नेहा बोराको ‘देश की 140 करोड़ जनता पर भरोसा नहीं, 3 करोड़ घुसपैठियों पर विश्वास क्यों?’ लोकतंत्र और रिजीम चेंज के बयान पर सियासी घमासानलोकतंत्र में जनता सर्वोपरि, सत्ता परिवर्तन का अधिकार भी जनता के पास ही है!संपादकीय | जनादेश का सम्मान हो, लोकतंत्र को राजनीतिक प्रयोगशाला न बनाया जाए

नेहा बोरा के बयानों को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। एक राजनीतिक वक्ता ने सवाल उठाया कि देश की 140 करोड़ जनता के लोकतांत्रिक जनादेश पर भरोसा करने के बजाय कथित घुसपैठियों के मुद्दे को क्यों तूल दिया जा रहा है। उन्होंने विदेशी ताकतों की कथित टूलकिट और रिजीम चेंज की बयानबाजी पर भी तीखा हमला बोला। वक्ता का कहना है कि सरकार बदलने का अधिकार केवल जनता को है, जो अपने मताधिकार से फैसला करती है। वहीं लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सवाल उठाना भी संवैधानिक अधिकार है।


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सरकारें किसी विदेशी ताकत, किसी संगठन या सड़क पर होने वाले आंदोलन से नहीं, बल्कि देश की जनता के मत से बनती हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि जनता जिसे सत्ता सौंपती है, उसे सत्ता से बाहर करने का अधिकार भी उसी जनता के पास सुरक्षित रहता है। इसलिए लोकतंत्र में जनता के जनादेश का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।
आज देश में नेहा बोरा के कथित बयानों, विरोध प्रदर्शनों और ‘रिजीम चेंज’ जैसी शब्दावली को लेकर एक नई राजनीतिक बहस खड़ी हो गई है। सवाल यह है कि आखिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन की बात किस संदर्भ में की जा रही है? यदि किसी को सरकार की नीतियों से असहमति है तो उसे खुलकर सवाल उठाने, विरोध करने और जनता के बीच अपना विकल्प रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या किसी निर्वाचित सरकार को केवल राजनीतिक नाराजगी या आंदोलन के दबाव से हटाने की कल्पना करना लोकतांत्रिक जनादेश के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण है?
नेहा बोरा से यह सवाल पूछना भी स्वाभाविक है कि देश की 140 करोड़ आबादी के लोकतांत्रिक विवेक पर भरोसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए? चुनाव में जनता अपना फैसला सुनाती है। कोई दल जीतता है तो कोई हारता है। हारने वाले को अपनी कमियों का विश्लेषण करना चाहिए और जनता का विश्वास दोबारा हासिल करने के लिए काम करना चाहिए। चुनावी हार का समाधान लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा करना नहीं हो सकता।
इसी क्रम में 3 करोड़ कथित घुसपैठियों की संख्या को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि देश में इतने बड़े पैमाने पर अवैध घुसपैठ हुई है तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को प्रमाणों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकता जैसे विषय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि प्रमाणिक आंकड़ों और कानून के आधार पर तय होने चाहिए। किसी भी व्यक्ति को बिना प्रमाण घुसपैठिया घोषित करना भी उचित नहीं है।
विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप और टूलकिट के आरोप भी कम गंभीर नहीं हैं। भारत की संप्रभुता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसे आरोप लगाने वालों की जिम्मेदारी है कि वे अपने दावों के समर्थन में ठोस सबूत सामने रखें। केवल राजनीतिक विरोध को विदेशी साजिश बता देना भी लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है।
हमें यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। इसमें असहमति, विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का भी महत्वपूर्ण स्थान है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसलिए सरकार की आलोचना करना राष्ट्रविरोध नहीं और सरकार का समर्थन करना किसी की चाटुकारिता नहीं माना जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि हर पक्ष संविधान और कानून की मर्यादा में रहकर अपनी बात रखे।
जो लोग आज सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में सत्ता परिवर्तन के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। जनता ने समय-समय पर मजबूत सरकारों को भी सत्ता से बाहर किया है और नए नेतृत्व को जिम्मेदारी सौंपी है। यही लोकतंत्र की शक्ति है। जनता का फैसला किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति है।
इसलिए नेहा बोरा हों या कोई अन्य राजनीतिक नेता, सवाल पूछना उनका अधिकार है, लेकिन उन सवालों का जवाब तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी आलोचना से घबराने के बजाय पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ जवाब देना चाहिए।
अंततः लोकतंत्र किसी एक नेता, दल, संगठन या विचारधारा की जागीर नहीं है। यह 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, राजनीतिक चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन संविधान और जनता का मत सर्वोपरि रहना चाहिए। सत्ता का रास्ता भी जनता तय करेगी और सत्ता परिवर्तन का रास्ता भी जनता के मत से ही निकलेगा। यही भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर