रुद्रपुर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी और मिशन-60 का लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी से राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल, संगठन के भीतर गुटबाजी, स्थानीय नेताओं की आपसी खींचतान और विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी को दूर करने की है। पार्टी इस बार केवल सरकार की उपलब्धियों के भरोसे चुनाव मैदान में उतरने के बजाय प्रत्याशी चयन से लेकर बूथ प्रबंधन तक व्यापक बदलाव की तैयारी में जुटी दिखाई दे रही है।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार भाजपा अपने मौजूदा 47 विधायकों में से करीब 10 के टिकट काट सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक किसी विधायक का टिकट काटने अथवा किसी नए चेहरे को प्रत्याशी बनाने की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संभावित बदलावों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
रुद्रपुर में पूर्व महापौर रामपाल सिंह के नाम पर चर्चा, सामाजिक समीकरण बन सकता है आधार
ऊधम सिंह नगर की महत्वपूर्ण रुद्रपुर विधानसभा सीट पर भी संभावित प्रत्याशी परिवर्तन को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषण में पूर्व महापौर रामपाल सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। चर्चा है कि यदि भाजपा मौजूदा विधायक के स्थान पर किसी नए चेहरे को मौका देने का निर्णय करती है तो रामपाल सिंह पार्टी की पसंद बन सकते हैं।
रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र की सामाजिक संरचना को देखते हुए रामपाल सिंह की दावेदारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद रुद्रपुर का सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप तेजी से बदला है। यहां देसी समाज की बड़ी आबादी है, जिसमें दलित समाज की भी उल्लेखनीय संख्या है। ऐसे में भाजपा के लिए ऐसा प्रत्याशी महत्वपूर्ण हो सकता है जिसकी सामाजिक स्वीकार्यता व्यापक हो और जो अलग-अलग वर्गों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखता हो।
पूर्व महापौर रामपाल सिंह को इसी राजनीतिक समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। उनका निर्विवाद और सहज स्वभाव, पार्टी के प्रति समर्पण तथा दलित और देसी समाज के बीच उनकी पहचान उनकी राजनीतिक दावेदारी को मजबूती देने वाले पहलू माने जा रहे हैं। भाजपा यदि सामाजिक संतुलन, संगठनात्मक स्वीकार्यता और स्थानीय समीकरणों को प्राथमिकता देती है तो रामपाल सिंह का नाम गंभीरता से विचाराधीन हो सकता है।
हालांकि अभी यह राजनीतिक चर्चा और संभावित समीकरणों का विषय है। अंतिम निर्णय भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व ही करेगा।
किच्छा मे कमलेंद्र सेमवाल के नाम की चर्चा
रुद्रपुर के साथ ही किच्छा विधानसभा क्षेत्र में भी संभावित प्रत्याशी परिवर्तन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। यहां कमलेश्वर सेमवाल का नाम भी टिकट की दौड़ में आगे बताया जा रहा है। राजनीतिक चर्चाओं में उन्हें संभावित नए चेहरे के रूप में देखा जा रहा है।
यदि भाजपा किच्छा में भी बदलाव का फैसला करती है तो कमलेंद्र सेमवाल की दावेदारी पर पार्टी के भीतर विचार हो सकता है। हालांकि इस संबंध में भी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
रुद्रपुर और किच्छा दोनों विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशी चयन के दौरान भाजपा के सामने केवल चुनाव जीतने का सवाल नहीं होगा, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की स्वीकार्यता, सामाजिक समीकरण, जनता के बीच छवि और संगठन के भीतर एकजुटता भी महत्वपूर्ण कसौटी होगी।
भाजपा का मिशन-60, गुटबाजी पर लगाम लगाने की कवायद
भाजपा ने उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए मिशन-60 का लक्ष्य निर्धारित किया है। राज्य गठन के बाद 2022 में पहली बार किसी राजनीतिक दल ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी का इतिहास बनाया था। अब भाजपा इसी उपलब्धि को आगे बढ़ाकर तीसरी बार सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम करना चाहती है।
इसके लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने के साथ ही नेताओं को गुटबाजी से दूर रहने का संदेश दे रही है। पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं को संवाद की जिम्मेदारी दी गई है ताकि चुनाव से पहले संगठन के भीतर किसी प्रकार की दरार न रहे।
भाजपा वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में है। पार्टी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए चारधाम परियोजना, समान नागरिक संहिता, सख्त नकल विरोधी कानून, सड़क और आधारभूत ढांचे के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाएगी।
महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए नई योजनाओं और युवाओं के लिए रोजगार संबंधी घोषणाओं की भी संभावना जताई जा रही है। पलायन रोकने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमों को भी चुनाव प्रचार में प्रमुखता से रखा जाएगा।
SIR अभियान भी भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर भी भाजपा सक्रिय होने की तैयारी में है। पार्टी उन मतदाताओं के नाम दोबारा जुड़वाने के लिए राज्यव्यापी अभियान चला सकती है, जिनके नाम किसी कारण से मतदाता सूची से कट गए हैं। इसके लिए कार्यकर्ताओं को घर-घर संपर्क करने और पात्र मतदाताओं को नाम जुड़वाने की प्रक्रिया में सहायता देने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
भाजपा जानती है कि चुनाव में मतदाता सूची का महत्व बेहद अधिक है। इसलिए संगठनात्मक मजबूती के साथ मतदाता संपर्क अभियान को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
कांग्रेस के मुद्दे भाजपा के लिए चुनौती
दूसरी ओर कांग्रेस ने भी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सरकार को घेरने की तैयारी तेज कर दी है। कांग्रेस भ्रष्टाचार, सरकारी जमीनों के आवंटन, भू-कानून, पलायन, बेरोजगारी, महंगाई और अग्निवीर योजना को लेकर भाजपा पर हमलावर है। अंकिता भंडारी प्रकरण और भू-कानून को लेकर स्थानीय लोगों की नाराजगी भी भाजपा के सामने चुनौती बनी हुई है।
हालांकि भाजपा का मानना है कि कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व का संकट उसके लिए चुनावी चुनौती है। पार्टी धामी सरकार के कामकाज और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है।
2022 के चुनाव का आंकड़ा भी भाजपा के लिए चेतावनी
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 57 सीटें और करीब 46.5 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। वहीं 2022 के चुनाव में पार्टी 47 सीटों पर सिमट गई और उसका मत प्रतिशत घटकर करीब 44.30 प्रतिशत रह गया। कांग्रेस को पिछली बार की तुलना में सात सीटों का फायदा हुआ था।
यह आंकड़ा भाजपा नेतृत्व के लिए एक संकेत है कि सत्ता में वापसी के बावजूद पार्टी का जनाधार पहले के मुकाबले घटा था। यही वजह है कि इस बार टिकट वितरण में नए चेहरों, सामाजिक समीकरणों और स्थानीय लोकप्रियता को महत्व दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
रुद्रपुर-किच्छा पर नेतृत्व की विशेष नजर
राजनीतिक दृष्टि से रुद्रपुर और किच्छा दोनों सीटें ऊधम सिंह नगर की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटें हैं। तराई क्षेत्र का चुनावी परिणाम राज्य की सत्ता का समीकरण बनाने में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में भाजपा के लिए इन सीटों पर प्रत्याशी चयन केवल स्थानीय निर्णय नहीं, बल्कि व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा होगा।
रुद्रपुर में पूर्व महापौर रामपाल सिंह और किच्छा में कमलेश्वर सेमवाल के नामों की चर्चा इस बात का संकेत है कि संभावित प्रत्याशी बदलाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं। लेकिन टिकट का अंतिम फैसला सर्वेक्षण, संगठन की रिपोर्ट, स्थानीय समीकरण और शीर्ष नेतृत्व के आकलन के आधार पर ही होगा।
अब सवाल यह है कि क्या भाजपा मिशन-60 को सफल बनाने के लिए अपने मौजूदा विधायकों पर ही भरोसा जताएगी या करीब दस सीटों पर नए चेहरों को मैदान में उतारकर चुनावी समीकरण बदलने का प्रयास करेगी? रुद्रपुर में रामपाल सिंह और किच्छा में कमलेश्वर सेमवाल के नामों की चर्चा ने स्थानीय राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
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