उत्तराखंड की धरती पर एक बड़ा सवाल
उत्तराखंड सरकार जब भी किसानों और खेती की बात करती है तो बड़े-बड़े दावे सामने रखे जाते हैं। किसान सम्मान निधि, कृषि योजनाएं, पहाड़ी उत्पादों को बाजार दिलाने की बातें, किसानों की आय बढ़ाने के दावे और खेत बचाने के संकल्प। लेकिन जब इन दावों की तुलना जमीनी हकीकत से की जाती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
आज उत्तराखंड के गांवों में सबसे बड़ा संकट खेती का नहीं, बल्कि खेती छोड़ने का है। हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर पड़ी है। गांव खाली हो रहे हैं। नौजवान रोजगार की तलाश में मैदानों और महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जिन खेतों में कभी धान, मंडुवा, झंगोरा और गेहूं की फसलें लहलहाती थीं, वहां अब झाड़ियां और सन्नाटा दिखाई देता है।
ऐसे समय में जब सरकार “खेत बचाओ अभियान” की बात करती है, तब जनता पूछती है कि आखिर बचाया क्या जा रहा है?
यदि खेत बचाने की वास्तविक चिंता होती तो सबसे पहले उन कारणों पर प्रहार किया जाता जिनकी वजह से खेती लगातार कमजोर होती गई। पहाड़ में खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। जंगली जानवर फसलें नष्ट कर रहे हैं। सिंचाई के साधन सीमित हैं। मंडियों तक पहुंच कमजोर है। उत्पादन लागत बढ़ रही है और किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा।
दूसरी ओर राज्य में भूमि उपयोग का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कृषि भूमि लगातार गैर-कृषि गतिविधियों की ओर जा रही है। पर्यटन, व्यावसायिक निर्माण और रियल एस्टेट के विस्तार के बीच खेती सिकुड़ती नजर आती है। सरकार विकास की बात करती है, लेकिन सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर हो रहा है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
पंतनगर और तराई क्षेत्र जैसे प्रदेश के सबसे उपजाऊ इलाकों में भूमि को लेकर वर्षों से विवाद और बहस चलती रही है। जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि खेती और किसानों के हितों की तुलना में भूमि का व्यावसायिक उपयोग अधिक प्राथमिकता बनता जा रहा है। यदि यह धारणा गलत है तो सरकार को पारदर्शी आंकड़ों के साथ जनता के सामने आना चाहिए।
“हाउस ऑफ हिमालय” जैसी योजनाओं के प्रचार पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, लेकिन पहाड़ के खाली होते गांवों को बचाने के लिए उतनी गंभीरता क्यों दिखाई नहीं देती? यदि उत्पाद ही नहीं बचेंगे, किसान ही नहीं बचेंगे, गांव ही नहीं बचेंगे तो आखिर बाजार से जोड़ने के लिए बचेगा क्या?
आज उत्तराखंड का सबसे बड़ा संकट सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन का भी है। जिन गांवों में कभी सैकड़ों परिवार रहते थे, वहां ताले लटके हुए हैं। स्कूल बंद हो रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं। सड़क और इंटरनेट जैसी सुविधाएं अभी भी कई क्षेत्रों में अपर्याप्त हैं। ऐसे में खेती छोड़ने वाले किसान को दोष देना आसान है, लेकिन उसके पलायन के पीछे की सरकारी विफलताओं पर चर्चा कम होती है।
सरकार दावा करती है कि किसान सशक्त हो रहे हैं। यदि ऐसा है तो फिर कृषि जनगणना के आंकड़ों, बंजर भूमि के बढ़ते क्षेत्रफल और पलायन आयोग की रिपोर्टों में बार-बार संकट की तस्वीर क्यों उभरती है?
वास्तविक खेत बचाओ अभियान का अर्थ होता—
कृषि भूमि की सुरक्षा।
किसानों को लाभकारी मूल्य।
जंगली जानवरों से सुरक्षा।
सिंचाई का विस्तार।
गांवों में रोजगार।
पलायन रोकने की ठोस नीति।
कृषि आधारित उद्योगों का विकास।
लेकिन यदि अभियान केवल पोस्टर, विज्ञापन और भाषणों तक सीमित रह जाए तो जनता इसे खेत बचाओ नहीं, बल्कि “खेत मिटाओ अभियान” कहने लगती है।
उत्तराखंड की जनता विकास विरोधी नहीं है। लोग सड़क, उद्योग, पर्यटन और निवेश चाहते हैं। लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि विकास और विनाश के बीच की रेखा को पहचाना जाए। पहाड़ की पहचान उसकी खेती, उसके जंगल, उसके जल स्रोत और उसके गांव हैं। यदि यही समाप्त हो गए तो उत्तराखंड केवल नक्शे पर एक राज्य रह जाएगा, आत्मा खो देगा।
आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि ईमानदार आत्ममंथन की है। सरकार को यह बताना होगा कि पिछले वर्षों में कितनी कृषि भूमि बची, कितनी समाप्त हुई, कितने गांव खाली हुए, कितने किसानों ने खेती छोड़ी और कितने युवाओं को गांव में रोजगार मिला।
क्योंकि उत्तराखंड की असली लड़ाई किसी चुनाव की नहीं, बल्कि खेत और गांव बचाने की है। जिस दिन खेत हार जाएंगे, उस दिन उत्तराखंड भी हार जाएगा। :::
