वेदनी बुग्याल से आगे बढ़ी मां नंदा की बड़ी जात, रूपकुंड-ज्यूंरागली की ओर बढ़ा कारवां वेदनी बुग्याल का अलौकिक रहस्य और मां महानंदा की कैलाश यात्रारहस्यों का गढ़

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वेदनी बुग्याल: जहाँ से शुरू होता है मां नंदा का दिव्य सफ़रवेदों की भूमि ‘वेदनी बुग्याल’ और महानंदा देवी की अमर गाथाचौसिंगा खाड़ू और वेदनी कुंड: महानंदा देवी के मायके का अनसुना रहस्य

💔मोहिनी अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

वेदनी बुग्याल से आगे बढ़ी मां नंदा की बड़ी जात, रूपकुंड-ज्यूंरागली की ओर बढ़ा कारवां
चमोली। हिमालय की अधिष्ठात्री मां नंदा की ऐतिहासिक बड़ी जात (लोकजात) यात्रा इन दिनों अपने सबसे कठिन और भावुक पड़ावों में प्रवेश कर चुकी है। 5 सितंबर को कुरुड़ से शुरू हुई यात्रा वाण गांव में धर्मभाई लाटू देवता से भावपूर्ण मिलन के बाद उच्च हिमालय की ओर बढ़ी। वाण से आगे देव-डोलियों, छंतोलियों और चौसिंगा खाड़ू के साथ यात्रा वेदनी बुग्याल पहुंची, जहां शुक्रवार को सप्तमी जात और पूजा-अनुष्ठान संपन्न हुए।
वेदनी बुग्याल में श्रद्धालुओं ने मां नंदा की डोली के दर्शन कर मंगल गीतों और जागरों के बीच आशीर्वाद लिया। इसके बाद यात्रा अब अत्यंत दुर्गम हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़ चुकी है। शनिवार को यात्रा पातर नचौणिया से रूपकुंड और ज्यूंरागली की कठिन चढ़ाई पार करते हुए शीला समुद्र की ओर बढ़ेगी।


आगे होमकुंड वह पवित्र पड़ाव है, जहां मां नंदा की कैलाश यात्रा का प्रमुख अनुष्ठान होगा। चौसिंगा खाड़ू भी इस यात्रा की प्रमुख आस्था का केंद्र बना हुआ है। हजारों श्रद्धालुओं की भावनाओं और सदियों पुरानी लोकपरंपराओं को समेटे यह यात्रा अब अपने सबसे कठिन चरण में प्रवेश कर चुकी ह

जय मां नंदा।

कैलाश विदाई का पड़ाव: हर 12 साल में आयोजित होने वाली Nanda Devi Raj Jat Yatra के दौरान मां नंदा की डोली अपने मायके (कुरुड़/कांसुवा) से पति के घर (कैलाश पर्वत) के लिए रवाना होती है। वाण गाँव से आगे बढ़ते हुए यह यात्रा वेदनी बुग्याल पहुंचती है।

वेदनी कुंड पर तर्पण: वेदनी बुग्याल के बीचों-बीच एक पवित्र वेदनी कुंड स्थित है। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान कर श्रद्धालु और देव-डोलियां अपने पूर्वजों को तर्पण (ritualistic homage) देते हैं।

[1]चौसिंगा खाड़ू का रहस्य: इस यात्रा का नेतृत्व एक चार सींगों वाला रहस्यमयी भेड़ा (चौसिंगा खाड़ू) करता है। वेदनी बुग्याल में विशेष पूजा-अर्चना के बाद यह खाड़ू डोलियों और छंतोलियों के साथ आगे रूपकुंड और होमकुंड की ओर बढ़ता है, जहाँ से वह अकेले ही निर्जन पहाड़ों में गायब हो जाता है

वेदनी बुग्याल का धार्मिक और पौराणिक रहस्य

वेदनी बुग्याल के बारे में कई पौराणिक कथाएं और अलौकिक मान्यताएं प्रचलित हैं:

  1. वेदों की उत्पत्ति का स्थल: हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन भूमि पर सनातन धर्म के चारों वेदों की रचना हुई थी। ‘वेदनी’ नाम स्वयं ‘वेद’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है वेदों को उत्पन्न करने वाली जगह।
  2. माता दुर्गा का रूप और लाटू देवता की सीमा: मां नंदा को देवी दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है। यात्रा के दौरान मां नंदा के धर्मभाई कहे जाने वाले लाटू देवता की डोली वाण गांव से केवल वेदनी बुग्याल तक ही आती है। यहां से आगे का सफर बेहद दुर्गम और अलौकिक शक्तियों से भरा माना जाता है, इसलिए यहां से आगे केवल चुनिंदा अनुष्ठान ही बढ़ते हैं।
  3. रहस्यमयी रूपकुंड का प्रवेश द्वार: वेदनी बुग्याल से आगे का रास्ता कुख्यात रूपकुंड (कंकाल झील) की ओर जाता है। लोककथाओं के अनुसार, जब मां नंदा कैलाश जा रही थीं, तो उन्हें प्यास लगी। तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से यहां एक झील बनाई, जिसमें माता ने अपना रूप देखा, इसी कारण इसका नाम रूपकुंड पड़ा।

वर्तमान में, सितंबर 2026 में मां नंदा की बड़ी जात (लोकजात) यात्रा अपने पूरे शबाब पर है। हाल ही में, श्रद्धालु देव-डोलियों और चौसिंगा खाड़ू के साथ पारंपरिक मंगल गीतों और जागरों के बीच वाण गांव से होते हुए वेदनी बुग्याल पहुंचे हैं और वहां से आगे के अत्यंत कठिन व निर्जन हिमालयी पड़ावों (जैसे ज्यूंरागली और होमकुंड) के लिए विदा हो चुके हैं।


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