उत्तराखंड के हल्द्वानी के पास बसे दानीजाला और सिमलखेत गांवों में इन दिनों खुशी का माहौल है। वजह है काठगोदाम-अमृतपुर बाईपास परियोजना, जिसका निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। कहा जा रहा है कि इससे इन गांवों को सड़क संपर्क मिलेगा, मानसून में होने वाली परेशानी खत्म होगी और पर्यटन तथा रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सरकार इसे विकास की बड़ी उपलब्धि बता रही है। लेकिन इस उपलब्धि के पीछे एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—क्या यह वास्तव में विकास की नई कहानी है या फिर उस व्यवस्था की विफलता का प्रमाण, जिसने आजादी के 79 वर्ष और उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी इन गांवों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
दानीजाला गांव की कहानी किसी दूरस्थ हिमालयी क्षेत्र की नहीं है। यह गांव हल्द्वानी शहर के बिल्कुल नजदीक स्थित है। गांव के सामने से नैनीताल हाईवे गुजरता है, लेकिन गौला नदी पर पुल न होने के कारण ग्रामीण वर्षों तक अलग-थलग जीवन जीने को मजबूर रहे। पूर्व प्रधान जीवन सिंह थापा के अनुसार, मानसून के दौरान ग्रामीणों को ट्रॉली के सहारे नदी पार करनी पड़ती थी। बच्चे भी उसी ट्रॉली से स्कूल जाते थे। यह दृश्य किसी पिछड़े या दुर्गम देश का नहीं बल्कि उस राज्य का है जिसे देश का सबसे तेज़ी से विकसित होने वाला पर्वतीय प्रदेश बताया जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद लगातार सरकारें क्या कर रही थीं? वर्ष 2000 में राज्य गठन के समय यह वादा किया गया था कि पहाड़ के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाया जाएगा। तब से लेकर अब तक भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों की सरकारें सत्ता में रहीं। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए। हजारों करोड़ रुपये की योजनाओं की घोषणाएं हुईं। लेकिन दानीजाला और सिमलखेत जैसे गांव आज तक सड़क के इंतजार में क्यों रहे?
और भी बड़ा सवाल वर्तमान “डबल इंजन सरकार” से है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार लगातार यह दावा करती रही हैं कि उत्तराखंड में अभूतपूर्व विकास हुआ है। चारधाम ऑल वेदर रोड, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना, रोपवे परियोजनाएं, एयर कनेक्टिविटी और पर्यटन निवेश जैसे विषयों पर सरकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपलब्धियां गिनाती है। लेकिन यदि हल्द्वानी जैसे प्रमुख शहर के पास स्थित गांवों के लोग आज भी ट्रॉली के सहारे नदी पार करने को मजबूर थे, तो विकास के इन दावों का वास्तविक अर्थ क्या है?
सरकार के समर्थक कह सकते हैं कि अब तो परियोजना शुरू हो गई है और लोगों को राहत मिलने वाली है। यह बात सही है और इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि काम हुआ या नहीं, बल्कि यह भी होता है कि काम कब हुआ और इतने वर्षों तक क्यों नहीं हुआ? यदि यह परियोजना इतनी महत्वपूर्ण थी कि इससे नैनीताल, भीमताल, भवाली और कैंची धाम जाने वाले लाखों यात्रियों को राहत मिलने वाली है, तो इसकी जरूरत पहले क्यों महसूस नहीं की गई?
काठगोदाम, रानीबाग और गुलाबघाटी में जाम की समस्या कोई नई नहीं है। पर्यटन सीजन में यहां घंटों जाम लगना वर्षों से आम बात रही है। स्थानीय लोग लगातार वैकल्पिक मार्ग की मांग करते रहे। प्रशासनिक बैठकों में भी यह विषय कई बार उठा। फिर भी समाधान के लिए 2026 तक इंतजार क्यों करना पड़ा? क्या विकास योजनाएं जनता की जरूरतों के आधार पर बनती हैं या चुनावी समीकरणों के आधार पर?
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस परियोजना का शिलान्यास ऐसे समय में हुआ है जब राज्य में विकास कार्यों को लेकर सरकार लगातार अपनी उपलब्धियां गिना रही है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह परियोजना वास्तव में विकास की दृष्टि से प्राथमिकता थी या फिर राजनीतिक आवश्यकता बन चुकी थी?
दानीजाला और सिमलखेत की कहानी केवल दो गांवों की कहानी नहीं है। यह पूरे उत्तराखंड की विकास नीति पर सवाल खड़ा करती है। राज्य के अनेक गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई गांवों में युवाओं का पलायन जारी है। कई क्षेत्रों में अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और ग्रामीण सड़कें बदहाल हैं। ऐसे में जब सरकारें विकास के पुरस्कार और उपलब्धियों का जश्न मनाती हैं तो जमीन पर मौजूद यह सच्चाई उन दावों की पोल खोलती नजर आती है।
विडंबना यह भी है कि उत्तराखंड में विकास के नाम पर कई बार बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित होते हैं, निवेश सम्मेलन होते हैं और करोड़ों रुपये के विज्ञापन जारी किए जाते हैं। लेकिन जिन गांवों में लोग नदी पार करने के लिए ट्रॉली का सहारा लेते हों, वहां विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
काठगोदाम-अमृतपुर बाईपास निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण परियोजना है। इससे स्थानीय लोगों को राहत मिलेगी, पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और यातायात व्यवस्था बेहतर होगी। लेकिन इस परियोजना का वास्तविक महत्व केवल इसके निर्माण में नहीं, बल्कि उस सवाल में छिपा है जो यह सरकार और व्यवस्था दोनों से पूछती है—क्या विकास का मतलब केवल नई परियोजनाओं का उद्घाटन है या फिर उन लोगों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना भी है जो दशकों से इंतजार कर रहे हैं?
आज दानीजाला और सिमलखेत के लोग खुश हैं और उनकी खुशी जायज भी है। लेकिन इस खुशी के साथ यह सवाल भी हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि यदि एक गांव को सड़क से जोड़ने में 26 साल लग जाएं, तो विकास के दावों की असली तस्वीर क्या है? आखिर क्यों उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी इन गांवों को “कालापानी की सजा” जैसी जिंदगी जीनी पड़ी? क्यों बच्चों को शिक्षा पाने के लिए ट्रॉली में बैठकर नदी पार करनी पड़ी? और क्यों सरकारों को उनकी याद तब आई जब विकास के दावों की चमक के पीछे छिपी हकीकत सामने आने लगी?
काठगोदाम-अमृतपुर बाईपास का निर्माण स्वागत योग्य है, लेकिन यह उपलब्धि जितनी सरकार की सफलता की कहानी है, उतनी ही व्यवस्था की 26 वर्षों की विफलता का दस्तावेज भी है। विकास का असली उत्सव तब होगा जब उत्तराखंड का कोई भी गांव सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए दशकों तक इंतजार करने को मजबूर न हो।
संभावित शीर्षक:
26 साल बाद टूटी दानीजाला-सिमलखेत की बेड़ियां, लेकिन सवालों के घेरे में विकास के दावे
डबल इंजन सरकार से बड़ा सवाल: हल्द्वानी के गांवों को सड़क के लिए 26 साल क्यों इंतजार करना पड़ा?
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