राजा रूद्रदेव चंद और खस समाज : जनेऊ से सामाजिक समावेशन तक की भूली हुई कहानी

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संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स

कुमाऊं के इतिहास में राजाओं, युद्धों, राजवंशों और सत्ता परिवर्तन की अनेक कहानियां मिलती हैं, लेकिन सामाजिक संरचना को बदलने के प्रयासों की चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। इतिहास के इसी कम चर्चित अध्याय में राजा रूद्रदेव चंद का नाम सामने आता है। उनके नाम से जुड़ा संस्कृत ग्रंथ ‘त्रयवर्णिक धर्मनिर्णय’ केवल धार्मिक नियमों का दस्तावेज नहीं माना जाता, बल्कि इसे उस दौर की सामाजिक व्यवस्था, जातीय संबंधों और बदलते कुमाऊं समाज को समझने वाली महत्वपूर्ण सामग्री के रूप में भी देखा जा सकता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

राजा रूद्रदेव चंद के संबंध में उपलब्ध परंपरागत विवरणों के अनुसार उन्होंने खस समाज को सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से उपनयन संस्कार और जनेऊ से संबंधित व्यवस्था विकसित की। विशेष रूप से तीन पल्ली जनेऊ की परंपरा का उल्लेख किया जाता है। हालांकि इस पूरे इतिहास के कई हिस्सों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यह प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है कि मध्यकालीन कुमाऊं में शासक वर्ग सामाजिक समूहों के बीच संबंधों को किस प्रकार नियंत्रित और व्यवस्थित करता था।

पांडुलिपि से उठता इतिहास का बड़ा सवाल

राजा रूद्रदेव चंद से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण दावा उनके द्वारा लिखे गए संस्कृत ग्रंथ ‘त्रयवर्णिक धर्मनिर्णय’ की मूल पांडुलिपि को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी पांडुलिपि कोलकाता की एशियाटिक सोसायटी के संग्रह में सुरक्षित बताई जाती है और उसके प्रथम पृष्ठ को राजा रूद्रदेव की हस्तलिपि से जोड़कर देखा जाता है।

इस ग्रंथ के लेखक को लेकर इतिहास में भ्रम की स्थिति भी रही। इसका एक कारण यह बताया जाता है कि दक्षिण भारत में भी रूद्रदेव नाम के शासक हुए थे। इसी समानता के कारण लंबे समय तक ग्रंथ के लेखक को दक्षिण भारत के राजा रूद्रदेव से जोड़कर देखा गया। बाद में संस्कृत के विद्वानों द्वारा ग्रंथ की विषयवस्तु और संदर्भों का अध्ययन किए जाने पर इसे कुमाऊं के राजा रूद्रदेव चंद से संबंधित माना गया।

यहीं से इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। किसी शासक की पहचान केवल उसके युद्धों और राजकीय उपलब्धियों से नहीं होती। उसके द्वारा लिखे गए सामाजिक और धार्मिक नियम भी उस समय के समाज की वास्तविक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

चंपावत से अल्मोड़ा तक सत्ता का बदलाव

रूद्रदेव चंद की पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए चंद राजवंश के शुरुआती इतिहास की ओर देखना पड़ता है। परंपरागत विवरणों में उनके पूर्वज भीष्म चंद का उल्लेख मिलता है। राजधानी के चंपावत से अल्मोड़ा की ओर बढ़ने की प्रक्रिया भी चंद सत्ता के विस्तार और पुनर्गठन के दौर से जुड़ी रही।

इतिहास और लोकपरंपरा में भीष्म चंद की हत्या से जुड़ी कहानी भी मिलती है। कहा जाता है कि बारामंडल क्षेत्र के एक खस सरदार ने अपने सैनिकों के साथ खगमराकोट पर हमला किया और भीष्म चंद की हत्या कर दी। इसके बाद सत्ता को चुनौती मिली। आगे चलकर भीष्म चंद के पुत्र बालो कल्याण चंद ने खस शक्ति को पराजित कर अपने पिता की हत्या का बदला लिया।

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में रूद्रदेव चंद का उदय हुआ। इसलिए उनके समय की सामाजिक नीति को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना अधूरा होगा। यह उस समय के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों से भी जुड़ी हुई थी।

खस समाज और कुमाऊं की प्राचीन सामाजिक संरचना

कुमाऊं के इतिहास में खस समाज की उपस्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। हिमालयी क्षेत्र में खस समुदाय की ऐतिहासिक उपस्थिति को लेकर इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों ने लंबे समय तक अध्ययन किया है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि आधुनिक जातीय पहचान और मध्यकालीन सामाजिक पहचान को एक ही नजरिये से नहीं देखा जा सकता। समय के साथ समुदायों की सामाजिक स्थिति, नाम, पेशे, राजनीतिक शक्ति और धार्मिक व्यवहार में परिवर्तन होते रहे हैं।

कुमाऊं में चंद सत्ता के विस्तार के साथ मैदानों से ब्राह्मण और राजपूत समूहों के आने और बसने की प्रक्रिया भी तेज हुई। इससे पहले से मौजूद स्थानीय समुदायों और नए राजनीतिक-सामाजिक समूहों के बीच संबंधों का नया स्वरूप बना।

बारामंडल क्षेत्र को खस बहुल क्षेत्र के रूप में वर्णित करने वाले कई स्थानीय ऐतिहासिक आख्यान मिलते हैं। ब्रिटिश काल की जनगणना के आंकड़ों का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जाता है। हालांकि इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय उस समय की जनगणना पद्धति और जातीय वर्गीकरण को ध्यान में रखना आवश्यक है।

राजा रूद्रदेव की असली चुनौती क्या थी?

यही वह बिंदु है जहां रूद्रदेव चंद की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

यदि उपलब्ध विवरणों को आधार बनाया जाए तो उस समय कुमाऊं में एक तरफ स्थानीय खस समाज था और दूसरी तरफ बाहर से आकर स्थापित हो रहे ब्राह्मण और राजपूत समूह। सत्ता का केंद्र चंद राजवंश था। ऐसी स्थिति में किसी भी शासक के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संतुलन कायम करना भी होती है।

रूद्रदेव को संस्कृत का विद्वान और अध्ययनशील शासक बताया जाता है। इसी कारण उनसे जुड़े ‘त्रयवर्णिक धर्मनिर्णय’ को केवल धार्मिक ग्रंथ मानने के बजाय सामाजिक व्यवस्था के दस्तावेज के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

ग्रंथ में विवाह, सामाजिक आचरण और विभिन्न वर्गों के लिए निर्धारित नियमों का उल्लेख होने की बात कही जाती है। इनमें अप्रवासी ब्राह्मणों और राजपूतों के लिए भी नियम बताए जाते हैं।

‘खसटाव’ जैसी व्यवस्था का उल्लेख

उपलब्ध विवरणों में एक विशेष सामाजिक नियम का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि यदि कोई राजपूत खस समुदाय में विवाह करता था तो उसे ‘खसटाव’ जैसे सामाजिक अपराध के रूप में देखा जाता था और इसके लिए दंड का प्रावधान था।

आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक भारत में ऐसी व्यवस्था को स्वीकार्य मानना संभव नहीं है। लेकिन इतिहास का अध्ययन वर्तमान के नैतिक मानदंडों को सीधे अतीत पर लागू करने के बजाय उस समय की सामाजिक मानसिकता को समझने के लिए किया जाता है।

मध्यकालीन समाज में जाति, विवाह, वंश और सामाजिक प्रतिष्ठा एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। इसलिए ऐसे नियमों का अस्तित्व उस समय की सामाजिक संरचना को समझने में मदद करता है।

तीन पल्ली जनेऊ की व्यवस्था क्यों?

रूद्रदेव चंद से जुड़ी सबसे रोचक ऐतिहासिक परंपरा खस समाज के उपनयन संस्कार और तीन पल्ली जनेऊ से संबंधित है।

कहा जाता है कि उस समय कुमाऊं के राजपूत छह पल्ली जनेऊ धारण करते थे, जबकि खस समाज के लिए तीन पल्ली जनेऊ की व्यवस्था की गई। इसे एक प्रकार की सामाजिक सीढ़ी के रूप में समझा जाता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य कथित तौर पर खस समाज को धार्मिक-सामाजिक मुख्यधारा में लाना था, लेकिन साथ ही तत्कालीन सामाजिक वर्गों के बीच अंतर भी बनाए रखना था।

यानी यह व्यवस्था पूरी समानता नहीं थी, बल्कि सामाजिक समावेशन और सामाजिक अंतर—दोनों का मिश्रण थी।

यही इसकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता है।

आज के नजरिये से देखें तो जनेऊ की संख्या का आधार बनाकर सामाजिक दर्जा तय करना असमानता का प्रतीक माना जा सकता है। लेकिन उस समय के संदर्भ में यह संभव है कि शासक ने मौजूदा सामाजिक ढांचे को पूरी तरह तोड़ने के बजाय उसमें खस समाज के लिए एक नई जगह बनाने की कोशिश की हो।

क्या यह सामाजिक सुधार था?

यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।

रूद्रदेव की नीति को आधुनिक अर्थों में सामाजिक सुधार कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। क्योंकि उस समय की व्यवस्था जातिगत अंतर को समाप्त करने के बजाय उसे व्यवस्थित करती दिखाई देती है।

लेकिन यदि यह मानें कि खस समाज को उपनयन संस्कार का अधिकार देकर उसे व्यापक धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में शामिल करने का प्रयास हुआ, तो इसे अपने समय के संदर्भ में सामाजिक समावेशन की नीति जरूर कहा जा सकता है।

यही इतिहास की जटिलता है।

किसी व्यवस्था में समानता और असमानता दोनों एक साथ मौजूद हो सकती हैं।

छह पल्ली और तीन पल्ली के बीच सामाजिक संदेश

तीन पल्ली और छह पल्ली जनेऊ की परंपरा का उल्लेख केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था। इसके पीछे पहचान और सामाजिक स्थिति का संदेश भी छिपा हुआ था।

एक ओर खस समाज को उपनयन संस्कार देकर धार्मिक पहचान की नई स्थिति प्रदान की गई, दूसरी ओर तीन पल्ली की व्यवस्था से उसकी अलग पहचान कायम रखी गई।

उपलब्ध विवरणों में यह भी कहा गया है कि यदि कोई खस व्यक्ति सेना अथवा प्रशासन में उच्च पद प्राप्त करता था, जैसे थोकदार, तो उसे छह पल्ली जनेऊ धारण करने का अधिकार मिल सकता था।

यदि यह व्यवस्था प्रमाणित होती है तो यह दिखाती है कि उस दौर में सामाजिक प्रतिष्ठा केवल जन्म से नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति से भी प्रभावित हो सकती थी।

क्या जनेऊ ने राजनीतिक तनाव कम किया?

परंपरागत विवरण यह दावा करते हैं कि रूद्रदेव की व्यवस्था के बाद खस समाज में बड़े पैमाने पर विद्रोह नहीं हुए। हालांकि ऐसे निष्कर्षों को स्थापित करने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोतों और व्यापक शोध की जरूरत है।

इतिहास में बाद के काल में खस सेनापति माणिक से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। 1728 में राजा देवीचंद की हत्या और उसके बाद अजीतचंद की हत्या की घटनाओं को भी इसी व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जाता है।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि रूद्रदेव की व्यवस्था ने सामाजिक तनाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया था, ऐसा निर्णायक रूप से कहना कठिन है। लेकिन सामाजिक समूहों को राजसत्ता के ढांचे में समाहित करने की कोशिश जरूर दिखाई देती है।

नेपाल की ठकुरी पहचान से जुड़ता एक बड़ा विमर्श

यह विषय केवल कुमाऊं तक सीमित नहीं है। नेपाल में ठकुरी समुदाय की उत्पत्ति और पहचान को लेकर भी लंबे समय से विभिन्न मत रहे हैं।

नेपाल के सामाजिक इतिहास में ठकुरी समुदाय के भीतर कई शाखाओं और ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है। शाह, शाही, पाल, बम, चंद, सिंह, मल्ल, सेन, राठौड़, हमाल और सामल जैसे उपनाम अलग-अलग क्षेत्रों और वंश परंपराओं से जुड़े बताए जाते हैं।

लेकिन ठकुरी को एक समान और एकरूप समुदाय मानना इतिहास की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा। विभिन्न क्षेत्रों में ठकुरी समूहों की भाषा, रीति-रिवाज, सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग-अलग रही है।

मगर और ठकुरी संबंध का सवाल

नेपाल के इतिहास और मानवशास्त्रीय अध्ययनों में ठकुरी और मगर समुदाय के बीच संबंधों को लेकर भी अलग-अलग मत सामने आते हैं। ब्रिटिश काल के यात्रियों और लेखकों के विवरणों में ऐसे दावे मिलते हैं जिनमें कुछ ठकुरी समूहों को स्थानीय जनजातीय समाज से जोड़ने की कोशिश की गई।

फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन के नेपाल संबंधी विवरणों को भी इस विमर्श में उद्धृत किया जाता है। उनके अवलोकनों की आधुनिक इतिहासकार अलग-अलग व्याख्या करते हैं।

यहां एक सावधानी जरूरी है—किसी औपनिवेशिक यात्री के अवलोकन को अंतिम ऐतिहासिक सत्य नहीं माना जा सकता। ऐसे विवरण अपने समय की भाषा, प्रशासनिक दृष्टिकोण और सीमित जानकारी से प्रभावित थे।

इसलिए ठकुरी, मगर, खस और राजपूत पहचान के संबंध में निष्कर्ष निकालते समय कई प्रकार के स्रोतों—शिलालेख, वंशावली, स्थानीय परंपराएं, साहित्य, जनगणना और आधुनिक आनुवंशिक-अध्ययन—को साथ पढ़ना जरूरी है।

शाह राजवंश और नेपाल का राजनीतिक इतिहास

नेपाल के राजनीतिक इतिहास में शाह राजवंश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। पृथ्वीनारायण शाह के नेतृत्व में गोरखा राज्य के विस्तार और नेपाल के एकीकरण ने हिमालयी राजनीति को नया स्वरूप दिया।

1768 के बाद शाह शासन नेपाल की केंद्रीय सत्ता का प्रमुख आधार बना और 2008 में राजशाही की समाप्ति तक यह व्यवस्था चली।

यह इतिहास कुमाऊं और नेपाल के बीच पुराने सांस्कृतिक तथा राजनीतिक संबंधों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। हिमालयी सीमाएं आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की तरह हमेशा कठोर नहीं थीं। लोगों का आवागमन, व्यापार, विवाह और सांस्कृतिक संबंध लंबे समय तक सीमापार चलते रहे।

ठकुरी पहचान की विशिष्ट परंपराएं

ठकुरी समुदाय की पहचान से जुड़ी कुछ पारंपरिक अभिवादन पद्धतियों का भी उल्लेख मिलता है। दाहिने हाथ से माथे को स्पर्श करना और बाएं हाथ से कोहनी पकड़ने जैसी परंपराओं को सम्मान और रिश्तेदारी की पहचान के रूप में बताया जाता है।

इसी तरह अलग-अलग क्षेत्रों में जीवा, जीमा, वुवा, मुवा, दाजी, अजी जैसे संबोधन और छोटे-बड़े के बीच विशेष रिश्तेदारी संबोधन भी सामाजिक संरचना का हिस्सा रहे हैं।

विवाह परंपराओं में भी क्षेत्रीय विविधता दिखाई देती है। कहीं कुल और गोत्र के भीतर अलग-अलग कुलों का मेल देखा जाता है तो कुछ क्षेत्रों में मामा की बेटी या फूफू की बेटी से विवाह की परंपराओं का उल्लेख मिलता है।

इन परंपराओं को पूरे ठकुरी समाज पर लागू करना उचित नहीं होगा। नेपाल का भौगोलिक विस्तार और स्थानीय विविधता इतनी व्यापक है कि एक ही सामाजिक नाम के भीतर अनेक अलग परंपराएं विकसित होना स्वाभाविक है।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक

राजा रूद्रदेव चंद और खस समाज से जुड़ी यह पूरी कहानी एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखती है—क्या सत्ता सामाजिक संघर्ष को समाप्त करती है या उसे नई संरचना देती है?

रूद्रदेव के संदर्भ में उपलब्ध विवरण बताते हैं कि शासक ने समाज के अलग-अलग समूहों के बीच दूरी कम करने के लिए धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था का सहारा लिया।

लेकिन उस व्यवस्था में पूर्ण समानता नहीं थी। पहचान के स्तर पर अंतर बनाए रखा गया। यही कारण है कि तीन पल्ली और छह पल्ली की परंपरा का उल्लेख इतना महत्वपूर्ण बन जाता है।

यह व्यवस्था हमें बताती है कि सामाजिक परिवर्तन हमेशा अचानक क्रांति के रूप में नहीं आता। कई बार सत्ता धीरे-धीरे नियम बदलती है, नए संस्कारों को मान्यता देती है और पुराने ढांचे में नए समूहों के लिए जगह बनाती है।

आज के लिए इसका क्या अर्थ है?

आज भारत का संविधान जाति, जन्म और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव को स्वीकार नहीं करता। इसलिए मध्यकालीन सामाजिक व्यवस्थाओं को आज की व्यवस्था का आदर्श बनाना उचित नहीं होगा।

लेकिन इतिहास को भूल जाना भी उचित नहीं है।

खस, ठकुरी, राजपूत, ब्राह्मण और अन्य समुदायों की ऐतिहासिक यात्राएं बताती हैं कि हिमालयी समाज स्थिर नहीं था। समय के साथ पहचानें बदलीं, राजनीतिक सत्ता बदली, विवाह संबंध बदले, भाषा बदली और सामाजिक प्रतिष्ठा की परिभाषाएं भी बदलीं।

आज जब जातीय पहचान को लेकर बहस तेज है, तब इतिहास को भावनाओं के बजाय प्रमाणों के साथ पढ़ने की आवश्यकता है।

पांडुलिपि पर हो गंभीर शोध

यदि ‘त्रयवर्णिक धर्मनिर्णय’ की मूल पांडुलिपि वास्तव में एशियाटिक सोसायटी के संग्रह में सुरक्षित है, तो उसके वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अध्ययन की आवश्यकता है।

पांडुलिपि की लिपि, कागज, स्याही, भाषा, लेखन शैली, ऐतिहासिक संदर्भ और अन्य समकालीन दस्तावेजों से तुलना कर यह निर्धारित किया जा सकता है कि लेखक कौन था और ग्रंथ की रचना किस काल में हुई।

यदि राजा रूद्रदेव चंद की हस्तलिपि से संबंधित दावा प्रमाणित होता है तो यह कुमाऊं के इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खोज होगी।

इसके साथ ही ग्रंथ का आलोचनात्मक संपादन, हिंदी अनुवाद और डिजिटल संरक्षण भी होना चाहिए, ताकि यह सामग्री केवल किसी संग्रहालय की अलमारी तक सीमित न रह जाए।

निष्कर्ष : जनेऊ की तीन पल्लियों से इतिहास की कई परतें

राजा रूद्रदेव चंद की कहानी केवल एक राजा, एक ग्रंथ या जनेऊ की तीन और छह पल्लियों की कहानी नहीं है। यह कुमाऊं के उस दौर की कहानी है जब स्थानीय खस समाज, बाहर से आए ब्राह्मण-राजपूत समूह और चंद राजसत्ता के बीच नए सामाजिक समीकरण बन रहे थे।

रूद्रदेव की कथित नीति को आधुनिक सामाजिक समानता की कसौटी पर पूरी तरह सुधारवादी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन उस दौर की परिस्थितियों में खस समाज को उपनयन संस्कार से जोड़ने का प्रयास सामाजिक इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण अवश्य है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतिहास किसी एक समुदाय की श्रेष्ठता साबित करने का हथियार नहीं होना चाहिए। इतिहास का उद्देश्य यह समझना होना चाहिए कि समाज कैसे बना, समुदाय कैसे बदले, सत्ता ने किन तरीकों से सामाजिक संबंधों को प्रभावित किया और समय के साथ पहचानें किस तरह नए अर्थ ग्रहण करती रहीं।

कुमाऊं और नेपाल के खस-ठकुरी-राजपूत संबंधों का इतिहास इसी जटिल यात्रा का हिस्सा है।

आज जरूरत किसी जाति को बड़ा या छोटा साबित करने की नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सामने लाने की है जो बताते हैं कि हिमालयी समाज ने सदियों में कितने बदलाव देखे हैं। राजा रूद्रदेव चंद का ‘त्रयवर्णिक धर्मनिर्णय’ इसी दृष्टि से एक ऐसी ऐतिहासिक कड़ी हो सकता है, जिसकी प्रमाणिकता और पूरी सामग्री पर गंभीर शोध होना अभी बाकी है।

— संपादकीय, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स


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