उत्तराखंड में 39,815 परिवारों को पक्की छत, लेकिन बड़ा सवाल—अपने गांव के बेघर कहां? मोदी-धामी सरकार के आवासीय दावों की हो निष्पक्ष पड़ताल

उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से आए परिवारों को लाभ मिलने के आरोपों पर उठे सवाल; मुस्लिम लाभार्थियों की संख्या को लेकर भी पारदर्शी आंकड़ों की मांग, मूल निवासियों के हक की जांच जरूरी

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड

रुद्रपुर। उत्तराखंड के गांवों में गरीब और बेघर परिवारों को पक्की छत उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत 39,815 परिवारों को लाभान्वित किए जाने का दावा सामने आया है। वर्ष 2022 से अब तक की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत इन आंकड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या इस योजना का लाभ राज्य के उन मूल निवासियों तक समान रूप से पहुंचा है, जो आज भी कच्चे मकानों, जर्जर छतों और सीमित आर्थिक संसाधनों के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली उत्तराखंड सरकार गरीबों को पक्का मकान उपलब्ध कराने को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती रही हैं। लेकिन किसी भी सरकारी योजना की वास्तविक सफलता केवल लाभार्थियों की कुल संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होनी चाहिए कि सबसे जरूरतमंद परिवारों तक उसका लाभ पहुंचा या नहीं।

स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि उत्तराखंड में रहने वाले पात्र परिवारों को प्राथमिकता के साथ आवास मिला या नहीं। कुछ लोगों की ओर से यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से आकर बसे परिवारों को आवासीय योजनाओं का लाभ मिला, जबकि स्थानीय गरीब परिवार अब भी इंतजार कर रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक लाभार्थी सूची और पात्रता संबंधी अभिलेखों की जांच जरूरी है।

39,815 आवासों का दावा, जिलेवार आंकड़े क्या बताते हैं?

योजना से संबंधित उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ऊधमसिंह नगर जिले में सर्वाधिक 4,882 आवास बनाए जाने का उल्लेख है। हरिद्वार में 4,493 और रुद्रप्रयाग में 4,032 परिवारों को पक्की छत मिलने की जानकारी दी गई है।

अन्य जिलों के लिए जारी आंकड़ों में चमोली में 3,900, पिथौरागढ़ में 3,386, पौड़ी में 3,195, उत्तरकाशी में 3,057, देहरादून में 2,839, चंपावत में 2,789, बागेश्वर में 2,279, टिहरी में 2,134, नैनीताल में 1,480 और अल्मोड़ा में 1,349 आवासों का उल्लेख है।

ये आंकड़े योजना के विस्तार की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इनके आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किस जिले में मूल निवासी कितने लाभार्थी हैं, कितने परिवार दूसरे राज्यों से आकर बसे हैं और कितने आवास वास्तव में सबसे गरीब परिवारों को मिले हैं। इसके लिए जिलेवार आंकड़ों के साथ लाभार्थियों की सामाजिक, आर्थिक और निवास संबंधी पात्रता का सत्यापन आवश्यक है।

ऊधमसिंह नगर में उठ रहे सवाल, स्थानीय गरीबों का क्या होगा?

ऊधमसिंह नगर जिला औद्योगिक गतिविधियों, कृषि और विभिन्न राज्यों से आकर बसे लोगों की आबादी के कारण विशेष महत्व रखता है। रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, बाजपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे परिवार मिलते हैं, जिनके सामने आवास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियां हैं।

ऐसे में जिले में 4,882 आवासों का दावा सामने आने पर यह जानना जरूरी है कि कितने लाभार्थी लंबे समय से यहां निवास कर रहे पात्र परिवार हैं, कितने परिवारों के पास पहले से पक्का मकान था और कितने परिवार वास्तव में बेघर अथवा जर्जर मकानों में रहने की स्थिति में थे।

यदि किसी पात्र परिवार को योजना के मानकों के अनुरूप लाभ मिला है, तो केवल दूसरे राज्य से संबंध रखने के कारण उसे गलत ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि किसी अपात्र व्यक्ति को गलत दस्तावेजों, प्रभाव या मिलीभगत के आधार पर लाभ दिया गया है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। इसी तरह यदि किसी पात्र स्थानीय परिवार को अनदेखा किया गया है, तो जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए।

मुस्लिम लाभार्थियों की संख्या पर भी पारदर्शिता जरूरी

योजना के लाभार्थियों में मुस्लिम परिवारों की संख्या को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इस विषय में अनुमान, राजनीतिक आरोप या समुदाय विशेष के बारे में सामान्यीकृत दावों के बजाय सरकारी रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।

प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि जिलेवार कितने मुस्लिम, हिंदू और अन्य समुदायों के पात्र परिवारों को आवास स्वीकृत हुए, कितने मकान पूरे हो चुके हैं और कितने आवेदन लंबित हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी समुदायों के पात्र परिवारों को समान नियमों के तहत लाभ मिले।

किसी गरीब परिवार को उसकी धार्मिक पहचान के कारण लाभ से वंचित करना गलत होगा, उसी तरह किसी भी समुदाय के अपात्र व्यक्ति को सरकारी धन का लाभ मिलना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता। असली कसौटी पात्रता, पारदर्शिता और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचना है।

प्रधानमंत्री आवास योजना में क्या-क्या सहायता मिलती है?

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण वर्ष 2016 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य पात्र बेघर परिवारों और कच्चे अथवा जर्जर मकानों में रहने वाले परिवारों को बुनियादी सुविधाओं से युक्त पक्का घर उपलब्ध कराना है।

उत्तराखंड से संबंधित उपलब्ध विवरण में प्रति आवास 1.30 लाख रुपये की सहायता का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त शौचालय निर्माण के लिए 12 हजार रुपये की सहायता, निर्धारित प्रावधानों के तहत मजदूरी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है। वर्ष 2022-23 से रसोई सामग्री के लिए अतिरिक्त सहायता पांच हजार रुपये से बढ़ाकर छह हजार रुपये किए जाने का भी उल्लेख है।

हालांकि, इन सभी लाभों की वास्तविक उपलब्धता संबंधित स्वीकृति, पात्रता और योजना के लागू नियमों पर निर्भर करती है। इसलिए प्रशासन को केवल स्वीकृत मकानों की संख्या नहीं, बल्कि पूरी हो चुकी इकाइयों, भुगतान और वास्तविक लाभार्थियों का विवरण भी सार्वजनिक करना चाहिए।

मुख्यमंत्री धामी और प्रधानमंत्री मोदी से सीधे सवाल

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार पात्र परिवारों को आवास उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार के समक्ष पैरवी करने की बात कहते रहे