संपादकीय:उत्तराखंड में राहुल गांधी: युवाओं के दिलों को छूता संवाद या बदलती राजनीति की नई शुरुआत?—

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एक संपादकीय,उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से परंपरागत मुद्दों और स्थापित चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ के विकास जैसे विषय चुनावी मंचों पर बार-बार उठे, मगर युवाओं को अक्सर लगा कि उनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक पूरी ताकत से नहीं पहुंच रही है। ऐसे माहौल में राहुल गांधी का उत्तराखंड दौरा कई मायनों में चर्चा का विषय बन गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


राहुल गांधी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने अपने संबोधन में केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहने के बजाय युवाओं से सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। सभा में मौजूद अनेक छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा और कॉलेजों से जुड़े प्रतिभागी रोजगार, शिक्षा और भविष्य को लेकर अपनी चिंताएं साझा करते दिखाई दिए। इससे कार्यक्रम का स्वर केवल राजनीतिक सभा का न रहकर संवाद का रूप लेता नजर आया।
राहुल गांधी का शैक्षणिक सफर भी अक्सर चर्चा में रहता है। नई दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल और देहरादून के प्रतिष्ठित द दून स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज में अध्ययन किया। बाद में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन किया, रॉलिन्स कॉलेज से स्नातक और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज़ में एम.फिल. की डिग्री प्राप्त की। उनकी यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि कई युवाओं को इसलिए भी आकर्षित करती है क्योंकि वे शिक्षा, वैश्विक अनुभव और लोकतांत्रिक विमर्श पर खुलकर बात करते हैं।
उत्तराखंड में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया। सोशल मीडिया पर भी कार्यक्रम की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से साझा किए गए। कई लोगों ने इसे कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत माना, जबकि कई लोगों ने इसे एक सफल जनसंपर्क अभियान बताया।
उधर भारतीय जनता पार्टी ने भी समानांतर कार्यक्रम आयोजित किए। भाजपा का कहना है कि उसके कार्यक्रम संगठन की नियमित गतिविधियों का हिस्सा थे और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए आयोजित किए गए। दूसरी ओर कांग्रेस समर्थकों ने दावा किया कि राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर युवाओं में अधिक उत्साह देखने को मिला। लोकतंत्र में दोनों दलों को अपनी बात जनता के सामने रखने का पूरा अधिकार है और अंतिम निर्णय हमेशा मतदाता ही करते हैं।
आज का युवा केवल भाषण सुनने नहीं आता, वह सवाल पूछता है। उसे रोजगार चाहिए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया चाहिए और ऐसा उत्तराखंड चाहिए जहां पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार मिल सके। यदि कोई नेता इन सवालों को गंभीरता से सुनता है तो स्वाभाविक रूप से युवाओं का ध्यान उसकी ओर जाता है।
उत्तराखंड लंबे समय से पलायन की चुनौती झेल रहा है। पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया को लेकर चिंता जताते हैं और निजी क्षेत्र में अवसर सीमित हैं। ऐसे मुद्दे किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी परीक्षा हैं। राहुल गांधी ने इन्हीं विषयों पर बात करने का प्रयास किया, जबकि भाजपा अपनी सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती रही। जनता दोनों पक्षों को सुन रही है।
राजनीति में लोकप्रियता स्थायी नहीं होती। हर दल को जनता का विश्वास लगातार अर्जित करना पड़ता है। किसी एक सभा की भीड़ चुनाव परिणाम तय नहीं करती, मगर यह अवश्य संकेत देती है कि समाज किन मुद्दों पर चर्चा चाहता है। यदि युवाओं की भागीदारी बढ़ रही है तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है।
उत्तराखंड की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है जहां केवल नारों से काम चलने वाला नहीं है। युवाओं को ठोस नीतियां, रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, पारदर्शी प्रशासन और भविष्य की स्पष्ट दिशा चाहिए। जो भी दल इन अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा, वही आने वाले समय में जनता का विश्वास जीत सकेगा।
राहुल गांधी का यह दौरा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए ऊर्जा का स्रोत बना या भाजपा के लिए नई चुनौती, इसका अंतिम उत्तर भविष्य की राजनीति और चुनावी परिणाम देंगे। मगर इतना स्पष्ट है कि उत्तराखंड का युवा अब केवल दर्शक बनकर राजनीति देखने के बजाय स्वयं अपनी आवाज़ बुलंद करना चाहता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
यदि चाहें, मैं इसे हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की


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