कलम बनाम साम्राज्य : स्वतंत्रता संग्राम के पत्रकार, अंग्रेजों का दमन और आज की पत्रकारिता का यथार्थ

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रुद्रपुर उत्तराखंड भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार, आंदोलन और जेल यात्राओं का इतिहास नहीं है। यह कलम, विचार और जनचेतना के संघर्ष का भी इतिहास है। जिस दौर में अंग्रेजी साम्राज्य दुनिया की सबसे शक्तिशाली सत्ता माना जाता था, उस समय भारतीय पत्रकारों और समाचार पत्रों ने वह साहस दिखाया जिसने करोड़ों भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित की। यही कारण था कि अंग्रेज पत्रकारों से उतना ही डरते थे जितना किसी क्रांतिकारी संगठन या जनविद्रोह से।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


पत्रकारिता किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आत्मा होती है। लेकिन भारत में पत्रकारिता का जन्म केवल सूचना देने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि राष्ट्रीय चेतना जगाने, सामाजिक सुधार लाने और विदेशी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए हुआ था। उस समय पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम थी।
अंग्रेज पत्रकारों से क्यों डरते थे?
अंग्रेजों को पता था कि बंदूक कुछ लोगों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन विचार पूरी पीढ़ी को बदल सकते हैं। पत्रकार गांव-गांव तक यह संदेश पहुंचा रहे थे कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि एक राष्ट्र है। वे लोगों को बता रहे थे कि अंग्रेजी शासन सभ्यता का प्रतीक नहीं बल्कि आर्थिक शोषण और राजनीतिक दमन का माध्यम है।
जब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र “केसरी” के माध्यम से स्वराज का संदेश दिया, तब हजारों युवाओं के भीतर क्रांति की चेतना जागी। जब महात्मा गांधी ने “यंग इंडिया”, “हरिजन” और “नवजीवन” के माध्यम से अपने विचार रखे, तब स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक दिशा मिली। जब गणेश शंकर विद्यार्थी ने “प्रताप” में अन्याय के खिलाफ लिखा, तब जनता को अपनी आवाज मिली।
अंग्रेजों की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि प्रेस जनता को एकजुट कर रहा था। भारत की भाषाई, जातीय और क्षेत्रीय विविधताओं के बीच पत्रकारिता राष्ट्रीय एकता का सूत्र बन रही थी। यही कारण था कि ब्रिटिश शासन ने सबसे अधिक प्रतिबंध प्रेस पर लगाए।
दमनकारी कानूनों का जाल
अंग्रेजी शासन की कानून व्यवस्था का मूल उद्देश्य न्याय नहीं बल्कि सत्ता की रक्षा था। भारतीयों को अधिकार देने की बजाय उन्हें नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए गए।
1823 का लाइसेंसिंग रेगुलेशन एक्ट प्रेस पर पहला बड़ा हमला था। इसके तहत बिना सरकारी अनुमति कोई भी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं किया जा सकता था।
1878 में लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू किया। यह कानून विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को दबाने के लिए बनाया गया था। अंग्रेजी समाचार पत्रों को कुछ छूट दी गई, लेकिन हिंदी, उर्दू, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को निशाना बनाया गया। किसी भी लेख को “सरकार विरोधी” बताकर प्रेस जब्त की जा सकती थी।
इसके बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए अर्थात राजद्रोह कानून का उपयोग पत्रकारों को जेल भेजने के लिए किया गया। तिलक जैसे नेताओं को इसी कानून के तहत सजा दी गई।
1910 का इंडियन प्रेस एक्ट प्रेस की आर्थिक रीढ़ तोड़ने का प्रयास था। प्रकाशकों से भारी जमानत राशि जमा कराई जाती थी और सरकार उसे जब्त कर सकती थी।
1919 का रोलेट एक्ट तो दमन की पराकाष्ठा था। बिना मुकदमे और बिना सुनवाई किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था।
स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारों का योगदान
यदि स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी लिखी जाए तो पत्रकारों का नाम अग्रिम पंक्ति में होगा।
पत्रकारों ने जनता को बताया कि बंगाल विभाजन क्यों हुआ, किसानों का शोषण कैसे हो रहा है, अंग्रेज भारत की संपत्ति कैसे लूट रहे हैं और भारतीयों को उनके ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक क्यों बनाया गया है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पत्रकारों ने अंग्रेजी दमन का असली चेहरा दुनिया के सामने रखा। अनेक समाचार पत्र बंद हुए, संपादकों को जेल भेजा गया, प्रेस सील हुईं, लेकिन कलम नहीं रुकी।
1857 के विद्रोह से लेकर 1947 की स्वतंत्रता तक पत्रकारिता राष्ट्रीय आंदोलन की धड़कन बनी रही। उस समय पत्रकारों के पास आधुनिक तकनीक नहीं थी, लेकिन उनके पास राष्ट्रभक्ति, साहस और जनविश्वास था।
स्वतंत्रता के बाद पत्रकारिता का बदलता स्वरूप
आजादी के बाद पत्रकारिता का स्वरूप बदला। लोकतंत्र में प्रेस को चौथा स्तंभ कहा गया। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया। पत्रकारिता का दायरा राजनीति से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों तक पहुंचा।
रेडियो, टेलीविजन और फिर डिजिटल मीडिया ने सूचना के प्रसार को अभूतपूर्व गति दी। आज किसी घटना की जानकारी कुछ ही सेकंड में पूरी दुनिया तक पहुंच जाती है।
लेकिन इसी दौर में पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां भी पैदा हुईं।
आज की पत्रकारिता का सकारात्मक पक्ष
आज भी देश में हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो कठिन परिस्थितियों में जनहित के मुद्दे उठाते हैं।
भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा हो, पर्यावरणीय संकट हो, महिलाओं के अधिकारों की बात हो या ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएं—अनेक पत्रकार आज भी जनता की आवाज बनकर काम कर रहे हैं।
डिजिटल मीडिया ने आम नागरिक को भी अभिव्यक्ति का मंच दिया है। अब केवल बड़े मीडिया संस्थानों का एकाधिकार नहीं रहा। छोटे शहरों और गांवों की खबरें भी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच रही हैं।
आपदा, महामारी और संकट के समय पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डालकर समाज को महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई। कोविड काल इसका बड़ा उदाहरण है।
आज की पत्रकारिता का नकारात्मक पक्ष
दूसरी ओर पत्रकारिता के सामने गंभीर संकट भी दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ी समस्या है खबर और विचार के बीच की रेखा का धुंधला होना। कई बार समाचार की जगह पक्षधरता दिखाई देती है। टीआरपी और क्लिक की दौड़ में सनसनी को महत्व मिलने लगता है।
फेक न्यूज, आधी-अधूरी जानकारी और सोशल मीडिया पर बिना सत्यापन के प्रसारित सामग्री ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को चुनौती दी है।
कुछ मीडिया संस्थानों पर कॉरपोरेट और राजनीतिक प्रभाव के आरोप भी लगते रहे हैं। इससे निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
कई बार पत्रकारिता जनहित की बजाय मनोरंजन और विवाद को प्राथमिकता देती दिखाई देती है। स्टूडियो की बहसें वास्तविक मुद्दों को पीछे छोड़ देती हैं।
पत्रकार और एक्टिविस्ट में अंतर
आधुनिक दौर में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि पत्रकार का कार्य क्या है?
पत्रकार का दायित्व तथ्यों को सामने लाना, सत्य की खोज करना और जनता को जानकारी देना है। जबकि एक्टिविस्ट किसी विशेष विचार या उद्देश्य के समर्थन में कार्य करता है।
जब पत्रकारिता तथ्य आधारित रहती है तो उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है। जब वह किसी विचारधारा का प्रचार माध्यम बन जाती है तो उसके प्रति विश्वास कम होने लगता है।
पत्रकारिता का भविष्य
भविष्य की पत्रकारिता केवल तकनीक से नहीं बल्कि विश्वसनीयता से तय होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म सूचना का स्वरूप बदल रहे हैं, लेकिन सत्य की आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी स्वतंत्रता संग्राम के समय थी।
पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सत्ता का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह रहना है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पत्रकार प्रश्न पूछने का साहस रखते हैं और सत्ता उत्तर देने की जिम्मेदारी निभाती है।

स्वतंत्रता संग्राम के पत्रकारों ने कलम को हथियार बनाया और अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी। उन्होंने जेल, जुर्माना, यातना और अपमान सहा लेकिन सत्य का साथ नहीं छोड़ा। आज की पत्रकारिता को भी उसी विरासत से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
अंग्रेजों के समय पत्रकारिता का संघर्ष विदेशी सत्ता के खिलाफ था, आज उसका संघर्ष असत्य, भ्रम, भ्रष्टाचार और जनविरोधी प्रवृत्तियों के खिलाफ है। स्वतंत्रता सेनानी पत्रकारों की सबसे बड़ी सीख यही है कि पत्रकारिता का धर्म सत्ता से निकटता नहीं, सत्य से निष्ठा है।
जब तक कलम सच के साथ खड़ी रहेगी, लोकतंत्र जीवित रहेगा। और जिस दिन पत्रकारिता केवल व्यापार बन जाएगी, उस दिन लोकतंत्र का सबसे मजबूत प्रहरी कमजोर पड़ जाएगा।
अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स संपादकीय; स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता, ब्रिटिश दमनकारी नीतियों, आधुनिक मीडिया की चुनौतियों तथा पत्रकारिता के भविष्य का संतुलित और तथ्याधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारत की आज़ादी में पत्रकारिता बनी सबसे बड़ा हथियार, अंग्रेजी हुकूमत ने लगाए कई दमनकारी कानून
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता ने केवल समाचारों का प्रसार ही नहीं किया, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और जनजागरण का भी महत्वपूर्ण कार्य किया। इतिहासकारों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में समाचार पत्रों और पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी पत्रकारिता से जुड़े रहे।
अंग्रेजी शासन पत्रकारों की बढ़ती ताकत से भयभीत था। यही कारण था कि समय-समय पर प्रेस पर नियंत्रण के लिए अनेक कठोर कानून बनाए गए। 1799 में लॉर्ड वेलसली ने पहला प्रेस कानून लागू किया, जिसके तहत समाचारों को प्रकाशित करने से पहले सरकारी सेंसर की अनुमति आवश्यक कर दी गई। इसके बाद प्रेस एक्ट, वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट और राजद्रोह अधिनियम जैसे कई कानून लागू कर भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को दबाने का प्रयास किया गया।
हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ। इसके बाद भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। अनेक पत्रकारों ने जेल, आर्थिक संकट और दमन का सामना करते हुए भी स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद की अलख जगाई।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि पत्रकारों, संपादकों और समाचार पत्रों के त्याग, साहस और बलिदान की भी अमूल्य देन थी।


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