संपादकीय: जंतर-मंतर पर गूंजा “चल छैंया छैंया”, विरोध के बीच जश्न का संदेश

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नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां विरोध और उत्सव, दोनों एक ही मंच पर दिखाई दे सकते हैं। जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के बीच जब युवतियों और महिलाओं के समूह ने लोकप्रिय गीत “चल छैंया छैंया” की धुन पर नृत्य और प्रस्तुति दी, तो माहौल कुछ देर के लिए आंदोलन की गंभीरता से हटकर उत्साह और ऊर्जा से भर गया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


रंग-बिरंगे परिधानों में सजी प्रतिभागियों ने आत्मविश्वास और जोश के साथ अपनी प्रस्तुति दी। चेहरे पर मुस्कान, हाथों की लय और समूह की एकजुटता ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया। गीत की धुन पर थिरकते प्रदर्शनकारियों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि विरोध केवल नारों तक सीमित नहीं होता, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी लोकतांत्रिक आंदोलनों का हिस्सा हो सकती है।
गीत के प्रसिद्ध शब्द “चल छैंया छैंया” पूरे परिसर में गूंजते रहे और कई लोग मोबाइल कैमरों में इस दृश्य को रिकॉर्ड करते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर भी इन दृश्यों की चर्चा तेज रही।
क्या यह किसी जीत का जश्न था या हार के बाद मनोबल बनाए रखने का प्रयास? इसका अंतिम उत्तर देना जल्दबाजी होगी। आंदोलन की मांगें, उनका परिणाम और राजनीतिक प्रभाव अलग विषय हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि प्रदर्शन स्थल पर कुछ समय के लिए उत्सव जैसा वातावरण अवश्य बना, जिसने आंदोलन को एक अलग सांस्कृतिक रंग दे दिया।
लोकतांत्रिक आंदोलनों में गीत, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां नई बात नहीं हैं। इतिहास गवाह है कि जनआंदोलनों ने समय-समय पर कला और संस्कृति को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। जंतर-मंतर का यह दृश्य भी उसी परंपरा की एक झलक माना जा सकता है, जहां विरोध के साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी मंच पर दिखाई दी।


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