सत्ता के संरक्षण में कैंची धाम का कारोबार?
नदी पर कब्जे से ट्रैफिक व्यवस्था तक—कैंची धाम की भीड़ ने खड़े किए कई गंभीर सवाल
संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
कैंची धाम आस्था का केंद्र है। नीम करौली बाबा की तपस्थली होने के कारण देश-दुनिया से श्रद्धालु यहां आते हैं। श्रद्धा का यह प्रवाह उत्तराखंड के लिए धार्मिक पर्यटन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा अवसर बन सकता है। लेकिन सवाल यह है कि जब आस्था लाखों कदमों को पहाड़ की ओर खींच रही है, तब क्या सरकार उस भीड़ के साथ चलने वाली अर्थव्यवस्था, यातायात, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों के बारे में भी उतनी ही गंभीर है?
कैंची धाम की भारी भीड़ का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच कुछ लोग रास्ता बनाकर मंदिर की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर इसे लेकर भीड़ प्रबंधन और मंदिर व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। यह भी संभव है कि भीड़ के दबाव में ऐसी स्थिति बनी हो, इसलिए किसी व्यक्ति को जानबूझकर व्यवस्था तोड़ने का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन इस दृश्य ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—जब किसी धार्मिक स्थल पर भीड़ इतनी बढ़ जाए कि रास्ते ही दबाव में आ जाएं, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
यह सवाल केवल कैंची धाम की व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध पूरे कुमाऊं की अर्थव्यवस्था से है।
हल्द्वानी पहाड़ और मैदान के बीच एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रवेश द्वार है। पहाड़ से सब्जियां, फल, दुग्ध उत्पाद और दूसरे स्थानीय उत्पाद हल्द्वानी तथा मैदानी बाजारों तक आते हैं। हल्द्वानी से राशन, निर्माण सामग्री, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरत का सामान पहाड़ों तक पहुंचता है। नौकरीपेशा लोग रोजाना आवागमन करते हैं। विद्यार्थी स्कूल-कॉलेज और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आते-जाते हैं। टैक्सी संचालकों की रोजी-रोटी इस पूरे यातायात तंत्र से जुड़ी है।
दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने-जाने वाले लोगों के लिए भी यही मार्ग महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के नाम पर सड़कें लगातार जाम रहने लगें, तो इसका सबसे पहला असर किस पर पड़ेगा? किसी बड़े होटल मालिक पर नहीं, किसी प्रभावशाली कारोबारी पर नहीं—सबसे पहले उस स्थानीय नागरिक पर पड़ेगा जो अपनी नौकरी, दुकान, खेत, स्कूल या अस्पताल तक पहुंचने के लिए इसी सड़क पर निर्भर है।
यही वह बिंदु है जहां सरकार को विकास और अव्यवस्था के बीच फर्क करना होगा।
कैंची धाम में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को रोकना समाधान नहीं है। समाधान है—वैज्ञानिक यातायात प्रबंधन।
जब मेले या विशेष अवसरों पर जिला प्रशासन शटल सेवा चलाकर, पार्किंग व्यवस्था बनाकर और यातायात को नियंत्रित करके व्यवस्था संभाल सकता है, तो सामान्य दिनों में उसी मॉडल को स्थायी रूप क्यों नहीं दिया जा सकता?
रुद्रपुर या हल्द्वानी जैसे बड़े प्रवेश बिंदुओं पर विशाल पार्किंग बनाई जा सकती है। बाहर से आने वाले वाहनों को वहीं रोका जाए। वहां से निर्धारित संख्या में शटल बसें और अधिकृत टैक्सियां कैंची धाम तक जाएं। इससे कैंची धाम के आसपास वाहनों का दबाव कम होगा, स्थानीय लोगों का आवागमन सुचारु रहेगा और श्रद्धालुओं को भी बेहतर सुविधा मिलेगी।
यह कोई असंभव योजना नहीं है। सरकार बड़े-बड़े रोपवे बनाने के सपने दिखा सकती है तो एक सुव्यवस्थित पार्किंग और शटल ट्रांसपोर्ट सिस्टम क्यों नहीं बना सकती?
सवाल यहां से और गंभीर हो जाता है।
स्थानीय लोगों में यह चर्चा लगातार उठती रही है कि कैंची धाम और उसके आसपास पर्यटन कारोबार के विस्तार का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है? क्या स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिल रही है? क्या स्थानीय दुकानदार, टैक्सी चालक, होटल संचालक और छोटे कारोबारी इस बढ़ते धार्मिक पर्यटन से समान रूप से लाभान्वित हो रहे हैं?
यदि किसी क्षेत्र में बाहर से आने वाले बड़े कारोबारी मजबूत होते जाएं और स्थानीय व्यक्ति केवल सड़क पर बढ़ती भीड़, महंगाई, जाम और पर्यावरणीय दबाव का सामना करे, तो सरकार को इस मॉडल की समीक्षा करनी ही होगी।
नदी और उसके आसपास हुए कथित निर्माणों को लेकर भी गंभीर सवाल उठने चाहिए। यदि कहीं नदी की धारा, नदी क्षेत्र या सरकारी भूमि पर नियमों के विपरीत निर्माण हुए हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसकी जमीन है, किसके नाम पर है, निर्माण की अनुमति किसने दी, नक्शा किसने पास किया और पर्यावरणीय नियमों का पालन हुआ या नहीं—इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
यदि जांच में अवैध निर्माण सामने आते हैं तो कार्रवाई केवल छोटे दुकानदार तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जिस अधिकारी ने अनुमति दी, जिस व्यवस्था ने आंखें बंद कीं और जिस प्रभावशाली व्यक्ति ने नियमों को दरकिनार किया—जवाबदेही वहां तक पहुंचनी चाहिए।
यही असली सुशासन है।
दुर्भाग्य यह है कि उत्तराखंड में पर्यटन और धार्मिक आस्था के नाम पर अक्सर मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। मंचों से जय श्रीराम के नारे लगाना आसान है, धार्मिक पर्यटन की उपलब्धियां गिनाना आसान है, करोड़ों की योजनाओं की घोषणा करना आसान है। कठिन काम है—स्थानीय नागरिक की सड़क बचाना, नदी बचाना, जंगल बचाना और स्थानीय व्यक्ति के रोजगार को सुरक्षित रखना।
धर्म आस्था है, व्यापार का लाइसेंस नहीं।
कैंची धाम को विकसित किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा विकास स्थानीय लोगों की कीमत पर नहीं हो सकता। उत्तराखंड की सड़कों पर चलने वाले पहाड़ी किसान, कर्मचारी, विद्यार्थी, मरीज और टैक्सी चालक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना देश के किसी कोने से आने वाला श्रद्धालु।
सरकार को यह भी देखना होगा कि कहीं धार्मिक पर्यटन की आड़ में उत्तराखंड की भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी पूंजी का असंतुलित कब्जा तो नहीं बढ़ रहा। बाहरी निवेश अपने आप में अपराध नहीं है। रोजगार और निवेश का स्वागत होना चाहिए। लेकिन भूमि कानून, नदी क्षेत्र, पर्यावरणीय नियम और स्थानीय अधिकारों से समझौता करके कोई भी कारोबार स्वीकार्य नहीं हो सकता।
और यदि किसी कारोबारी का संबंध सत्ता या प्रशासन के प्रभावशाली लोगों से है तो जांच और भी पारदर्शी होनी चाहिए।
कैंची धाम की आस्था को राजनीति का हथियार बनाने की बजाय सरकार को प्रशासनिक क्षमता का उदाहरण पेश करना चाहिए। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और जिला प्रशासन यदि बेहतर यातायात मॉडल लागू करते हैं तो सरकार को उन्हें पूरा सहयोग देना चाहिए। नेताओं का काम केवल उद्घाटन, बयान और नारे लगाना नहीं है। उनका काम ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें श्रद्धालु भी सुरक्षित रहें और स्थानीय नागरिक भी परेशान न हो।
कैंची धाम के नाम पर उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को जाम में नहीं बदला जा सकता।
सरकार यदि वास्तव में उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनाना चाहती है तो उसे पर्यटन नीति के साथ स्थानीय अधिकार नीति भी बनानी होगी। पार्किंग, शटल सेवा, स्थानीय टैक्सी को प्राथमिकता, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार, नदी क्षेत्र की निगरानी, अवैध निर्माणों की जांच और भीड़ की वैज्ञानिक क्षमता तय करना—ये सभी एक ही नीति का हिस्सा होने चाहिए।
वरना स्थिति यह होगी कि श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जाएगी, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते रहेंगे, नेता उपलब्धियां गिनाते रहेंगे और स्थानीय नागरिक जाम में फंसा अपने घर, दुकान या नौकरी तक पहुंचने के लिए घंटों परेशान होता रहेगा।
फिर सवाल उठेगा—कैंची धाम किसके लिए विकसित हो रहा है? श्रद्धालुओं के लिए, स्थानीय जनता के लिए या उन कारोबारियों के लिए जिन्हें बढ़ती भीड़ में अपना बाजार दिखाई दे रहा है?
धामी सरकार को इस सवाल से बचने की जरूरत नहीं है। उसे सामने आकर जवाब देना चाहिए।
कैंची धाम की आस्था बचाइए, स्थानीय लोगों का रास्ता बचाइए, नदी बचाइए और उत्तराखंड की जमीन भी बचाइए।
क्योंकि उत्तराखंड केवल पर्यटकों के लिए बना कोई पर्यटन कॉरिडोर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था के साथ-साथ यहां रहने वाले लाखों स्थानीय परिवारों का घर है।
और अगर व्यवस्था ऐसी ही चलती रही कि श्रद्धालु भी परेशान हों और स्थानीय जनता भी, तो वह विकास नहीं—व्यवस्था की विफलता का उत्सव कहलाएगा।
अब फैसला सरकार को करना है—
कैंची धाम को आस्था का आदर्श केंद्र बनाना है या अव्यवस्थित पर्यटन और प्रभावशाली कारोबार का नया मॉडल?
सत्ता के संरक्षण में कैंची धाम का कारोबार?नदी पर कब्जे से ट्रैफिक व्यवस्था तक—कैंची धाम की भीड़ ने खड़े किए कई गंभीर सवालसंपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट
