उत्तराखंड में रिकॉर्ड टूटने की खबरें खूब बन रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य बनने के मूल उद्देश्य भी पूरे हुए? 25 वर्षों के करीब पहुंच चुके उत्तराखंड में पलायन, बेरोजगारी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं, बंद होते स्कूल, खेती का संकट और पहाड़ों का खाली होना आज भी बड़ी चुनौतियां हैं। मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल के रिकॉर्ड अपनी जगह हैं, लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या विकास के भी उतने ही मजबूत रिकॉर्ड बने? राज्य आंदोलन के दौरान जिन सपनों के साथ उत्तराखंड बना था, वे आज भी अधूरे दिखाई देते हैं। यदि रिकॉर्ड ही बनाने हैं तो रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन रोकने के क्षेत्र में बनें, तभी उत्तराखंड की जनता इसे वास्तविक उपलब्धि मानेगी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
रिकॉर्डों की राजनीति के बीच उत्तराखंड के मूल मुद्दे फिर चर्चा में,उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के लंबे कार्यकाल के संभावित रिकॉर्ड चर्चा में हैं। भाजपा इसे स्थिर नेतृत्व और सुशासन की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन इस बीच राज्य के मूल मुद्दों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
राज्य गठन के समय रोजगार, पलायन रोकने, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और पर्वतीय क्षेत्रों के संतुलित विकास का सपना दिखाया गया था। करीब ढाई दशक बाद भी बड़ी संख्या में गांव खाली हो रहे हैं, युवाओं के सामने रोजगार का संकट बना हुआ है और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं की कमी महसूस की जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी पद पर लंबे समय तक बने रहना अपने आप में उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनता का अंतिम मूल्यांकन विकास के आधार पर होता है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि नेताओं के कार्यकाल के रिकॉर्ड से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उत्तराखंड के आम लोगों की समस्याओं का कितना समाधान हुआ।
ऐसे में रिकॉर्ड बनाने की चर्चाओं के बीच एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि उत्तराखंड को अब राजनीतिक उपलब्धियों से आगे बढ़कर जनहित के मुद्दों पर ठोस परिणाम दिखाने की जरूरत है।
