सिडकुल की चमक के पीछे छुपा अंधेरा: उत्तराखंड के श्रमिकों के अधिकारों की पुकार

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उत्तराखंड को उद्योगों की धरती बनाने का सपना जब साकार हुआ और SIDCUL की स्थापना हुई, तब उम्मीद थी कि यह पहल राज्य के युवाओं को रोजगार, सम्मान और आत्मनिर्भरता देगी। लेकिन आज यही सिडकुल क्षेत्र हजारों श्रमिकों के लिए शोषण, असुरक्षा और अन्याय का प्रतीक बनता जा रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


यह एक कड़वा सच है कि जिन उद्योगों को राज्य सरकार ने जमीन, बिजली और तमाम रियायतें दीं, वही उद्योग श्रमिकों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रहे हैं। 70 प्रतिशत स्थानीय रोजगार का नियम, जो उत्तराखंड के युवाओं के हित में बनाया गया था, कई स्थानों पर सिर्फ कागजों तक सीमित है। स्थानीय युवाओं को दरकिनार कर बाहरी श्रमिकों को कम वेतन पर नियुक्त करना एक आम प्रवृत्ति बन चुकी है।
न्यूनतम मजदूरी की बात करें तो हालात और चिंताजनक हैं। सरकारी दरें तय होने के बावजूद कई कंपनियां श्रमिकों को उससे कम भुगतान कर रही हैं। ठेका प्रथा ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, जहां मजदूरों की कोई स्थायी पहचान नहीं, कोई सुरक्षा नहीं और कोई भविष्य नहीं।
सबसे दर्दनाक स्थिति तब सामने आती है जब किसी फैक्ट्री में दुर्घटना होती है। मशीनों के बीच काम करने वाले श्रमिक जब घायल होते हैं, हाथ या उंगलियां गंवा देते हैं, तब उन्हें मुआवजा देने के बजाय चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ऐसे हजारों उदाहरण राज्य के मैदानी क्षेत्रों में बिखरे पड़े हैं, जो यह बताते हैं कि श्रमिकों के जीवन की कीमत आज भी बेहद कम आंकी जा रही है।
श्रम कानूनों का पालन कराने वाली एजेंसियां भी कई बार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटती नजर आती हैं। निरीक्षण की प्रक्रिया कमजोर है और कई मामलों में पारदर्शिता की कमी साफ दिखती है। परिणामस्वरूप, उद्योगपतियों का पक्ष मजबूत होता जाता है और मजदूर न्याय के लिए भटकता रहता है।
यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट भी है। एक ओर राज्य विकास और निवेश की बात करता है, दूसरी ओर उसी विकास की नींव रखने वाले श्रमिक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह विरोधाभास लंबे समय तक टिक नहीं सकता।
समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन और समाज इस मुद्दे को गंभीरता से लें। सिडकुल क्षेत्रों में व्यापक श्रम जांच अभियान चलाया जाए, न्यूनतम मजदूरी और स्थानीय रोजगार के नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए और औद्योगिक दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए ठोस राहत एवं पुनर्वास व्यवस्था बनाई जाए।
श्रमिकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और संगठित होना होगा। शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से अपनी आवाज उठाना ही स्थायी समाधान का रास्ता है।
उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता या औद्योगिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके लोगों के सम्मान और अधिकारों से बनती है। यदि सिडकुल क्षेत्र में श्रमिकों का शोषण यूं ही जारी रहा, तो यह विकास का मॉडल सवालों के घेरे में आ जाएगा।
यह लड़ाई किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के स्वाभिमान की है—और इस स्वाभिमान की रक्षा अब हर हाल में होनी चाहिए।


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