पोस्टर वाली गाय और विकास की बछिया: रुद्रपुर एवं उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य

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रुद्रपुर। राजनीति में पोस्टर बहुत कुछ दिखाते हैं और जमीन की हकीकत बहुत कुछ सिखाती है। रुद्रपुर में सामने आया एक वीडियो आज की उत्तराखंड की राजनीति पर ऐसा व्यंग्य करता दिखाई देता है, जिसे शब्दों में समझाने की जरूरत शायद ही पड़े।
एक वाहन के पीछे उत्कृष्ट नस्ल की गाय का बड़ा पोस्टर लगा है। पोस्टर में गाय के बड़े-बड़े थन दिखाई दे रहे हैं, मानो वह भरपूर दूध देने वाली हो। वाहन कुछ देर के लिए रुका तो करीब पांच-छह महीने की एक बछिया उस पोस्टर के पीछे पहुंचती है। बछिया वाहन के पिछले हिस्से पर पैर रखकर पोस्टर में दिखाई दे रहे थनों तक मुंह पहुंचाने की कोशिश करती है। वह बार-बार प्रयास करती है। उसे क्या मालूम कि सामने दिखाई दे रही गाय वास्तविक गाय नहीं, केवल एक पोस्टर है।
दृश्य कुछ देर बाद समाप्त हो जाता है। बछिया चली जाती है। उसे दूध नहीं मिलता।
यही दृश्य आज उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक रूपक बन गया है।
पोस्टर पर गाय है, सामने बछिया है और बछिया को भरोसा है कि गाय दूध देगी। उत्तराखंड में पोस्टरों पर विकास है और जनता जमीन पर विकास की प्रतीक्षा कर रही है।
सवाल यह है कि क्या केवल पोस्टर से विकास हो सकता है?
उत्तराखंड की सड़कों से लेकर रोडवेज बसों तक, बस अड्डों से लेकर ढाबों तक, नगर निगम, नगर पालिका, ग्राम सभाओं, हाईवे, बाजार, गली-मोहल्ले और नुक्कड़ तक सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों के पोस्टर दिखाई देते हैं। लखपति दीदी से लेकर विभिन्न सरकारी योजनाओं तक उपलब्धियों की लंबी सूची पोस्टरों पर दिखाई देती है।
पोस्टर देखकर जनता को लगता है कि विकास की गाय सामने खड़ी है। राजनीतिक कार्यकर्ता नारे लगाते हैं, झंडे उठाते हैं, बैनर लगाते हैं और सरकार तथा जनप्रतिनिधियों के समर्थन में भीड़ जुटाते हैं।
मगर जब जनता अपने घर, रोजगार, सड़क, नाली, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजी-रोटी की तरफ देखती है तो सवाल वही रहता है—
दूध आखिर आएगा कहां से?
पोस्टर की गाय से दूध की उम्मीद करने वाली बछिया की तरह जनता भी लंबे समय तक राजनीतिक पोस्टरों को देखकर उम्मीद करती रही। अब धीरे-धीरे सवाल बढ़ रहे हैं कि पोस्टर में दिखाई देने वाला विकास जमीन पर कहां है?
रुद्रपुर में बुलडोजर बनाम पोस्टर का विकास
रुद्रपुर में स्मार्ट सिटी और विकास के नाम पर सड़क किनारे रोजगार करने वाले ठेली-पटरी वालों, छोटे दुकानदारों, मजदूरों और गरीब परिवारों के सामने उजड़ने का संकट खड़ा हुआ। जिन लोगों ने वर्षों तक छोटी-छोटी दुकानों और ठेलियों से अपने परिवार चलाए, उनके लिए विकास का अर्थ रोजी-रोटी बचाना है।
एक तरफ पोस्टर में विकास की चमक दिखाई देती है, दूसरी तरफ सड़क किनारे मेहनत करके परिवार पालने वाले लोगों के सामने बुलडोजर खड़ा दिखाई देता है।
यहीं से पोस्टर और वास्तविकता का अंतर साफ दिखाई देता है।
जिन गरीबों, दलितों, श्रमिकों, जनजातीय समाज और स्थानीय लोगों से चुनाव के समय झंडे लगवाए गए, बैनर लगवाए गए, भीड़ जुटाई गई और राजनीतिक नारों से माहौल बनाया गया, वही लोग जब अपने रोजगार और जमीन की सुरक्षा का सवाल पूछते हैं तो उन्हें विकास की बड़ी-बड़ी तस्वीरें दिखा दी जाती हैं।
राजनीति की बछिया को भी अब समझना होगा कि पोस्टर की गाय दूध नहीं देती।
आईएसबीटी की जमीन और रुद्रपुर का सवाल
रुद्रपुर रोडवेज से लगी जमीन और प्रस्तावित आईएसबीटी को लेकर भी जनता के बीच लगातार सवाल उठते रहे हैं। यदि आईएसबीटी का सपना दिखाया गया है तो जनता यह जानना चाहती है कि वह सपना जमीन पर कब दिखाई देगा? जिस जमीन को सार्वजनिक सुविधा और परिवहन व्यवस्था से जोड़कर देखा गया, वहां वास्तविक निर्माण और जनहित का परिणाम जनता के सामने कब आएगा?
जनता के मन में उठ रहे इन सवालों का जवाब पोस्टर से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले काम से मिलेगा।
यही लोकतंत्र की कसौटी है।
2027 से पहले पोस्टर की गाय का हिसाब
2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे में पोस्टर और नारों की राजनीति एक बार फिर तेज होगी। विकास की तस्वीरें लगेंगी, उपलब्धियों के बैनर दिखाई देंगे, योजनाओं के उद्घाटन और घोषणाओं की चर्चा होगी।
मगर इस बार उत्तराखंड की जनता से एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—
क्या आप पोस्टर देखेंगे या जमीन पर काम देखेंगे?
जो लोग आज भी पोस्टर की गाय के सामने खड़े होकर दूध की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे प्रतीक्षा करते रहें। जो लोग जागरूक हो चुके हैं, वे पोस्टर से बाहर निकलकर अपने क्षेत्र की सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, जमीन और स्थानीय व्यापार की स्थिति देखेंगे।
किसी को राजनीतिक रूप से “अंधभक्त” कहना आसान है। असली सवाल यह है कि नागरिक कब पोस्टर और वास्तविकता के बीच अंतर करना शुरू करता है।
यह वीडियो किसी राजनीतिक भाषण से अधिक प्रभावशाली इसलिए है क्योंकि इसमें कोई नेता बोलता हुआ दिखाई नहीं देता। एक मासूम बछिया दिखाई देती है, एक पोस्टर पर बनी गाय दिखाई देती है और विकास की राजनीति का पूरा दर्शन सामने आ जाता है।
बछिया को मालूम नहीं था कि वह पोस्टर है।
जनता को भी लंबे समय तक मालूम नहीं था कि कई वादे सिर्फ पोस्टर हैं।
अब फर्क इतना है कि बछिया कुछ देर बाद वहां से चली गई।
उत्तराखंड की जनता को 2027 में तय करना है कि वह पोस्टर के नीचे खड़ी रहेगी या पोस्टर के पीछे की वास्तविकता तलाशेगी।
क्योंकि लोकतंत्र में पोस्टर वोट मांग सकता है,
दूध नहीं दे सकता।
और विकास की असली पहचान बैनर, नारा और फोटो नहीं—
सड़क पर चलता रोजगार, घर में आती सुविधा और जमीन पर दिखाई देता काम है।


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