमिका का था। कांग्रेस विपक्ष में है। उसके नेता और कार्यकर्ता सरकार के सामने सवाल लेकर पहुंचे थे। मनुस्मृति के विरोध से लेकर दलित अधिकारों, सामाजिक समानता, छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जा रही थी।
कांग्रेस का प्रदर्शन मूलतः सरकार के सामने राजनीतिक और वैचारिक सवाल खड़े करने का कार्यक्रम था। हजारों युवा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने विपक्ष की राजनीतिक सक्रियता भी प्रदर्शित की।
दूसरी तरफ भाजपा कार्यकर्ताओं का कार्यक्रम सत्ता पक्ष के समर्थन में दिखाई दे रहा था। मनुस्मृति विवाद के बीच भाजपा कार्यकर्ता उन लोगों के समर्थन में खड़े दिखाई दिए जिनके कार्यक्रम और हवन को लेकर विवाद पैदा हुआ था। यहीं से यह बहस भी सामने आती है कि सत्ता पक्ष सामाजिक समानता के सवाल पर किस पक्ष के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है।
टकराव की कहानी से ज्यादा महत्वपूर्ण था राजनीतिक संदेश
मीडिया में जिस तरह “दोनों पार्टियों के बीच टकराव की आशंका” को प्रमुखता दी गई, उससे घटनाक्रम का वास्तविक राजनीतिक मुद्दा पीछे छूटता दिखाई दिया।
कांग्रेस के हजारों युवा कार्यकर्ता शांतिपूर्ण तरीके से कलेक्ट्रेट पहुंचे। भाजपा के सीमित संख्या वाले कार्यकर्ता मेट्रोपोलिस क्षेत्र में मौजूद रहे। पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग-अलग रखा। बैरिकेड लगाए गए। फायर ब्रिगेड तैनात हुई। कैमरे चमके। तस्वीरें बनीं और राजनीतिक संदेश भी तैयार हो गया।
मगर इस पूरे दृश्य का सबसे बड़ा सवाल यही है—जब टकराव की वास्तविक गुंजाइश बेहद कम थी, तो टकराव का इतना बड़ा माहौल क्यों बनाया गया?
सत्ता पक्ष के प्रभाव और प्रशासनिक तंत्र के बीच संबंधों को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जब राजनीतिक सत्ता के पास प्रशासनिक निर्णयों पर व्यापक प्रभाव होता है और पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों की तैनाती एवं स्थानांतरण तक राजनीतिक चर्चा का विषय बनते हैं, तब सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं को रोकने की तस्वीर अपने आप में सवाल पैदा करती है।
क्या पुलिस वास्तव में भाजपा कार्यकर्ताओं को कांग्रेस से टकराने से रोक रही थी या कैमरों के सामने एक राजनीतिक दृश्य तैयार किया जा रहा था?
कैमरे चमके, मगर असली मुद्दा पीछे रह गया
पूरे घटनाक्रम को अगर राजनीतिक कैमरे से देखा जाए तो तस्वीर बेहद स्पष्ट है। एक तरफ विपक्ष के हजारों युवा कार्यकर्ता सामाजिक न्याय और भेदभाव के मुद्दे पर सड़क पर थे। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के सीमित कार्यकर्ता विरोध के जवाब में मैदान में थे।
फिर भी चर्चा टकराव की होने लगी।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य है।
हजारों लोग सवाल पूछ रहे थे, सौ लोग जवाब देने के लिए खड़े थे और कैमरों के सामने पुलिस दोनों के बीच दीवार बनाकर खड़ी थी।
सरकार भाजपा की, मुख्यमंत्री भाजपा के, विधायक भाजपा के, महापौर भाजपा का और पुलिस प्रशासन सरकार के अधीन। ऐसे में राजनीतिक ड्रामे का मंच भी तैयार था और कैमरों के लिए दृश्य भी।
मगर लोकतंत्र में असली टीआरपी बैरिकेड, पुलिस बल और पुतले से तय नहीं होती। असली टीआरपी तब बनती है जब विपक्ष सत्ता से सवाल पूछता है और जनता उन सवालों को सुनती है।
रुद्रपुर के इस घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल टकराव का था ही नहीं। सबसे बड़ा सवाल था—सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक भूमिका का अंतर आखिर जनता के सामने कितना साफ दिखाई दिया?
और शायद यही सवाल उस पूरे राजनीतिक ड्रामे से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।


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