रुद्रपुर/देहरादून। उत्तराखंड की नदियों को लेकर सामने आया एक नया वैज्ञानिक अध्ययन राज्य के जलस्रोतों की बिगड़ती सेहत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। Discover Hazards में 24 जून 2026 को प्रकाशित समीक्षा अध्ययन में उत्तराखंड की 18 नदी प्रणालियों से संबंधित शोधों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में वर्ष 2001 से 2022 के बीच प्रकाशित 88 शोधपत्रों की समीक्षा की गई, जिनमें 34 देशों, भारत की 36 प्रमुख नदियों और उत्तराखंड की 18 नदी प्रणालियों से जुड़े अध्ययन शामिल हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
अध्ययन के अनुसार तेजी से बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिक गतिविधियां, पर्यटन, कृषि से बहकर आने वाले प्रदूषक और पर्याप्त सीवर एवं कचरा प्रबंधन का अभाव नदी जल की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। शोध में प्रदूषण से जुड़े करीब 60 प्रतिशत प्रभावों को शहरी और औद्योगिक भूमि उपयोग से जोड़ा गया है।
रिस्पना की स्थिति सबसे गंभीर
देहरादून की रिस्पना नदी प्रदूषण की गंभीर तस्वीर पेश करने वाले उदाहरणों में प्रमुख है। अध्ययन में रिस्पना के कुछ नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म 2.4 मिलियन MPN/100 एमएल से अधिक दर्ज होने का उल्लेख है। साथ ही नदी में BOD का स्तर 390 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंचने की जानकारी दी गई है।
फीकल कोलीफॉर्म की इतनी अधिक मात्रा पानी में सीवेज अथवा मलजनित प्रदूषण की गंभीर मौजूदगी का संकेत देती है। इसका सीधा मतलब यह है कि नदी में पहुंचने वाले गंदे पानी और सीवर के स्रोतों की पहचान कर उनका उपचार करना बेहद जरूरी है।
नंधौर पर औद्योगिक दबाव
नैनीताल क्षेत्र की नंधौर नदी भी अध्ययन में चिंता का विषय बनी है। शोध में नदी के आसपास लगभग 73 उद्योगों से जुड़े प्रदूषण दबाव का उल्लेख किया गया है। औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले अपशिष्ट और रासायनिक बहाव नदी के जल की रासायनिक संरचना तथा जलीय पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकते हैं।
अध्ययन में कुमाऊं और गढ़वाल की विभिन्न नदी प्रणालियों में प्रदूषण के अलग-अलग स्रोत सामने आते हैं। कहीं शहरी सीवर प्रमुख समस्या है तो कहीं औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि अपवाह अथवा पर्यटन और तीर्थ गतिविधियों से उत्पन्न कचरा नदी की सेहत पर दबाव डाल रहा है।
अलकनंदा में माइक्रोप्लास्टिक की दस्तक
अलकनंदा नदी से जुड़े अध्ययनों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के प्रमाण भी सामने आए हैं। यानी नदी प्रदूषण अब केवल प्लास्टिक की बोतलों, पॉलिथीन या दिखाई देने वाले कचरे तक सीमित नहीं है। प्लास्टिक के बेहद छोटे कण भी जलधारा में पहुंच रहे हैं, जो जलीय जीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चिंता का विषय हैं।
शोध में यह भी बताया गया है कि बदलते भूमि उपयोग, पैकेजिंग कचरे और सड़क से बहकर आने वाले प्रदूषक जैसे नए दबाव हिमालयी नदी प्रणालियों में उभर रहे हैं।
हरिद्वार की गंगा में एंटीबायोटिक प्रतिरोध का संकेत
हरिद्वार की गंगा से जुड़े अध्ययन में भी गंभीर संकेत सामने आए हैं। शोध समीक्षा के अनुसार पानी में 49 प्रकार के बैक्टीरिया की पहचान की गई, जिनमें 20 पर एक एंटीबायोटिक का प्रभाव नहीं हुआ। यह स्थिति एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुरोधी प्रतिरोध की चुनौती की ओर संकेत करती है।
इससे स्पष्ट होता है कि नदी प्रदूषण का सवाल केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित विषय नहीं है। सीवेज और अन्य प्रदूषित स्रोतों के जरिए ऐसे सूक्ष्मजीव नदी तंत्र में पहुंच सकते हैं जिनका पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से संबंध है।
गंगा-यमुना समेत कई नदियां दबाव में
उत्तराखंड की गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, कोसी, रिस्पना, बिंदाल, कल्याणी और नंधौर समेत विभिन्न नदी प्रणालियों पर मानवीय गतिविधियों का असर अध्ययन में दर्ज किया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक तेजी से फैलते शहर, अनियोजित निर्माण, पर्यटन और बढ़ती आबादी के साथ सीवर तथा ठोस कचरा प्रबंधन की क्षमता समान गति से विकसित करना जरूरी है।
विशेष रूप से देहरादून और तेजी से विकसित हो रहे अन्य शहरी क्षेत्रों में नदी किनारे बढ़ती गतिविधियां भविष्य के लिए चेतावनी मानी जा सकती हैं। अध्ययन में कहा गया है कि नदी घाटियों की भूमि उपयोग योजना और जल प्रबंधन को अलग-अलग देखने के बजाय एकीकृत तरीके से लागू करने की आवश्यकता है।
केवल सफाई अभियान से सुधरेगी स्थिति?
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि नदियों को बचाने के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त समाधान नहीं होगा। सीवर नेटवर्क को मजबूत करना, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता और संचालन की निगरानी, औद्योगिक अपशिष्ट पर कड़ी निगरानी, पर्यटन गतिविधियों का बेहतर नियमन और कृषि से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना जरूरी है। साथ ही नियमित वैज्ञानिक निगरानी से प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों की पहचान की जा सकती है।
अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में नदी संरक्षण के लिए सरकारी एजेंसियों, स्थानीय निकायों और समुदायों के बीच समन्वय जरूरी है।
मौसम का मिजाज भी बना हुआ है सक्रिय
उधर, उत्तराखंड में बारिश का दौर कुछ कमजोर पड़ा है, हालांकि पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं तेज बौछारों का क्रम जारी है। कुमाऊं मंडल के कई हिस्सों में जोरदार वर्षा दर्ज की गई। हल्द्वानी में 58 मिलीमीटर बारिश दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।
मौसम पूर्वानुमान के अनुसार राज्य के अधिकांश हिस्सों में हल्की से मध्यम वर्षा के आसार हैं। देहरादून, पौड़ी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, चंपावत, पिथौरागढ़, बागेश्वर और नैनीताल में गरज-चमक के साथ भारी वर्षा के दौर की संभावना जताई गई है। इन क्षेत्रों के लिए यलो अलर्ट जारी किया गया है।
देहरादून में दिनभर धूप और बादलों की आंख-मिचौनी के बीच शाम को आसमान में घने बादल छाए। पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं बूंदाबांदी और मैदानी इलाकों में धूप के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव देखा गया।
उत्तराखंड की नदियों पर सामने आया यह शोध ऐसे समय में आया है जब राज्य में बारिश का मौसम जारी है। बारिश के दौरान शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से बहकर आने वाला गंदा पानी नदी प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। ऐसे में नदी संरक्षण को केवल अभियान के रूप में देखने के बजाय सीवर, कचरा, उद्योग, पर्यटन और भूमि उपयोग से जोड़कर दीर्घकालीन नीति बनाने की जरूरत सामने आती है।
