मोदी के 12 साल और उत्तराखंड: क्या राज्य आंदोलन का सपना सच हुआ?
उत्तराखंड राज्य का जन्म केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं हुआ था। यह उन लाखों पहाड़वासियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम था जिन्होंने दशकों तक अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन किया। खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा जैसी घटनाएं केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नाम नहीं हैं, बल्कि वे उस पीड़ा, उपेक्षा और असमानता के प्रतीक हैं जिन्हें पहाड़ के लोगों ने वर्षों तक झेला।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
साल 2000 में जब उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, तब लोगों की उम्मीद थी कि अब पहाड़ का विकास पहाड़ की जरूरतों के अनुसार होगा। गांवों से पलायन रुकेगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा, महिलाओं को पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा, और राज्य की प्राकृतिक संपदा का लाभ स्थानीय लोगों को मिलेगा। लेकिन राज्य गठन के बाद के शुरुआती वर्षों में यह सपना पूरी तरह साकार होता दिखाई नहीं दिया। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो सका।
ऐसे में जब 2014 में नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली, तब उत्तराखंड अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था। चारधाम यात्रा मार्ग संकरे और जोखिमपूर्ण थे। बरसात के दिनों में सड़कें बंद हो जाती थीं। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचना कठिन था। रेल नेटवर्क सीमित था और हवाई सेवाएं आम नागरिक की पहुंच से दूर थीं। राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन, कृषि और सरकारी नौकरियों पर निर्भर थी, जबकि युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा था।
पिछले 12 वर्षों में यदि किसी क्षेत्र में सबसे अधिक परिवर्तन दिखाई देता है तो वह है कनेक्टिविटी। सड़क, रेल और हवाई सेवाओं के क्षेत्र में हुए निवेश ने उत्तराखंड के विकास की नई कहानी लिखी है।
चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग 12 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना ने बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को वर्षभर बेहतर संपर्क उपलब्ध कराने का मार्ग प्रशस्त किया है। पहले जहां यात्रा मौसम की मार पर निर्भर रहती थी, वहीं अब यात्रियों और स्थानीय निवासियों दोनों को इसका लाभ मिल रहा है। यह केवल सड़क निर्माण नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन, स्थानीय व्यापार और आपदा प्रबंधन की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
दिल्ली-देहरादून आर्थिक कॉरिडोर ने उत्तराखंड और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बीच की दूरी को समय के पैमाने पर कम कर दिया है। इससे पर्यटन, निवेश और उद्योग के नए अवसर पैदा हुए हैं। इसके साथ ही रुद्रपुर बाईपास, काठगोदाम-हल्द्वानी बाईपास, भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग और सीमांत क्षेत्रों की सड़कों का निर्माण यह दर्शाता है कि केंद्र और राज्य सरकारें संपर्क व्यवस्था को विकास का आधार मान रही हैं।
हवाई सेवाओं में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। जॉलीग्रांट, पंतनगर और पिथौरागढ़ हवाई अड्डों का विस्तार हुआ है। उड़ान योजना के तहत छोटे शहरों और दूरस्थ क्षेत्रों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास किया गया है। पहाड़ के लोगों के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं अब केवल आपदा या वीआईपी उपयोग तक सीमित नहीं रहीं। मुख्यमंत्री उड़न खटोला योजना जैसी पहलें पर्वतीय क्षेत्रों को तेज और सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
रेलवे के क्षेत्र में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना को उत्तराखंड के इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में गिना जाएगा। जिस पहाड़ को कभी रेल पहुंचने योग्य नहीं माना जाता था, वहां सुरंगों और पुलों के माध्यम से रेल लाइन बिछाने का कार्य भविष्य में गढ़वाल क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक तस्वीर बदल सकता है। अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण भी यात्रियों के अनुभव को बेहतर बना रहा है।
निस्संदेह, इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। आज उत्तराखंड पहले की तुलना में अधिक जुड़ा हुआ राज्य है। आपदा के समय राहत पहुंचाने की क्षमता बढ़ी है। पर्यटन का दायरा विस्तृत हुआ है। निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ है। सीमांत क्षेत्रों तक प्रशासन की पहुंच बेहतर हुई है। यह सब उस राज्य के लिए महत्वपूर्ण है जो भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल सड़क, रेल और हवाई सेवाओं का विस्तार ही उत्तराखंड राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्य की पूर्ति है?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है।
उत्तराखंड आंदोलन का मूल दर्शन केवल बुनियादी ढांचा निर्माण नहीं था। आंदोलन की आत्मा थी—स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार, पलायन पर रोक, रोजगार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर व्यवस्था तथा पर्वतीय क्षेत्रों का संतुलित विकास। आज भी राज्य के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। अनेक गांव ऐसे हैं जहां घरों पर ताले लगे हैं। खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। युवाओं का बड़ा वर्ग रोजगार की तलाश में देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और अन्य महानगरों की ओर जा रहा है।
सड़कें बन गईं, लेकिन क्या उन सड़कों से गांवों में रोजगार पहुंचा? रेल लाइनें बन रही हैं, लेकिन क्या पहाड़ का युवा अपने गांव में सम्मानजनक आजीविका पा रहा है? हवाई सेवाएं बढ़ी हैं, लेकिन क्या सीमांत क्षेत्रों के स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति में समान गति से सुधार हुआ है? यही वे सवाल हैं जो उत्तराखंड आंदोलन की मूल भावना को जीवित रखते हैं।
राज्य आंदोलनकारियों का सपना केवल कंक्रीट और डामर का विकास नहीं था। वे ऐसा उत्तराखंड चाहते थे जहां जल, जंगल और जमीन का लाभ स्थानीय समाज को मिले। जहां पहाड़ की बेटी को शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए संघर्ष न करना पड़े। जहां पहाड़ का युवक अपने गांव को छोड़ने के लिए मजबूर न हो। जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे।
आज उत्तराखंड एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक ओर अभूतपूर्व बुनियादी ढांचा विकास है, दूसरी ओर पलायन, बेरोजगारी, पर्यावरणीय चुनौतियां और पर्वतीय क्षेत्रों में जनसंख्या का घटता घनत्व जैसी गंभीर समस्याएं हैं। इसलिए विकास की सफलता का मूल्यांकन केवल किलोमीटर सड़क, रेल लाइन या उड़ानों की संख्या से नहीं किया जा सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में उत्तराखंड की कनेक्टिविटी में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन परियोजनाओं ने राज्य को नई गति दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह कहना उचित है कि यह दौर उत्तराखंड के विकास के इतिहास में महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा। लेकिन इस अध्याय को वास्तव में स्वर्णिम बनाने के लिए आवश्यक है कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
जब पहाड़ का खाली होता गांव फिर से आबाद होगा, जब युवाओं को अपने घर के आसपास रोजगार मिलेगा, जब महिलाओं का श्रम कम होगा, जब सीमांत क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं महानगरों के बराबर होंगी, तब कहा जा सकेगा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना पूरी तरह साकार हुआ है।
सड़क, रेल और हवाई सेवाएं उस मंजिल तक पहुंचने के साधन हैं, मंजिल स्वयं नहीं। उत्तराखंड आंदोलन की असली जीत तब होगी जब विकास के आंकड़ों के साथ-साथ पहाड़ का आदमी भी मुस्कुराएगा। तभी राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले आंदोलनकारियों के सपनों को सच्ची श्रद्धांजलि मिलेगी और तभी उत्तराखंड की मूल अवधारणा वास्तव में सार्थक कहलाएगी।
यह संपादकीय विकास की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए राज्य आंदोलन की मूल भावना—रोजगार, पलायन, स्थानीय अधिकार और संतुलित विकास—के संदर्भ में एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
