उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों “खेत बचाओ” और किसानों के उत्थान की बातें खूब सुनाई देती हैं। सरकारें अपने विज्ञापनों, भाषणों और उपलब्धियों के दस्तावेजों में किसानों को विकास की धुरी बताती हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, प्राकृतिक खेती, पहाड़ी उत्पादों को बाजार से जोड़ने और “हाउस ऑफ हिमालय” जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए दावा किया जाता है कि किसान सशक्त हो रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
लेकिन उत्तराखंड का आम नागरिक एक दूसरा सवाल भी पूछ रहा है—यदि सब कुछ इतना बेहतर हो रहा है, तो फिर गांव खाली क्यों हो रहे हैं? खेत बंजर क्यों पड़ रहे हैं? खेती छोड़ने वालों की संख्या क्यों बढ़ रही है? और आखिर वह कौन-सी मजबूरी है जो पहाड़ के नौजवान को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर शहरों की ओर धकेल रही है?
उत्तराखंड का निर्माण केवल प्रशासनिक इकाई बनाने के लिए नहीं हुआ था। इस राज्य आंदोलन के पीछे एक सपना था—पहाड़ के संसाधनों पर पहाड़ के लोगों का अधिकार। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले, खेती मजबूत हो, गांव आबाद रहें और विकास का मॉडल स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो। लेकिन दो दशक से अधिक समय बाद यह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है कि क्या हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या उससे दूर जा रहे हैं?
सरकारी आंकड़े चाहे कुछ भी कहें, जमीनी हकीकत यह है कि उत्तराखंड के हजारों गांव पलायन की मार झेल रहे हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां स्थायी आबादी नगण्य रह गई है। खेतों में फसल की जगह झाड़ियां उग रही हैं। जिन खेतों में कभी अनाज पैदा होता था, वहां अब सन्नाटा दिखाई देता है। खेती धीरे-धीरे एक संघर्ष में बदल चुकी है।
पहाड़ का किसान आज कई मोर्चों पर लड़ रहा है। जंगली जानवर फसल नष्ट कर रहे हैं। सिंचाई की सुविधा सीमित है। बाजार तक पहुंच कठिन है। लागत बढ़ रही है। खेती से आय घट रही है। ऐसे में यदि कोई किसान खेती छोड़ देता है तो यह उसकी इच्छा नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी होती है।
यहीं पर “खेत बचाओ अभियान” पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। खेत बचाने का अर्थ केवल भाषण देना नहीं होता। खेत बचाने का अर्थ है खेत को आर्थिक रूप से जीवित रखना। किसान को यह भरोसा देना कि उसकी मेहनत का मूल्य मिलेगा। गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराना ताकि अगली पीढ़ी खेती से पूरी तरह विमुख न हो जाए।
आलोचकों का आरोप है कि उत्तराखंड में विकास की परिभाषा लगातार कंक्रीट आधारित होती जा रही है। सड़कें, होटल, रिजॉर्ट, टाउनशिप और व्यावसायिक निर्माण विकास के प्रतीक बन गए हैं, जबकि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था हाशिये पर जाती दिखती है। जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि कृषि भूमि का संरक्षण केवल कागजों में है, जबकि जमीन पर उसका स्वरूप लगातार बदल रहा है।
सरकार कहती है कि निवेश आएगा तो रोजगार बढ़ेगा। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या निवेश और कृषि संरक्षण साथ-साथ चल रहे हैं? यदि खेती योग्य भूमि लगातार कम होती जाए, गांव खाली होते जाएं और कृषि उत्पादन घटता जाए तो विकास का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है।
आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। गांव खाली होने का अर्थ केवल मकानों पर ताले लगना नहीं है। इसका अर्थ है लोक संस्कृति का कमजोर होना, पारंपरिक ज्ञान का समाप्त होना, सामुदायिक जीवन का बिखरना और पहाड़ की पहचान का धीरे-धीरे मिटना।
खेत बचाओ अभियान की सफलता का पैमाना पोस्टर नहीं, बल्कि खेतों में खड़ी फसल होनी चाहिए। यदि किसान खेती छोड़ रहा है तो अभियान असफल है। यदि गांव खाली हो रहे हैं तो अभियान असफल है। यदि कृषि भूमि बंजर हो रही है तो अभियान असफल है। यदि युवाओं को गांव में भविष्य दिखाई नहीं दे रहा तो अभियान असफल है।
उत्तराखंड की जनता यह भी पूछना चाहती है कि राज्य निर्माण के बाद कृषि आधारित उद्योगों का कितना विस्तार हुआ? कितने ऐसे मॉडल विकसित किए गए जिनसे किसान को गांव में ही आय मिल सके? कितनी सिंचाई योजनाएं वास्तव में खेत तक पहुंचीं? कितने बंजर खेत फिर से खेती योग्य बने? कितने पलायनग्रस्त गांव पुनर्जीवित हुए?
जब इन सवालों के जवाब नहीं मिलते तो सरकारी दावों और जमीनी वास्तविकता के बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि ईमानदार समीक्षा की है। सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि खेती का संकट केवल आर्थिक पैकेजों से हल नहीं होगा। इसके लिए दीर्घकालिक नीति चाहिए। कृषि भूमि की सुरक्षा चाहिए। स्थानीय उत्पादों के लिए मजबूत बाजार चाहिए। ग्रामीण रोजगार चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर व्यवस्था चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, गांवों में रहने वाले लोगों को यह विश्वास चाहिए कि राज्य की विकास नीति में उनकी भी बराबर हिस्सेदारी है।
उत्तराखंड का भविष्य केवल शहरों में नहीं बसता। उसका भविष्य उन खेतों में बसता है जो आज बंजर पड़ रहे हैं। उन गांवों में बसता है जहां से लोग पलायन कर रहे हैं। उन किसानों में बसता है जो तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपनी जमीन से जुड़े हुए हैं।
यदि वास्तव में खेत बचाने हैं तो पहले किसान बचाने होंगे। यदि किसान बचाने हैं तो गांव बचाने होंगे। और यदि गांव बचाने हैं तो विकास की दिशा पर नए सिरे से विचार करना होगा।
अन्यथा इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि उत्तराखंड में खेत बचाने के सबसे अधिक नारे उसी दौर में लगे, जब खेत सबसे तेजी से खाली हो रहे थे। :::
