विकास की चमक के बीच गांवों का अंधेरा:‘पायर’ ने झकझोरा पहाड़ का दर्द, रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखकर दर्शकों ने महसूस की पलायन की असली त्रासदी‘पायर’ ने झकझोरा पहाड़ का दर्द, रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखकर दर्शकों ने महसूस की पलायन की असली त्रासदी


‘पायर’ ने झकझोरा पहाड़ का दर्द, रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखकर दर्शकों ने महसूस की पलायन की असली त्रासदी
बंद घरों के ताले, सूनी पगडंडियां और बूढ़ी आंखों में अपनों की वापसी का इंतजार… विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ ने पहाड़ के उस दर्द को पर्दे पर जीवंत कर दिया, जिसे अक्सर विकास के आंकड़ों में दबा दिया जाता है।

विकास की चमक के बीच गांवों का अंधेरा:‘पायर’ ने झकझोरा पहाड़ का दर्द, रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखकर दर्शकों ने महसूस की पलायन की असली त्रासदी‘पायर’ ने झकझोरा पहाड़ का दर्द, रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखकर दर्शकों ने महसूस की पलायन की असली त्रासदी

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


रुद्रपुर। कुछ फिल्में केवल मनोरंजन करती हैं, कुछ समाज को नई कहानी से परिचित कराती हैं, लेकिन कुछ ऐसी होती हैं जो दर्शकों को अपने आसपास की हकीकत से रूबरू कराकर भीतर तक झकझोर देती हैं। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ इसी श्रेणी की एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक सिनेमाई कृति है। रुद्रपुर के चावला थिएटर में फिल्म देखने के बाद पहाड़ के जीवन, पलायन और बुजुर्गों की उपेक्षा से जुड़े कई सवाल मन में उठते हैं। फिल्म समाप्त हो जाती है, लेकिन इसकी कहानी और इसके पात्रों का दर्द लंबे समय तक दर्शकों के साथ बना रहता है।
उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन की समस्या को हम वर्षों से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं। सरकारी रिपोर्टों में पलायन के आंकड़े आते हैं, राजनीतिक मंचों से गांवों को आबाद रखने के वादे किए जाते हैं और विकास की योजनाओं की घोषणाएं भी होती हैं। मगर इन आंकड़ों के पीछे छिपे मानवीय दर्द को समझने के लिए ‘पायर’ जैसी फिल्म को महसूस करना जरूरी है। यह फिल्म बताती है कि पलायन केवल युवाओं का गांव छोड़कर शहरों की ओर जाना नहीं है, बल्कि इसके साथ परिवार, सामाजिक संबंध, परंपराएं और पहाड़ की पूरी जीवनशैली भी धीरे-धीरे बिखरती चली जाती है।
बेटे की राह देखते बूढ़ी आंखों की कहानी
फिल्म की कहानी उत्तराखंड के एक दूरस्थ पहाड़ी गांव में रहने वाले करीब अस्सी वर्षीय पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी के इर्द-गिर्द बुनी गई है। उम्र के इस पड़ाव पर दोनों शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके हैं। दैनिक जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी उन्हें सहारे की आवश्यकता है। उनका इकलौता बेटा हरिया लगभग 28 वर्ष पहले रोजगार की तलाश में शहर चला गया था। उसके जाने के बाद माता-पिता की जिंदगी बेटे की वापसी की उम्मीद में गुजरती रही।
समय बीतता गया, उम्र ढलती गई, लेकिन हरिया नहीं लौटा। इसके बावजूद माता-पिता के मन में बेटे के आने की आस खत्म नहीं होती। उनके लिए घर का दरवाजा आज भी किसी दिन बेटे की दस्तक सुनने की प्रतीक्षा में है।
यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है। उत्तराखंड के हजारों गांवों में ऐसे बुजुर्ग मौजूद हैं जिनके बच्चे रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में महानगरों या दूसरे राज्यों में बस गए हैं। पीछे रह गए माता-पिता कभी फोन की घंटी का इंतजार करते हैं तो कभी त्योहारों पर बच्चों के घर लौटने की उम्मीद लगाए रहते हैं।
फिल्म इस पीड़ा को बिना किसी बनावटी संवाद और अनावश्यक नाटकीयता के सामने रखती है।
जब अपने अंतिम संस्कार की चिंता खुद करनी पड़े
फिल्म का सबसे मार्मिक पक्ष वह है, जब पदम सिंह को अपनी और अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद होने वाले अंतिम संस्कार की चिंता सताने लगती है। गांव लगभग खाली हो चुका है। आसपास रहने वाले परिवार भी पलायन की तैयारी में हैं। ऐसे में बुजुर्ग दंपती के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा होता है, जिसकी कल्पना करना भी किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए मुश्किल है।
उनकी चिंता यह नहीं है कि जीवन में कितने दिन शेष हैं, बल्कि यह है कि जब वे इस दुनिया से चले जाएंगे तो उनकी चिता को आग कौन देगा?
पदम सिंह का अपनी और पत्नी की चिता के लिए स्वयं लकड़ियां जुटाना दर्शक को भीतर तक विचलित कर देता है। यह दृश्य पहाड़ के पलायन की भयावह तस्वीर प्रस्तुत करता है। जिस गांव में कभी सुख-दुख में पूरा समाज एक परिवार की तरह खड़ा रहता था, वहां अब अंतिम विदाई देने के लिए भी लोगों का मिलना मुश्किल होता जा रहा है।
फिल्म का नाम ‘पायर’ भी इसी पीड़ा से जुड़ा है। पहाड़ी बोली में पायर का अर्थ शवदाह की चिता से है। लेकिन यहां यह शब्द केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु का प्रतीक नहीं है, बल्कि उन गांवों की सामाजिक चिता का संकेत भी बन जाता है जहां पलायन ने जीवन की चहल-पहल को समाप्त कर दिया है।
पहाड़ की संस्कृति और सामूहिक जीवन पर संकट
पहाड़ों की पहचान केवल उनकी प्राकृतिक सुंदरता, ऊंचे पर्वतों और हरे-भरे जंगलों से नहीं रही है। यहां की असली पहचान आपसी सहयोग, लोक संस्कृति, रीति-रिवाजों, लोकगीतों और सामूहिक जीवनशैली में बसती है।
कभी गांव में किसी के घर शादी होती थी तो पूरा गांव आयोजन में जुट जाता था। खेतों में फसल काटने से लेकर किसी परिवार पर संकट आने तक लोग एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। लेकिन लगातार हो रहे पलायन ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया है।
आज अनेक गांवों में मकान तो मौजूद हैं, मगर उनमें रहने वाले लोग नहीं हैं। खेत हैं, लेकिन उन्हें जोतने वाले हाथ कम होते जा रहे हैं। रास्ते हैं, लेकिन उन पर बच्चों की आवाजाही और ग्रामीणों की चहल-पहल समाप्त होती जा रही है।
फिल्म में पदम सिंह का गांव के बचे हुए लोगों को रोकने का प्रयास भी बेहद भावुक कर देने वाला है। वह उन्हें गांव नहीं छोड़ने के लिए मनाते हैं और अपनी बकरियां तक देने की पेशकश कर देते हैं। जब लोग उन्हें जल्द लौटने का भरोसा देते हैं तो उनका जवाब पहाड़ के पलायन की पूरी कहानी कह जाता है। वह कहते हैं, ‘इन पहाड़ों में एक बार घर में ताला लग जाए, तो फिर कभी नहीं खुलता।’
इस एक संवाद में वर्षों का अनुभव, टूटती उम्मीद और उजड़ते गांवों की पीड़ा समाई हुई है।
कलाकारों ने अभिनय नहीं, जीवन जिया
फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में इसके मुख्य कलाकार पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी का सहज अभिनय शामिल है। दोनों के अभिनय में बनावट दिखाई नहीं देती। उनके चेहरे की झुर्रियां, आंखों में इंतजार और एक-दूसरे के साथ छोटी-छोटी बातचीत कहानी को वास्तविकता के बेहद करीब ले जाती है।
पदम सिंह के किरदार में जमीन से जुड़ाव, बेटे के प्रति मोह और अकेलेपन की पीड़ा साफ दिखाई देती है। वहीं हीरा देवी अपनी शांत अभिव्यक्तियों और भावपूर्ण आंखों से दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं।
दोनों के बीच होने वाली सामान्य बातचीत और छोटी-छोटी नोकझोंक फिल्म को और अधिक जीवंत बनाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि पर्दे पर कोई काल्पनिक कहानी नहीं चल रही, बल्कि पहाड़ के किसी वास्तविक घर में जीवन का एक हिस्सा सामने आ रहा है। सुभाष चंद्रा और शुभम चौधरी ने भी अपने किरदारों के माध्यम से कहानी को मजबूती प्रदान की है।
निर्देशन और छायांकन ने पहाड़ की खामोशी को दी आवाज
निर्देशक विनोद कापड़ी ने फिल्म को व्यावसायिक सिनेमा के पारंपरिक ढर्रे से अलग रखते हुए वास्तविक जीवन के करीब बनाए रखा है। उन्होंने कहानी में अनावश्यक रोमांच या भावनात्मक संवादों का सहारा लेने के बजाय पहाड़ की स्वाभाविक गति और खामोशी को महत्व दिया है।
फिल्म में वीरान मकान, सुनसान रास्ते, खाली खेत और पहाड़ों के बीच अकेले दिखाई देते बुजुर्ग दंपती के दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं।
छायाकार मानस भट्टाचार्य ने उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य को खूबसूरती से कैमरे में उतारा है। खास बात यह है कि पहाड़ों की खूबसूरती के साथ वहां पसरे अकेलेपन को भी प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित संगीतकार माइकल डैना का संगीत स्थानीय लोकधुनों के साथ मिलकर फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को और गहरा करता है।
विकास की चमक के बीच गांवों का अंधेरा
‘पायर’ देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर पहाड़ का युवा अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर क्यों है? क्या गांवों में रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कराए जा सकते? क्या बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकती? क्या ऐसा विकास संभव नहीं है जिसमें पहाड़ का युवा अपने गांव में रहकर सम्मानजनक जीवन जी सके?
सड़कें बनना, बड़े भवन खड़े होना और पर्यटन स्थलों का विकास निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन विकास की वास्तविक कसौटी यह भी होनी चाहिए कि गांवों में रहने वाले बुजुर्ग कितने सुरक्षित हैं। उन्हें स्वास्थ्य सुविधा कितनी आसानी से मिलती है और संकट के समय उनके पास कौन खड़ा होता है।
उत्तराखंड के लिए पलायन केवल आर्थिक या भौगोलिक समस्या नहीं है। यह सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी है। यदि गांवों में जीवन की बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचीं तो आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों से जुड़ना भी मुश्किल हो जाएगा।
चावला थिएटर से लौटते समय मन में कई सवाल
रुद्रपुर के चावला थिएटर में ‘पायर’ देखने का अनुभव सामान्य फिल्म देखने जैसा नहीं रहा। पर्दे पर दिखाई गई कहानी कहीं न कहीं उत्तराखंड के उन गांवों की याद दिलाती है, जहां आज भी बुजुर्ग अपने बच्चों की राह देख रहे हैं। जिन घरों में कभी परिवारों की हंसी गूंजती थी, वहां अब खामोशी है।
इस फिल्म की विशेषता यह है कि यह किसी राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ नारा नहीं लगाती और न ही पलायन रोकने का कोई तैयार फार्मूला देती है। यह समाज, सरकार और व्यवस्था के सामने ऐसे सवाल रखती है जिनका जवाब ढूंढना बेहद जरूरी है।
विनोद कापड़ी की ‘पायर’ को केवल एक फिल्म मानकर देखना शायद इसके वास्तविक संदेश को सीमित करना होगा। यह उत्तराखंड के गांवों की बदलती तस्वीर, बुजुर्गों की असुरक्षा और पलायन के कारण टूटते सामाजिक ताने-बाने का मानवीय चित्रण है।
फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि पहाड़ की असली चिता उस दिन नहीं जलती जब किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है, बल्कि उस दिन जलने लगती है जब गांव का आखिरी परिवार भी अपना घर छोड़कर चला जाता है।
‘पायर’ एक ऐसी सिनेमाई पुकार है जिसे केवल आंखों से नहीं, दिल से महसूस करने की जरूरत है। यह फिल्म हर उस व्यक्ति को देखनी चाहिए जिसका पहाड़ से रिश्ता है, जिसकी जड़ें किसी गांव में हैं और जिसके माता-पिता आज भी अपने घर के दरवाजे पर अपनों की वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर